विचार

आकार पटेल / विकास की नाकामी की तरह ही अब लोकतंत्र की नाकामी को भी सामान्य ही समझने लगा है भारत

विकास की नाकामी के एहसास की तरह, हमने लोकतंत्र की विफलता को भी अपना लिया है। अब जो है सो है, जैसा कि हममें से जो लोग समझने लायक हैं, वे जानते हैं।

भारतीय संसद का पुराना भवन
भारतीय संसद का पुराना भवन 

मेरी पीढ़ी (मैं 56 वर्ष का हूं) इस उम्मीद पर बड़ी हुई है कि भारत हमारे जीवन में ही चीन से मुकाबला करते हुए दुनिया की सबसे महान शक्ति बन जाएगा। हमें यह भरोसा था, राजनीति में ऐसी ही बातें की जाती थी और दुनिया भर के पत्र-पत्रिकाओं में इस बारे में लिखा जाता था। 1990 और 2000 के दो दशकों के दौरान यह भरोसा बना रहा।

हां, भारत धीमे-धीमे आगे बढ़ रहा था, हां, भारत उस तरह औद्योगीकरण नहीं कर रहा था जैसाकि चीन, लेकिन यह सिर्फ कुछ वक्त की ही बात थी कि वह चीन की बराबरी कर लेता। एक महान लेखक ने दोनों देशों के भविष्य की तुलना करते हुए कहा था कि चीन का विकासपथ सीधा दिखता था, लेकिन क्षितिज पर एक बहुत बड़ी रुकावट भी थी, और वह थी लोकतंत्र में बदलाव। भारत का रास्ता रुकवाटों वाला था, लेकिन विकास में कोई बड़ी बाधा नहीं थी। यह बात बाद में न सिर्फ़ बहुत आसान बल्कि पूरी तरह से गलत साबित हुई।

मुझे लगता है कि यह पिछले दस सालों में कभी हुआ होगा, हालांकि यह थोड़ा बाद में भी हो सकता है, और महसूस होने लगा कि सारी भविष्यवाणी गलत थी। भारत आर्थिक शक्ति या बड़ी शक्ति के तौर पर चीन का मुकाबला नहीं कर पाएगा, यानी ऐसी शक्ति नहीं बन पाएगा जो दुनिया को प्रभावित कर सके। हम अपने नागरिकों की समृद्धि के लिए जापान, कोरिया, सिंगापुर और चीन जैसे दूसरे एशियाई देशों के रास्ते पर नहीं चल पाएंगे।

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हम भी वैसे ही चलते रहेंगे जैसे कई देश करते हैं, जिसमें ज़्यादातर लोग दुनिया के मानकों के हिसाब से गरीब रहेंगे (भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी दुनिया के औसत का एक चौथाई है)। मेरी पीढ़ी के उन लोगों की महत्वाकांक्षा खत्म हो गई, जिन्होंने अपनी जवानी के 30 से ज़्यादा साल 'उदारीकरण के बाद' के दौर में बिताए और अपने  अनुभवों के आधार पर हकीकत से नतीजे निकालने की स्थिति में हैं। राजनीति से भी उम्मीदें टूट  गई हैं, और हम देख सकते हैं कि भारत फिर से पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ मुकाबला करने वाले वक्त में लौट आया है, और यहीं हम सबसे ज़्यादा सहज महसूस करते हैं और यहीं हमारा राष्ट्रवाद सच में खिलता है।

दुनिया के लेखकों को भी एहसास हो गया है कि हम चीन के बराबर नहीं हैं और द इकोनॉमिस्ट और द वॉल स्ट्रीट जर्नल के कवर पेज और फीचर स्टोरीज़ में जो दो देशों को एक साथ दिखाया जाता था, अब वैसा नहीं होता।

एक दूसरी बात भी समझ में आई है, जो भारत को देखने वालों को पिछले दशक में पता चली है। इतने समय तक यह माना जाता था कि भले ही भारत उम्मीद के मुताबिक आर्थिक चमत्कार नहीं कर रहा था, लेकिन वह लोकतांत्रिक था और इसी वजह से वह अलग था।

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एक और बात जो समझ में आई, वह यह कि भारत लोकतंत्र और व्यक्तिगत आज़ादी से दूर होकर चुनावी तानाशाही और सीधे-सीधे सत्तावाद की तरफ बढ़ गया है। एक एक्टिविस्ट और लिबरल होने के नाते यह उम्मीद की जा सकती है कि मैं ऐसी बातें कहूंगा, इसलिए यह ज़रूरी है कि इसे उन लोगों के नज़रिए से देखा जाए जो राज्यों का अध्ययन और वर्गीकरण करते हैं।

