विचार

नेपाल की तबाही में हिमाचल के लिए सबक: नीतियों में चूक केंद्र सरकार की, तबाही का दंश झेल रहा राज्य

नई दिल्ली की राजनयिक नाकामियों का खामियाजा राज्य को तबाही के रूप में नहीं भुगतना चाहिए। हर साल पर्यटकों की संख्या 5 करोड़ पहुंचाने के पागलपन भरे लक्ष्य पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। राज्य की पारिस्थितिकी इतने बड़े बोझ को झेलने में कतई सक्षम नहीं।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

ऑटो वॉन बिस्मार्क का मशहूर कथन है-मूर्ख अपनी गलतियों से और बुद्धिमान दूसरों की गलतियों से सीखते हैं। हिमाचल के नीति-नियंताओं ने अब तक न तो अपनी गलतियों से सबक सीखा और न उत्तराखंड और वायनाड के त्रासद अनुभवों से। नेपाल की रोंगटे खड़े कर देने वाली त्रासदी से ठोस सबक लेने का समय आ गया है। बुनियादी सबक बिल्कुल साफ है: हिमालय हमारी मनमानियों से तंग आ चुका है। अब बस कीजिए !

हिमाचल प्रदेश में ‘विकास’ के नाम पर खुला अंधेर मचा है। पिछले बीस सालों में अलग-अलग परियोजनाओं के नाम पर 12,000 हेक्टेयर बेशकीमती वन भूमि छीन ली गई, 174 जलविद्युत परियोजनाओं को मंजूरी दी गई या चालू किया गया, 50 लाख पेड़ काटे गए और 10 मंजिला इमारतों को खड़ा करने के लिए निर्माण नियमों को ताक पर रख दिया गया। ‘शिमला विकास योजना 2041’ को हरी झंडी देकर शहर के नाजुक ग्रीन बेल्ट को तबाह करने और ऐतिहासिक एवं कोर क्षेत्रों में कंक्रीट के जंगल उगाने की छूट दे दी गई। राज्य में गैर-जरूरी फोर-लेन हाईवे का संक्रामक रोग फैला दिया गया है, दरकते पहाड़ों के सीने में दर्जनों सुरंगे खोद दी गईं, और सालाना पर्यटक संख्या को मौजूदा 2 करोड़ से बढ़ाकर 5 करोड़ करने की आत्मघाती योजना पर काम चल रहा है।

पहाड़ों की नाजुक भूगर्भीय परतों को बांधकर रखने वाले प्राकृतिक तत्व-जंगल, हिमनद, बर्फ के मैदान और नदियों का कुदरती जल-प्रवाह तंत्र-इंसान की बेलगाम हरकतों से तबाह हो रहे हैं। पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों की अनगिनत चेतावनियों और रिपोर्टों के बावजूद सरकारों की आंखें नहीं खुलीं, जो आगाह करते रहे हैं कि ये नाजुक पहाड़ इस स्तर के इंसानी दखल को नहीं झेल सकते।

अब हिमालय पलटवार कर रहा है, और उसकी चोट हर बार पहले से तेज होती जा रही है। महज तीन सालों (2022-2024) में आई इन मानव-निर्मित आपदाओं ने राज्य को 13,500 करोड़ रुपये का सीधा वित्तीय नुकसान पहुंचाया और 800 जिंदगियां लील लीं; व्यापार और रोजी-रोटी के अप्रत्यक्ष नुकसान की तो बात ही छोड़ दें। 2026 में अब तक 1,400 करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है और 200 से अधिक लोग जान गंवा चुके हैं।

हिमालय में तापमान बढ़ने की दर वैश्विक औसत से दोगुनी है। इस तपिश को भारी मशीनों, लेबर कैंपों के उत्सर्जन, बर्फीले मैदानों पर जमते काले कार्बन और ऊंचाई वाली नाजुक पारिस्थितिकी में बेधड़क घुसते वाहनों के प्रदूषण ने ‘हीट आइलैंड’ बनाकर कई गुना बढ़ा दिया है। हरियाली का मिटना कोढ़ में खाज का काम कर रहा है। पहाड़ों की भुरभुरी मिट्टी और चट्टानों को थामे रखने वाली पर्माफ्रॉस्ट (सदियों पुरानी बर्फ) तेजी से पिघल रही है। नदियों और जलधाराओं में अंधाधुंध मलबा उड़ेलने से उनकी पानी बहाने की कुदरती क्षमता घट गई है, जिससे बार-बार ‘फ्लैश फ्लड’ आ रहा है।

