
13 जनवरी 2026 को, एक बुलडोजर ढाबा गांव में आया और नई एक मंजिला इमारत को आंशिक रूप से ध्वस्त कर दिया। एक सप्ताह बाद, डेस्क और बेंच मलबे के बीच खड़े हैं, क्लास एक से आठ तक के नंबर बताने वाले बोर्ड भी।
यह 48 वर्षीय अब्दुल नईम के सपने के अवशेष हैं। उन्होंने महाराष्ट्र सीमा पर बैतूल कस्बे से 80 किलोमीटर दूर अपने गांव के बच्चों के लिए अंग्रेजी माध्यम का स्कूल चलाने की बात सोची थी। अपने भाई से जमीन खरीदी और स्कूल निर्माण और इसकी साज-सज्जा में अपने पैसे लगाए। दिसंबर 2025 में, मध्य प्रदेश स्कूल बोर्ड से कक्षा आठ तक मान्यता और संबद्धता के लिए आवेदन किया। जनवरी 2026 में, सब कुछ धराशायी हो गया। नईम पर 'अवैध मदरसा' चलाने की योजना बनाने का आरोप लगाया गया, जो पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा), 1996 के अंतर्गत आता है।
लगभग आधी सदी से बिना किसी कटुता या शिकायत के अपने हिन्दू पड़ोसियों के साथ रह रहे मुट्ठी भर मुस्लिम परिवार इस घटना से स्तब्ध हैं।
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अब्दुल नईम जमीन, एक हार्डवेयर स्टोर और कुछ दुकानों के मालिक थे और अच्छी आर्थिक स्थिति वाले ग्रामीण थे। उनकी एकमात्र समस्या पत्नी और तीन बच्चों से मिलने जाना था, जो 25-30 किलोमीटर दूर एक छोटे से कस्बे में रहते थे, जहां बच्चे स्कूल में पढ़ते थे। आसपास कोई अंग्रेजी माध्यम का स्कूल नहीं है। इस कारण, नईम की तरह ही कई महत्वाकांक्षी ग्रामीणों ने दो प्रतिष्ठान चलाने का विकल्प चुना और वे गांव और कस्बे के बीच आना-जाना करते थे जहां उनकी पत्नियां और बच्चे रहते थे।
सबसे नजदीकी सरकारी स्कूल यहां से पांच किलोमीटर दूर है जबकि अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ने के लिए बच्चों को और भी दूर जाना पड़ता है। नईम की खुद की शिक्षा अधूरी रही है और उन्हें अंग्रेजी सीखने का मौका नहीं मिल पाया। उन्होंने ठान लिया था कि उनके बच्चों को इस तरह की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा।
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उन्होंने मेहनत से कमाए 20 लाख रुपये का निवेश किया और दिसंबर 2025 में बोर्ड लगाकर घोषणा की कि एस.के. पब्लिक स्कूल 25 किलोमीटर के दायरे में अंग्रेजी माध्यम का एकमात्र स्कूल है। गांववाले खुश थे कि उनके बच्चे गांव में ही पढ़ाई कर सकेंगे। उन्होंने पहल करने के लिए नईम भाई को बधाई भी दी थी। स्कूल बिल्डिंग गिराए जाने से हैरान एक ग्रामीण ने मीडिया टीम से कहा कि 'यह उनकी अपनी जमीन थी; वे अपना पैसा खर्च कर रहे थे और आसपास के गांवों के बच्चों को भी इसका लाभ मिलेगा। भला निर्माण पर कोई आपत्ति क्यों करेगा?'
जिला प्रशासन का दावा है कि उन्हें 9 जनवरी को गुमनाम शिकायत मिली थी, जिसमें 'अवैध मदरसे' के बारे में बताया गया था जहां अरबी भाषा 'अवैध रूप से' पढ़ाई जा रही है। अगले ही दिन, एसडीएम, स्थानीय तहसीलदार और नगर निरीक्षक ने गांव का दौरा किया। टीम को कुछ भी गड़बड़ नहीं मिला और उन्होंने नईम को बताया कि उनके कागजात सही हैं और शिकायत झूठी है। हालांकि, उन्होंने उन्हें ग्राम पंचायत से 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (एनओसी) प्राप्त करने की सलाह दी।
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नईम उसी दिन पंचायत कार्यालय में औपचारिक एनओसी के लिए आवेदन लेकर पहुंचे। उनका कहना है कि अधिकारी ने आवेदन स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इस बीच, अचानक निरीक्षण की खबर पूरे गांव में फैल चुकी थी। नईम लौटे और चिंतित ग्रामीणों को बताया कि पंचायत ने एनओसी जारी करने से मना कर दिया है, तो उन्होंने रविवार, 11 जनवरी को अधिकारियों का सामना करने का फैसला किया। पंचायत झुक गई और 12 जनवरी को एनओसी जारी कर दी। फिर अगले ही दिन तोड़फोड़ क्यों हुई?
