विचार

महाराष्ट्रः कर्ज माफी के चक्रव्यूह में उलझा किसान, एक बार फिर सरकार की योजना से असमंजस में अन्नदाता

साल 2017 के बाद से महाराष्ट्र में यह चौथी कर्ज माफी है- जो अपने आप में स्वीकारोक्ति है कि पिछले तीन प्रयासों के बावजूद राज्य के किसान कर्ज के जाल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। किसान नेता विजय जावंधिया ने कहा कि यह कर्ज माफी प्रोपेगैंडा से ज्यादा कुछ भी नहीं।

महाराष्ट्रः कर्ज माफी के चक्रव्यूह में उलझा किसान, एक बार फिर सरकार की योजना से असमंजस में अन्नदाता
महाराष्ट्रः कर्ज माफी के चक्रव्यूह में उलझा किसान, एक बार फिर सरकार की योजना से असमंजस में अन्नदाता फोटोः सोशल मीडिया

महाराष्ट्र का किसान यह सब पहले भी देख चुका है। राज्य सरकार कर्ज माफी योजना की घोषणा करती है और इसे बड़ी राहत बताकर ढिंढोरा पीटती है। फिर उलझाने वाली नियम-शर्तें आती हैं, और उसके बाद उनकी समझ से परे डिजिटल औपचारिकताएं शुरू हो जाती हैं। इस बार भी कुछ अलग नहीं है।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा इस महीने की शुरुआत में बड़े धूमधाम से घोषित ‘पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर शेतकरी कर्जमुक्ति योजना’ की पात्रता शर्तों ने किसानों को असमंजस में डाल दिया है। यह योजना बहुत देरी से आई है, जिसने खरीफ सीजन की बुआई शुरू होने के बावजूद बैंकों से नया फसल कर्ज मिलने की संभावनाओं को खतरे में डाल दिया है।

किसान संगठन इस योजना के खिलाफ लामबंद हो गए हैं, जिसे वे राहत से ज्यादा एक ‘स्टंट’ कह रहे हैं। विरोध को देखते हुए सरकार ने अब शर्तों की समीक्षा के लिए एक उप-समिति बनाई है, जिससे इस योजना के लागू होने में और देरी हो रही है। महाराष्ट्र की यह नई कर्जमुक्ति योजना नवंबर 2025 में गठित एक समिति की उपज है, जिसे यह सिफारिश करने का काम सौंपा गया था कि किसानों को उनके बकाया कर्ज से कैसे मुक्त किया जाए।

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साल 2017 के बाद से महाराष्ट्र में यह चौथी कर्ज माफी है- जो अपने आप में इस बात की स्वीकारोक्ति है कि पिछले तीन प्रयासों के बावजूद राज्य के किसान कर्ज के जाल से बाहर नहीं निकल पाए हैं। अनुभवी किसान नेता विजय जावंधिया ने ‘संडे नवजीवन’ को बताया, ‘यह कर्ज माफी प्रोपेगैंडा से ज्यादा कुछ भी नहीं।’ असली मुद्दा किसानों की बहुत कम और गिरती हुई आमदनी है, भले प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों की आय दोगुनी करने का कितना भी बड़ा दावा किया हो।

जावंधिया कहते हैं, ‘जब तक केन्द्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने का वादा पूरा नहीं करती, कर्ज का यह अंतहीन चक्र खत्म होने से रहा।’ उनका सवाल है कि जब ईंधन और उर्वरक (खाद) की कीमतें आसमान छू रही हैं और कृषि उपज के दाम ठिठके हुए हैं, तो किसान कैसे बचेगा?

