विचार

केरल का मलप्पुरम, जहां मजहबों की बेड़ियां तोड़ीं नारियल के एक पेड़ ने

मुस्लिम बहुल मलप्पुरम जिले में चुपचाप सद्भाव के साथ जिंदगी जीने का व्याकरण आज भी उतना ही मजबूत है। मलप्पुरम की रोजमर्रा की जिंदगी आपसी तालमेल और जिम्मेदारी की समझ को बयां करती है। यह ‘मिनी-पाकिस्तान’, ‘जिहादी हब’ जैसे नैरेटिव को धाराशायी करने की कहानी है।

केरल का मलप्पुरम, जहां मजहबों की बेड़ियां तोड़ीं नारियल के एक पेड़ ने
केरल का मलप्पुरम, जहां मजहबों की बेड़ियां तोड़ीं नारियल के एक पेड़ ने फोटोः सोशल मीडिया

करीब चार दशक पहले, केरल के मुस्लिम-बहुल मलप्पुरम जिले के एक छोटे से गांव में, एक नारियल का पेड़ सांप्रदायिक चिंता और तनाव की अनोखी निशानी बन गया था। यह पेड़ एक हिन्दू घर के अहाते में था, बगल की मस्जिद की तरफ झुका हुआ। हर चंद हफ्तों में कोई पका नारियल मस्जिद की टाइल वाली छत पर गिरता, टाइलें टूटतीं और बारिश का पानी अंदर आने लगता। मस्जिद कमिटी ने शिकायत की। हिन्दू परिवार ने पेड़ काटने से मना कर दिया क्योंकि नारियल से उनकी थोड़ी-बहुत कमाई हो जाती थी। 

हर गिरते नारियल के साथ तनाव बढ़ता रहा। हिन्दू घर का बेटा अब हिन्दुत्व की तरफ झुकने लगा था। उसके लिए पेड़ अब सिर्फ पेड़ नहीं था। जब तनाव और बढ़ा, तो दोनों समुदायों के बुजुर्गों ने मामला सम्मानित मुस्लिम नेता, पनक्कड़ सैयद मोहम्मदअली शिहाब थंगल (1936–2009) के पास ले जाने का फैसला किया, जो इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के सुप्रीमो थे और जिनकी नैतिक मान्यता के प्रति सभी धर्मों-दलों में सम्मान था। थंगल ने दोनों पक्षों की बात सुनी। फिर, जेब से कुछ पैसे निकाल मस्जिद कमेटी के प्रेसिडेंट को दिए और कहा, ‘मस्जिद को गिराना होगा। मिट्टी की छत की टाइलों की जगह कंक्रीट लगानी चाहिए।’

मालाबार में एक मान्यता है, इसे आप अंधविश्वास भी कह सकते हैं, कि अगर किसी काम के लिए पहला दान थंगल से मिला तो उस काम को होना तय। जब हिन्दू घर की बूढ़ी औरत को पता चला तो वह उसी रात भागी-भागी थंगल के पास गई, बेटे के किए की माफी मांगी और नारियल का पेड़ काटने का वादा किया। लेकिन थंगल ने यह कहते हुए उसकी पेशकश ठुकरा दी कि, ‘नारियल का पेड़ हमारे जीवन का अमृत है। इसे हर कीमत पर बचाना चाहिए।’ मस्जिद को कंक्रीट से बनाया गया। नारियल का पेड़ अब भी खड़ा है।

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मलप्पुरम में इस कहानी को चमत्कार के तौर पर नहीं, बल्कि एक आसान उदाहरण के तौर पर याद करते हैं कि सामाजिक झगड़े कैसे सुलझाए जाने चाहिए।

पिछले साल, जब मलप्पुरम के पुन्नाथला गांव में श्री लक्ष्मी नरसिम्हा मूर्ति विष्णु मंदिर ने सैकड़ों मुसलमानों को इफ्तार दिया तो देश भर में सुर्खी बनी। टीवी ने सांप्रदायिक सद्भाव का अनोखा उदाहरण बताया। लेकिन मंदिर प्रशासन ने इसे दी जा रही अहमियत को बेवजह बताते हुए कहा कि वे तो दशकों से ऐसा कर रहे हैं। 

