विचार

झूठ, प्रोपेगेंडा और नफरत-हिंसा, देश के लिए अभिशप्त पिछले 12 साल

मोदी सरकार के लंबी जिंदगी के जश्न में हालात यह हैं कि अपनी सरकार की चंद उपलबद्धियां भी लंबे-उबाऊ भाषणों में नजर नहीं आ रही हैं– वही विपक्ष और पिछली सरकारों को कोसने वाले वक्तव्यों को फिलर जैसा इस्तेमाल करना पड़ रहा है।

झूठ, प्रोपेगेंडा और नफरत-हिंसा, देश के लिए अभिशप्त पिछले 12 साल
झूठ, प्रोपेगेंडा और नफरत-हिंसा, देश के लिए अभिशप्त पिछले 12 साल फोटोः सोशल मीडिया

राजेश खन्ना पर फिल्माया गया एक मशहूर डायलॉग है– बाबू मोशाय, जिंदगी लंबी नहीं बल्कि बड़ी होनी चाहिए। इस सीधे से वाक्य का गूढ अर्थ बीजेपी-भक्त छोड़कर सभी जानते होंगें। मोदी सरकार के लंबी जिंदगी के जश्न में हालात यह हैं कि अपनी सरकार की चंद उपलबद्धियां भी लंबे-उबाऊ भाषणों में नजर नहीं आ रही हैं– वही विपक्ष और पिछली सरकारों को कोसने वाले वक्तव्यों को फिलर जैसा इस्तेमाल करना पड़ रहा है। पिछले 12 वर्षों से यही होता आया है, वही पिटी पिटाई अडाणी-मॉडल वाली अर्थव्यवस्था को विकास के नाम पर परोसा जा रहा है– आम आदमी पिस रहा है और दूसरी तरफ पूंजीवाद-सत्ता का गठबंधन देश को लूट रहा है। इन सबके बीच प्रधानमंत्री जी आंखें नचाकर और हथेलियों को आपस में मसलकर झूठ और नफरत की बारिश कर रहे हैं और उनके संतरी-मंत्री जयकारा और चालीसा में व्यस्त होने के साथ तमाम विपक्षी पार्टियों के नेताओं की खरीदारी करते जा रहे हैं। यही पिछले 12 वर्षों की कहानी है।

वैसे भी दिनों को गिनना या तारों को गिनना सामान्य भाषा में निठल्ले लोगों का काम होता है। निठल्ले लोग धरातल पर नहीं उतरते बल्कि सपनों में खयाली पुलाव खाते रहते हैं। हमारी सत्ता भी पिछले 12 वर्षों से बस यही कर रही है और विकास किसी धरातल या समाज के बीच नहीं बल्कि हरेक खंभे, दीवारों, शौचालयों और सड़कों पर आड़े-तिरछे लटके/चिपके पोस्टरों में कर रही है। आप बेरोजगारी की बात कीजिए, सत्ता एक ग्रांड ईवेंट कर 10-20 नियुक्ति पत्र बांट देगी और मीडिया बेरोजगारी पर सवाल उठाने वालों को देशद्रोही करार देगी।

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वैसे आजकल देशद्रोही का एक और पर्यायवाची शब्द “सोरोस” के तौर पर मिल गया है। महंगाई की बात कीजिए, सत्ता और मीडिया देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था का राग अलापने लगेगा। देश में जब पानी की किल्लत हाती है तब प्रधानमंत्री जी खूब पानी पीने पर प्रवचन देने लगते हैं। आप जंगलों के बेतहाशा कटाई की बात कीजिए, “एक पेड़ माँ के नाम” का नारा लगने लगता है– पता नहीं माँ के नाम वाला पेड़ है भी या शहीद हो गया। सत्ता के लिए विकास की परिभाषा एक ही है– देश की हरेक संपदा अडाणी/अंबानी के नाम कर दो| सत्ता इसे ही सार्वभौमिक विकास समझ बैठी है। दूसरा सार्वभौमिक विकास देश के सभी शातिर अपराधियों को अपनी पार्टी में शामिल करना है।

झूठ बोलना और जनता को गुमराह करना तो पिछले 12 वर्षों से निरंतर परिपाटी बन गई है। मीडिया इस झूठ को और बड़ा झूठ बनाकर जनता के सामने पेश करती है। अब तो जनता के लिए ना तो सत्ता है और ना ही मीडिया। न्यायालय और संवैधानिक संस्थाएं तो जनता के लिए कभी थी ही नहीं, पर कम से कम खुले आम कभी कुछ नहीं कहती थीं, शर्म का एक झीना आवरण था। पर, अब तो सामान्य जनता “ऑन कैमरा” कोक्रोच, परजीवी और घुसपैठिया करार दी गई है।