चार साल पहले, भारत सरकार को एक अमेरिकी थिंक-टैंक की वह बात बुरी लगी थी जिसमें भारत को 'आंशिक रूप से आज़ाद' और कश्मीर को, (जिसे उसने अलग से क्लासिफाई किया था), 'आज़ाद नहीं' बताया था।

सरकार ने एक प्रेस रिलीज़ जारी करके जवाब दिया था, जिसमें कहा गया था: 'भारत में संघीय ढांचे के तहत कई राज्यों में राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के अलावा दूसरी पार्टियों का शासन है, जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के ज़रिए होता है, जिसे एक स्वतंत्र चुनाव निकाय करवाता है। यह एक मज़बूत लोकतंत्र के काम करने का तरीका दिखाता है, जो अलग-अलग विचार रखने वालों को जगह देता है।'

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यह ईमानदार रुख नहीं था। रिपोर्ट के दो हिस्से थे। पहला, जिसे 40 प्रतिशत वेटेज दिया गया था, वह राजनीतिक अधिकारों पर था। इसमें भारत को 40 में से 34 अंक मिल थे, जिसमें स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, चुनाव आयोग की निष्पक्षता, राजनीतिक पार्टियां शुरू करने की आज़ादी और विपक्ष को अपनी ताकत बढ़ाने के मौके के लिए पूरे नंबर मिले।। इस हिस्से में, भारत को इस बात पर पूरे नंबर नहीं मिले थे कि वोटिंग बिना किसी हिंसा और सांप्रदायिक तनाव के हुई या नहीं। इस पर शायद ही कोई बहस हो सकती है। असल में, सरकार को पारदर्शिता पर भी 4 में से 3 नंबर मिले, जो शायद ज़्यादा ही थे। इसलिए सरकार का जवाब सिर्फ़ वही दोहराना था जो पहले ही मान लिया गया था।

भारत की रेटिंग को बाकी जो 60 फीसदी नुकसान हुआ, वह सिविल लिबर्टीज़ के लिए था, और जो आज़ादी का भी एक हिस्सा है। इस मोर्चे पर भारत का प्रदर्शन बहुत खराब रहा, यानी 60 में से 33 अंक। अभिव्यक्ति की आज़ादी, धर्म की आज़ादी, शिक्षा की आज़ादी, इकट्ठा होने की आज़ादी, एनजीओ को काम करने की आज़ादी (रिपोर्ट में खास तौर पर मेरे संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया पर सरकार के हमले का ज़िक्र किया गया), कानून का राज, न्यायपालिका की आज़ादी और पुलिस द्वारा सही प्रक्रिया के मामलों में भारत की रेटिंग खराब थी। लेकिन ये स्कोर बुश्किल ही सच्चाई को दिखाते हैं।

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जब एक और रिपोर्ट में, इस बार द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने भारत को 'खामियों वाला लोकतंत्र' बताया, तो सरकार ने उन पैमानों की मांग की जिसके आधार पर रिपोर्ट तैयार हुई थी, हालांकि रिपोर्ट में खुद साफ तौर पर कहा गया है कि 'मुख्य कारण नागरिक आज़ादी में कमी' और नागरिकता में धर्म को शामिल करना था।

यहां ध्यान देने की बात यह है कि ये रिपोर्ट्स कुछ साल पहले की हैं। इनके बाद बुलडोजर न्याय का दौर आ चुका है और भारत के चुनाव आयोग द्वारा चलाया जा रहा मताधिकार छीनने का मौजूदा अभियान शुरू हुआ है। कानून के शासन के तहत एक लोकतंत्र के रूप में भारत का मौजूदा मूल्यांकन उन मूल्यांकनों से भी बदतर होगा जिन पर सरकार ने आपत्ति जताई थी।

दूसरी तरफ, सरकार अब ऐसी रिपोर्टों पर न तो कोई आपत्ति करती है और न ही कोई जवाब देती है। वह बाहर से होने वाली आलोचना की आदी हो गई है, ठीक वैसे ही जैसे वह अंदर से होने वाली आलोचना को अनदेखा करती है। विकास की नाकामी के एहसास की तरह, हमने लोकतंत्र की विफलता को भी अपना लिया है। अब जो है सो है, जैसा कि हममें से जो लोग समझने लायक हैं, वे जानते हैं।

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