सबसे तात्कालिक चिंता यह है कि यदि योजना में देरी होती है, तो क्या बकाया कर्ज वाले किसानों को नया फसल ऋण मिल पाएगा? यदि उन्हें बैंक से कर्ज नहीं मिला, तो उनके पास निजी साहूकारों के पास जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा, जो उनसे ब्याज की मनमानी और भारी दरें वसूलेंगे।

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यवतमाल के जालका गांव के एक कपास किसान नितिन खड़से कहते हैं, ‘बैंकों के पास अभी भी नियमों को लेकर स्पष्टता नहीं है, क्योंकि पात्रता की अनगिनत शर्तें हैं। हमारी चिंता यह है कि जब तक पुराना कर्ज चुकता नहीं होता, हमें आने वाले सीजन के लिए नया लोन नहीं मिलेगा।’ यह नई कर्जमुक्ति योजना प्रति किसान अल्पकालिक फसल ऋण के लिए अधिकतम 2 लाख रुपये तक की माफी का प्रावधान करती है। इसके लिए पात्र होने के लिए, कर्ज 1 अप्रैल 2019 से 31 मार्च 2025 के बीच वितरित किया होना चाहिए, जो 30 सितंबर 2025 को बकाया था और 31 मार्च 2026 तक चुकाया नहीं गया हो। यह माफी किसान की जोत की परवाह किए बिना, मूलधन और ब्याज की कुल बकाया राशि पर लागू होती है। सरकार ने इसमें पुनर्गठित फसल ऋणों को भी शामिल किया है, जिससे साफ होता है कि कई किसान पहले भी कर्ज पुनर्गठन की प्रक्रिया से गुजरने के बाद दोबारा डिफॉल्टर हो गए थे।

सबसे विवादास्पद प्रावधान उन किसानों से जुड़ा है जो पहले ही 2019 की ‘महात्मा ज्योतिराव फुले शेतकरी कर्जमुक्ति योजना’ का लाभ उठा चुके हैं। पिछली कर्ज माफी का लाभ लेने वाले किसानों को इस बार पूरा फायदा नहीं मिल सकता है। सरकारी प्रस्ताव के मुताबिक: ऐसे किसानों को दोबारा 2 लाख रुपये तक की पूर्ण माफी नहीं मिलेगी। वे केवल 50,000 रुपये तक की राहत के हकदार हैं।

साफ है, सरकार एक ही कर्जदार को बार-बार पूरी माफी देने से बच रही है, लेकिन इसके कारण विदर्भ और मराठवाड़ा जैसे केवल वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में भारी आक्रोश है। इन क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन, कीटों के हमले, सिंचाई की कमी और कम आय के साथ महंगी लागत की दोहरी मार के कारण फसलें बार-बार बर्बाद होती हैं, जिससे पिछली राहत के बावजूद किसान दोबारा कर्ज के दलदल में धंस गए हैं।

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योजना में एक और बड़ी सीमा तय की गई है। जिन किसानों का बकाया कर्ज 2 लाख रुपये से अधिक है, उन्हें सीधे पूरा लाभ नहीं मिलेगा। वन-टाइम सेटलमेंट (ओटीएस) का लाभ उठाने के लिए उन्हें पहले 2 लाख रुपये से ऊपर की अतिरिक्त राशि अपनी जेब से चुकानी होगी, जिसके बाद सरकार 2 लाख रुपये का बोझ उठाएगी। यही सिद्धांत 50,000 रुपये की रियायत के पात्र लोगों पर भी लागू होता है: सरकारी मदद पाने से पहले उन्हें उस राशि से ऊपर का सारा बकाया खुद चुकाना होगा। वर्तमान शर्तों के अनुसार, ऐसे सेटलमेंट की अंतिम समय सीमा 31 मार्च 2027 है।

दूसरे शब्दों में, यह योजना सबसे ज्यादा कर्जदार किसानों को कोई राहत नहीं देगी। एक किसान जिस पर मान लीजिए 3 से 4 लाख रुपये का कर्ज है, उसे राहत पाने के लिए पहले एक बड़ा हिस्सा चुकाने का इंतजाम करना होगा। अधिकतर किसान ऐसा करने में विफल रहेंगे और इस नई योजना के तहत लाभ पाने के अयोग्य हो जाएंगे।