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मोदी सरकार में विकास की क्या परिभाषा है, इसके लिए प्रधानमंत्री के ही भाषण का एक अंश देखते हैं, “सवाल यह है कि अगर 12 साल में इतना कुछ हो सकता है तो फिर दशकों तक क्यों नहीं हुआ? ये “काँग्रेस ग्रोथ रेट” और “एनडीए ग्रोथ रेट” का अंतर है। एक व्यवस्था लोगों को इंतजार कराती थी, आज की व्यवस्था परिणाम दिखाती है। एक व्यवस्था काम अटकाती-भटकाती थी, आज की व्यवस्था कहती है काम अभी होगा, समय पर होगा, बड़े पैमाने पर होगा।” यह सब पढ़ने और सुनने में जितना अच्छा लगता है, उतना अच्छा है नहीं और सच्चाई से कोसों दूर है। सबसे बड़ा तथ्य यह है कि कांग्रेस के आंकड़े हमेशा स्थिर रहते थे जबकि तथाकथित एनडीए ग्रोथ रेट के आंकड़े रेत से भी अधिक तेजी से फिसलते हैं।

कभी आप प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गरीबी कम करने के आंकड़ों को गौर से सुनिए/पढिए– अंत में आप भूल चुके होंगें कि गरीब कौन हैं और देश में कितने लोग गरीब हैं। आंकड़ों की बाजीगरी ऐसी है कि 25 करोड़ लोग गरीबी से ऊपर उठकर मध्यम आर्थिक समूह में पहुंच जाते हैं और दूसरे भाषण में ही वापस गरीब बन जाते हैं। नीति आयोग की जिस रिपोर्ट से 25 करोड़ का आंकड़ा आया है, उसे यदि आप पूरा पढ़ें तो एक बड़ा तथ्य यह उभरता है कि आत्मप्रशंसा में विभोर प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल की तुलना में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में गरीबों की संख्या अपेक्षाकृत तेजी से कम हुई थी।

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मार्च 2023 में सरकारी स्तर पर बड़े जोर शोर से प्रचारित किया गया था कि वर्ष 2014-2015 से लेकर 2022-2023 के बीच देश में प्रति व्यक्ति आय लगभग दोगुनी बढ़ गई। इसके अगले ही वर्ष, यानि 2024 में, देश की बड़बोली वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ऐलान कर दिया कि अगले 5 वर्षों के दौरान ही देश में प्रति व्यक्ति आय फिर से दोगुना बढ़ जाएगी और सामान्य आबादी के जीवन स्तर में अप्रत्याशित उछाल आएगा। यह सारे वक्तव्य सुनने में बड़े अच्छे लगते हैं और मीडिया इन्हें खूब प्रचारित करता है- पर वास्तविकता से कोसों दूर हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार प्रति व्यक्ति आय के सरकारी दावे महज एक छलावा हैं, जुमला हैं। वर्ष 2014 से 2022 के बीच प्रति व्यक्ति आय के दुगुना होने के दावों में डॉलर की तुलना में रुपये के अवमूल्यन और बेतहाशा बढ़ती महंगाई दर को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया था। विशेषज्ञों के अनुसार इस पूरी अवधि में प्रति व्यक्ति आय में वास्तविक वृद्धि महज 35 प्रतिशत ही रही थी, और यह वृद्धि भी देश की सबसे समृद्ध 10 प्रतिशत आबादी के हिस्से ही रही थी।

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यदि इन वक्तव्यों को सही मान भी लिया जाए तो वास्तविकता यह है कि प्रति व्यक्ति आय के दुगुना होने के बाद से 80 करोड़ से अधिक आबादी को जिंदा रखने के लिए सरकार को 5 किलो मुफ़्त अनाज देना पड़ रहा है जबकि जब आय आधी थी तब इसकी जरूरत नहीं थी। दूसरी तरफ, अगले 5 वर्षों के दौरान जब प्रति व्यक्ति आय दुगुनी हो जाएगी, तब भी 80 करोड़ से अधिक आबादी को मुफ़्त अनाज देने की जरूरत पड़ेगी। सवाल यह उठता है कि आय दुगुना होने का फायदा किसे मिल रहा है– कम से कम 80 करोड़ से अधिक आबादी को तो बिल्कुल नहीं मिल रहा है। देश में गरीबों की संख्या तो सरकार स्वयं उजागर कर रही है।