चेतावनियां मिलती रही हैं: 2013 में केदारनाथ, 2021 में चमोली, 2023 में सिक्किम, 2025 में धराली और अब नेपाल। हिमाचल के सिर पर मंडराते सबसे बड़े खतरों में है राज्य में हिमनद झीलों की बढ़ती तादाद और उनका फैलता दायरा। 1990 में राज्य में बड़े आकार की 107 हिमनद झीलें थीं, जिनका कुल क्षेत्रफल 5.54 वर्ग किलोमीटर था। आज 11.20 वर्ग किलोमीटर में 669 झीलें हैं। कई खतरनाक स्तर तक फैल चुकी हैं, जैसे लाहौल की घेपन झील, जिसका आकार छह गुना बढ़कर 100 हेक्टेयर हो चुका है। राज्य की सभी प्रमुख नदियां इन झीलों के ऊपर हिमनदों से निकलती हैं और इन नदियों पर बनी जलविद्युत परियोजनाएं झीलों के फटने से आने वाली बाढ़ के मुहाने पर हैं। इन परियोजनाओं को होने वाला कोई भी नुकसान नीचे घाटियों और कस्बों में लाखों लोगों के अस्तित्व को मिटा देगा, जैसा कि नेपाल में हुआ।

हिमाचल प्राकृतिक रूप से भी अन्य गंभीर जोखिमों के साए में जीता है: पूरा राज्य भूकंप के सबसे संवेदनशील जोन (जोन 6) में आता है; यहां 20,000 से अधिक भूस्खलन-संवेदनशील हॉटस्पॉट हैं; और जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम के चरम मिजाज की घटनाओं में कुछ ही सालों में 40 फीसद की बढ़ोतरी हुई है।

यह वक्त है कड़े और निर्णायक फैसले, तथा उस विकास मॉडल में आमूलचूल बदलाव का जिसे राज्य वर्षों से आंख मूंदकर ढोता रहा है। सरकार को इन बिंदुओं पर अमल करना चाहिए:

नई जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक: जिन परियोजनाओं पर निर्माण शुरू नहीं हुआ है, उनपर रोक लगे। लाहौल-स्पीति में अधिक ऊंचाई पर स्थित चिनाब और चंद्रभागा बेसिन तथा किन्नौर एवं पांगी जैसे दुर्गम क्षेत्रों में स्वीकृत या प्रस्तावित परियोजनाओं को रद्द किया जाए।

2010 की रिपोर्ट लागू हो: तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) द्वारा तैयार जलविद्युत परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभाव संबंधी 2010 की उस रिपोर्ट को लागू किया जाए जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार किया था, लेकिन तत्कालीन सरकार ने उसका विरोध किया और बाद की सरकारों ने ठंडे बस्ते में डाल दिया। उसकी मुख्य सिफारिशों पर गंभीरता से विचार हो: अधिक ऊंचाई वाले, अल्पाइन, ग्लेशियर और वन जलग्रहण क्षेत्रों में जलविद्युत परियोजनाओं पर पूर्ण रोक; दो परियोजनाओं के बीच 5 किलोमीटर की दूरी; नदियों का न्यूनतम सतत प्रवाह सुनिश्चित हो; किसी भी नदी पर परियोजना मंजूर करने से पहले अलग-अलग परियोजनाओं की जगह पूरे नदी बेसिन के लिए व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन, पर्यावरण प्रबंधन योजना और जलग्रहण क्षेत्र उपचार योजनाएं बनें। इनपर खरी न उतरने वाली परियोजनाएं तत्काल बंद हों।

पीर पंजाल सुरंग परियोजना का विरोध हो: लाहौल में चंद्रभागा के पानी को कुल्लू की ब्यास नदी में मोड़ने के लिए पीर पंजाल पर्वतमाला के नीचे 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने के केंद्र के आत्मघाती प्रस्ताव का कड़ा विरोध हो। यह परियोजना हिमालय का सीना चीरकर महाविनाश को न्योतेगी। तीन जिलों की भूगर्भीय स्थिरता को हिला देगी; करोड़ों टन मलबा पैदा करेगी जो नदियों, जलधाराओं और प्राकृतिक जल निकासी को अवरुद्ध करेगा; भूमिगत जल स्रोतों को नष्ट करेगा और सैकड़ों पेयजल योजनाओं को सुखा देगा। ब्यास में अतिरिक्त पानी झोंकने से उस नदी की विध्वंसक क्षमता भड़क जाएगी, जो हर साल कुल्लू में प्रलय बरपाती है।