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ओटीएस का यह विचार अजीब है। केरल ने 2007-2010 की अवधि में इसे कहीं अधिक प्रभावी ढंग से किया था। उसने बैंकों के साथ मामला-दर-मामला आधार पर बहुत कम राशि में समझौता करने के लिए एक किसान आयोग का गठन किया था, ठीक उसी तरह जैसे बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों के एनपीए के लिए किया जाता है। महाराष्ट्र ने ऐसा कुछ नहीं किया।

इसी बीच, राज्य के बढ़ते राजकोषीय घाटे और 11 लाख करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुके कर्ज की चिंताओं के बीच, राज्य सरकार ने 22 जून को विधायिका से 97,706 करोड़ रुपये की पूरक मांगों की मंजूरी मांगी। बजट पेश होने के कुछ ही महीनों के भीतर, मानसून सत्र के पहले ही दिन यह मांग रखी गई। अजित पवार के निधन के बाद से वित्त मंत्रालय का प्रभार संभाल रहे फडणवीस ने सदन को बताया कि इन पूरक मांगों में से 20,552 करोड़ रुपये कृषि कर्ज माफी योजना के लिए आवंटित किए जाएंगे।

सरकार का अनुमान है कि इस योजना से 36,000 करोड़ रुपये की लागत से 56 लाख किसानों को लाभ होगा। जैसा कि ऊपर कहा गया है, यह पूर्ण कर्ज माफी नहीं बल्कि तमाम शर्तों से बंधी एक ऋण-राहत योजना है। इसमें आदतन डिफॉल्टर्स के मुकाबले ईमानदार कर्जदारों को पुरस्कृत करने के लिए एक प्रोत्साहन ढांचा भी बनाया गया है: जिन्होंने 2022-23 और 2024-25 के बीच कम-से-कम दो कृषि वर्षों में कर्ज चुका दिया था, उन्हें 50,000 रुपये तक का प्रोत्साहन मिलेगा। छोटे कर्जदार, जिनका लोन 50,000 रुपये से कम था, उन्हें न्यूनतम 5,000 रुपये के प्रोत्साहन का आश्वासन दिया गया है।

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यह योजना राष्ट्रीय, निजी, क्षेत्रीय ग्रामीण, जिला केन्द्रीय सहकारी बैंकों और कुछ अन्य सहकारी ऋण संस्थानों के लोन को कवर करती है। लेकिन लाभ पाना डिजिटल सत्यापन की एक नई जटिल परत से जुड़ा हुआ है। अनिवार्य प्रमाणीकरण के अलावा, ‘एग्री स्टैक’ किसान डेटाबेस पर पंजीकरण भी अनिवार्य है। इस योजना को पूरी तरह डिजिटल तरीके से लागू किया जाना है, जो एक और कारण है जिससे किसानों को बाहर हो जाने का डर सता रहा है, और उनका यह डर अनुभव आधारित है।

साल 2017, 2019 और 2022 के कर्ज माफी कार्यक्रम डिजिटल सत्यापन प्रक्रियाओं के कारण समस्याओं में फंस गया था। सरकारी प्रस्ताव के भीतर चुपके से एक ‘सहकार स्टैक’ बनाने का प्रस्ताव भी छिपा है। इसका घोषित उद्देश्य एक साझा डिजिटल ढांचे में किसानों के रिकॉर्ड, क्रेडिट हिस्ट्री और सहकारी संस्थानों को एकीकृत करना है।

इसका दीर्घकालिक उद्देश्य महाराष्ट्र में कृषि ऋण और सहकारी प्रशासन के लिए एक बड़ा डेटाबेस तैयार करना जान पड़ता है। लेकिन यह बात उस सरकार के मुंह से शोभा नहीं देती जिसने 2024 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले ‘लाड़की बहिन योजना’ के तहत महिलाओं को बिना शर्त 2,000 रुपये प्रति माह का वादा करके उन्हें पैसे दिए लेकिन चुनाव खत्म होते ही योजना का पुनर्गठन करके 1 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सूची से बाहर कर दिया।

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