हमारे देश में गरीबों की संख्या कितनी है, यह किसी को नहीं मालूम। प्रधानमंत्री मोदी 81 करोड़ जनता को गरीब बता कर मुफ़्त अनाज बांट रहे हैं, दूसरी तरफ यह भी दावा करते रहे हैं कि इनमें से 25 करोड़ जनता अब गरीब नहीं है और मध्यम वर्ग में पहुंच चुकी है। आश्चर्य यह है कि 81 करोड़ जनता को अब भी मुफ़्त अनाज दिया जा रहा है– यानि मोदी राज के विकसित भारत में मध्यम वर्ग और गरीबों के बीच का अंतर भी समाप्त हो गया है। फरवरी 2024 में नीति आयोग के बड़बोले सीईओ ने मीडिया को बताया था कि देश में 5 प्रतिशत से भी कम आबादी गरीब है– यानि गरीबों की संख्या 7 करोड़ से भी कम है। जाहिर है, देश का मध्यम वर्ग भी इस कदर बदहाल है कि उसे 5 किलो मुफ़्त अनाज देकर जिंदा रखा जा रहा है।

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वर्ष 2021 से 81 करोड़ से भी अधिक आबादी को हरेक महीने मुफ्त अनाज दिया जा रहा है और वर्ष 2028 तक यह सिलसिला चलता रहेगा। इन आंकड़ों से तो यही स्पष्ट होता है कि गरीबों की संख्या कम करने के दावों से सत्ता स्वयं आश्वस्त नहीं है। प्रधानमंत्री ने जनवरी 2024 में लोकसभा में वक्तव्य दिया था कि 25 करोड़ लोग पिछले 9 वर्षों में गरीबी रेखा से बाहर आकर मध्यम वर्ग में पहुंच गए हैं, पर उन्हें पहले जैसा ही सरकार द्वारा मुफ्त अनाज मिलता रहेगा। इससे इतना तो स्पष्ट है कि मध्यम वर्ग भी गरीब है और उसे भी हरेक महीने 5 किलो मुफ्त अनाज देकर जिन्दा रखने की जरूरत है।

वैसे भी 81 करोड़ का रहस्यमई गरीबी का आंकड़ा एक बड़ा छलावा है। किसी को पता ही नहीं कि 81 करोड़ गरीब हैं, या इससे 25 करोड़ लोग कम हो चुके हैं या फिर महज 5 से 7 करोड़ आबादी ही गरीब है। प्रधानमंत्री जी एक तरफ तो 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर कर देते हैं तो दूसरी तरफ अभी 12 वर्षों के उपलक्ष्य में चमचमाते विज्ञापनों में प्रधानमंत्री की मुस्कुराती तस्वीर के साथ “गरीबों” की लाभकारी योजनाओं में सबसे पहले 81 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन देने का उल्लेख है।

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मोदी जी द्वारा 25 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर करने का आधार जनवरी 2024 में नीति आयोग द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट है। इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2005-06 में देश की 55.34 प्रतिशत आबादी गरीब थी, पर वर्ष 2013-14 तक यह संख्या 29.17 प्रतिशत ही रह गयी। इस पूरे दौर में डॉ मनमोहन सिंह की सरकार रही और इस रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2005 से 2014 के बीच के 10 वर्षों के दौरान 26.17 प्रतिशत आबादी, यानि हरेक वर्ष औसतन 2.6 करोड़, गरीबी से बाहर आ गयी। इसके बाद 2022-23 में गरीबों की आबादी 11.28 प्रतिशत ही रह गयी।

जाहिर है वर्ष 2014 से 2023 के बीच के 10 वर्षों के दौरान महज 17.89 प्रतिशत आबादी, यानि 24.82 करोड़ आबादी, हरेक वर्ष महज 2.48 करोड़, ही गरीबी रेखा को लांघ पाई। यह पूरा दौर नरेंद्र मोदी का रहा, जिसमें आजाद भारत के किसी भी दौर से अधिक तेजी से गरीबी कम करने के लगातार दावे किये जाते रहे। पर, नीति आयोग की ही रिपोर्ट इस दावे को झूठा करार देती है।

यह मामला केवल गरीबी कम करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक मामलों, स्वास्थ्य, आर्थिक समानता और अर्थव्यवस्था से जुड़ी किसी भी रिपोर्ट को आप ध्यान से पढ़ेंगे तो स्पष्ट होगा कि डॉ मनमोहन सिंह की सरकार मोदी सरकार की तुलना में बहुत आगे थी। विकास का पैमाना मोदी सरकार में अडाणी/अंबानी तक सीमित है, आम जनता तो बस वोट देने और जय श्री राम का नारा लगाने के लिए जिंदा है। वैसे अब तो सत्ता हथियाने के लिए जनता की जरूरत भी नहीं है। 

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