पंचायत अधिकारियों ने नईम को बताया कि ऊपर से बहुत दबाव हैः 'इमारत तोड़नी पड़ेगी' (हमारे पास इमारत गिराने के अलावा कोई विकल्प नहीं है)। उन्होंने संकेत दिया कि बुलडोजर तैयार हैं। घबराए नईम ने ग्रामीणों को यह बात बताई, तो कुछ समझदार लोगों ने सुझाव दिया कि वह बैतूल मुख्यालय के जिला मजिस्ट्रेट नरेंद्र सूर्यवंशी से जनता दरबार में संपर्क करें।
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स्थानीय कार्यकर्ताओं रमेश पांसे और हेमंत वागद्रे के साथ ग्रामीणों का समूह मंगलवार 13 जनवरी को बैतूल के लिए सुबह रवाना हुआ। पांसे बताते हैं कि उन्हें जिला मुख्यालय पहुंचने से रोकने की कोशिश की गई थी। पांसे बताते हैं, 'नईम को एसडीएम और पंचायत अधिकारियों के फोन आए, जिन्होंने ढांचे को आंशिक रूप से ध्वस्त करके समस्या का समाधान करने का सुझाव दिया।' लेकिन जब समूह ने आगे बढ़ने का फैसला किया, तो उन्हें रोकने के लिए एक पुलिस वाहन भेजा गया। उन्हें दोपहर लगभग 12ः30 बजे ही आगे बढ़ने की अनुमति दी गई, तब तक जनता दरबार आधिकारिक रूप से खत्म हो चुका था।
फिर भी, नाराज ग्रामीणों ने डीएम से संक्षिप्त मुलाकात करने में कामयाबी हासिल की। उनमें से एक ने मुलाकात का वीडियो भी रिकॉर्ड किया। यह स्पष्ट रूप से तनावपूर्ण बातचीत थी। वागद्रे को यह पूछते हुए सुना जा सकता है कि 'जब इमारत पर कोई आपत्ति नहीं है, संबद्धता के लिए आवेदन पहले ही भेजा जा चुका है और स्कूल शिक्षा बोर्ड को प्राप्त भी हो चुका है, तो स्कूल को ध्वस्त करने की धमकी क्यों दी जा रही है?' इस पर डीएम ने तीखी प्रतिक्रिया दी कि 'शिक्षा जैसी पवित्र चीज को आप अवैध तरीके से चलाना चाहते हैं?' इमारत को अवैध घोषित करते हुए वह गुस्से में वहां से चले गए और कहा कि वह एसडीएम से जांच करवाएंगे।
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इस बीच, नईम का फोन लगातार बजता रहा। डीएम के सामने अपनी बात रखने में व्यस्त होने के चलते उन्होंने फोन की घंटी नहीं सुनी। जब उन्होंने आखिरकार वापस कॉल किया, तो पता चला कि दो बुलडोजर ढाबा गांव पहुंच चुके हैं और स्कूल को पहले ही गिराया जा रहा था। उन्होंने कांपती आवाज में पत्रकारों से कहा कि 'मैंने उनसे जुर्माने लगाने का आग्रह किया'; 'विनती की और कहा कि स्कूल बंद कर दूंगा; इमारत को न गिराने की गुहार लगाई।'
इस सबको मीडियाकर्मियों ने कैमरे में रिकॉर्ड कर लिया। नईम की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। हालांकि, नुकसान तो हो ही चुका था।
नईम इतने आहत थे कि खुद को आग लगाने की धमकी दी। एक सप्ताह बाद भी वह एकदम सन्नाटे में हैं और अपने सपनों के स्कूल या अपने साथ हुए इस दर्दनाक अनुभव के बारे में बात करने से भी मना कर देते हैं।
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आदिवासी अधिकार समूहों, शिक्षक संघों और नागरिक स्वतंत्रता संगठनों ने प्रशासन की इस कार्रवाई की निंदा करते हुए बयान जारी किए हैं। एक प्रस्तावित स्कूल जिसके पास एनओसी था और जिसकी संबद्धता प्रक्रिया चल रही थी, उसे बिना सूचना दिए कैसे ध्वस्त किया जा सकता है? कार्यकर्ताओं ने कहा कि यह कार्रवाई कमजोर समुदायों को निशाना बनाकर की जा रही दंडात्मक तोड़फोड़ की प्रवृत्ति को दर्शाती है।
ग्रामीणों ने तोड़फोड़ की घटना को अपने मोबाइल फोन से रिकॉर्ड भी किया है। जब एसडीएम बुलडोजर लेकर गांव आए, तो सरपंच रामरती कांगले और उनके पति मदन कांगले ने इसका विरोध किया। एक वीडियो में कांगले को स्कूल को न गिराने की गुहार लगाते हुए दिखाया गया है। इस पर एसडीएम ने कहा कि 'नोटिस तो आपने ही जारी किया था। मैं इसे तुरंत वापस ले रहा हूं। बुलडोजर रोको।' इसके बावजूद बुलडोजर आगे बढ़ गया।
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उधर, एसडीएम ने अपनी उपस्थिति से इनकार किया है जबकि अपने आधिकारिक बयान में, डीएम ने दावा किया कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं थी और विध्वंस के लिए पंचायत जिम्मेदार है। यदि यह सच है, तो पंचायत ने ठीक एक दिन पहले ही एनओसी क्यों जारी की? बिना किसी सूचना के विध्वंस क्यों किया गया? बयान इन परेशान करने वाले सवालों पर मौन है।
नईम इस मुद्दे पर बोलने या मीडिया से मिलने से इनकार करते हैं। उन्होंने न्याय के लिए अदालत जाने से भी मना कर दिया है। वह अपनी समस्याओं को और बढ़ाना नहीं चाहते, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने मामले को आगे बढ़ाया तो सरकार उनके घर और परिवार पर कब्जा कर लेगी।
शिक्षा मंत्री और सचिव को इन सबकी कोई परवाह नहीं है। मामले की जांच का कोई आदेश नहीं दिया गया है। असहमति जताने के सांकेतिक संकेत के तौर पर भी निलंबन या तबादले का कोई आदेश जारी नहीं किया गया है। संबंधित अधिकारियों से कोई स्पष्टीकरण भी नहीं मांगा गया है। हमेशा की तरह 'ऑल इज वेल' है।
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