पर्यटन के बेतुके लक्ष्यों पर लगाम: हर साल पर्यटकों की संख्या 5 करोड़ पहुंचाने के पागलपन भरे लक्ष्य पर पुनर्विचार जरूरी है। राज्य का नाजुक पर्यावरण यह बोझ नहीं सह सकता। इसके लिए जिस बुनियादी ढांचे-सड़क, होटल, पानी की खपत, सीवरेज और कचरा निस्तारण-की जरूरत पड़ेगी, वह राज्य की प्राकृतिक संपदा और सांस्कृतिक पहचान को लील जाएगा। भूटान मॉडल से सीखते हुए पर्यटकों की संख्या सीमित की जाए।

संवेदनशील इलाकों में कंक्रीट निर्माण रुके: बड़े शहरों के बाहरी हिस्सों और ग्रामीण अंचलों में पर्यटन, रियल एस्टेट तथा व्यावसायिक निर्माणों पर फौरन रोक लगे। शहरों को अंधाधुंध कंक्रीट निर्माण ने पहले ही बर्बाद कर रखा है, और अब बाहरी पूंजीपति ग्रामीण क्षेत्रों को उजाड़ने पर आमादा हैं-पहाड़ काटे जा रहे हैं, पेड़ गिराए जा रहे हैं, जंगलों-नदियों को कचरे व सीवेज से पाट दिया गया है, ध्वनि व प्रकाश प्रदूषण फैलाया जा रहा है। कसौली, सोलन, शिमला, मनाली, पालमपुर और धर्मशाला से सटे इलाके पर्यावरण के इस विनाश की गवाही दे रहे हैं। गांवों को भी कंक्रीट के मलबा बनने से बचाना होगा।

फोर-लेन चौड़ीकरण रुके: पहाड़ों को छलनी करने वाली फोर-लेन सड़कों के सिलसिले को बंद किया जाए, जिससे केवल नेताओं, ठेकेदारों और भ्रष्ट नौकरशाहों की जेबें भरती हैं। ये रास्ते के समूचे इलाके की भूगर्भीय बनावट को तोड़-मरोड़ देते हैं, पहाड़ी ढलानों को अस्थिर करते हैं, लोगों की संपत्तियां और आशियाने छीनते हैं, स्थानीय आजीविका उजाड़ते हैं और शांत वादियों में धुआं उगलते वाहनों का रेला झोंकते हैं। परवाणू-शिमला और कीरतपुर-मनाली हाईवे गवाह हैं। एक दशक बाद भी दोनों ‘निर्माणाधीन’ और आपदा-ग्रस्त बनी हैं।

फैसले की घड़ी आ चुकी है। हिमालय ने सदियों तक हमारे अहंकार और मनमानियों को बर्दाश्त किया, लेकिन अब उसके सब्र का पैमाना छलक चुका है। उसकी चेतावनियां हर गुजरते साल के साथ कहीं भयानक तरीके से सामने आ रही हैं। हम हिमाचल को ‘देवभूमि’ कहते हैं, लेकिन वोटों और अंधाधुंध मुनाफे की हवस में इसे नोचते-खसोटते हैं। यह पाखंड रुकना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ महीने पहले राज्य सरकार को चेताया था कि पर्यावरण के प्रति संजीदा हो जाइए, वरना यह राज्य भारत के नक्शे से गायब हो जाएगा।

हम फ्रांसीसी खगोलभौतिकीविद् और पर्यावरणविद् ह्यूबर्ट रीव्स के उन तीखे शब्दों को सच साबित कर रहे हैं: ‘इंसान सबसे विक्षिप्त प्रजाति है। अनदेखे ईश्वर को पूजता है और साक्षात प्रकृति को नष्ट करता है। इस नासमझी से पूरी तरह बेखबर कि जिस प्रकृति का वह संहार कर रहा है, वही वह ईश्वर है जिसकी वह आराधना का ढोंग करता है। कुदरत का सम्मान कीजिए। प्रकृति की हिफाजत ही ईश्वर की सच्ची इबादत है।

(अभय शुक्ला सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं।)

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