मलप्पुरम के सामाजिक पर्यवेक्षक थोपिल शाहजहां कहते हैं, ‘समय इतना बुरा आ गया कि पहले के आम सामाजिक कामों को भी सांप्रदायिक सद्भाव का अनोखा उदाहरण माना जाने लगा है।’

हाल में हुए निकाय चुनाव के नतीजे भी मलप्पुरम के खिलाफ फैलाई गई अफवाहों का करारा जवाब थे। कांग्रेस-आईयूएमएल गठबंधन ने जिला पंचायत के सभी वार्ड जीते, जिसमें सैकड़ों ईसाई और हिन्दू आईयूएमएल के टिकट पर जीते। गठबंधन समझौते के मुताबिक, वाइस-प्रेसिडेंट का पद आईयूएमएल को मिला- सामान्य सीट से जीती एक दलित हिन्दू महिला को। ऐसे जिले में जहां हिन्दुओं को खतरा बताया जाता है, वहां भी ज्यादातर हिन्दूओं ने मुस्लिम लीग और सीपीएम के मुस्लिम उम्मीदवारों के पक्ष में वोट दिया जिससे बीजेपी को सिर्फ 65,000 वोट मिले। एक बीजेपी उम्मीदवार का वोटरों से वादा करना कि अगर वह जीते तो उन्हें अच्छी क्वालिटी का बीफ मिलेगा, कैंपेन की एक मजेदार साइड स्टोरी बन गई।

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मलप्पुरम के रहने वाले और जाने-माने मलयालम लेखक आलमकोड लीला कृष्णन के मुताबिक मुस्लिम-बहुल (70.25 फीसद) मलप्पुरम ‘बहुलवाद का दुनिया का बेहतरीन प्रयोग हो सकता है’। ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों की वजह से 1921 में हुए मप्पिला विद्रोह के अलावा जिले में कोई बड़ा सांप्रदायिक संघर्ष नहीं हुआ। कृष्णन कहते हैं कि मलप्पुरम के मुस्लिम नेता हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव के लिए खड़े रहे। बदले में, हिन्दुओं को स्थानीय नेता और जनहित के लिए उनकी प्रतिबद्धता पर पूरा यकीन है। 

मलप्पुरम की रोजमर्रा की जिंदगी आपसी तालमेल और जिम्मेदारी की समझ को बयां करती है। यह ‘मिनी-पाकिस्तान’, ‘जिहादी हब’ जैसे नैरेटिव को धाराशायी करने की कहानी है। इन लेबलों का सियासी इस्तेमाल होता है, लेकिन वे यह नहीं बताते कि हिन्दू पुजारी मुस्लिमों से चंदा क्यों लेते हैं, मुस्लिम किसान मंदिर के लिए कमल के तालाबों की देखभाल क्यों करते हैं, मस्जिद के आंगन हजारों गरीब परिवारों के लिए, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो, खाने-पीने का केंद्र क्यों बन जाते हैं। 

मलप्पुरम कोई छोटी जगह नहीं। 2011 की जनगणना में यहां की आबादी 4,112,920 थी जिसमें 70.2 फीसद मुसलमान, 27.6 फीसद हिन्दू और 1-2 फीसद ईसाई थे। लगभग 44 फीसद लोग शहरी इलाकों में रहते हैं। ये आंकड़े मददगार हैं, लेकिन वे रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार को नहीं समझाते जो यहां पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार करना आसान बनाते हैं।

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मलप्पुरम में वलंचेरी के बाहरी इलाके में, मूनक्कल जुमा मस्जिद महीने में तीन बार महिलाओं की लंबी कतार के लिए अपना कंपाउंड खोलती है। हर औरत को चावल का महीने का कोटा मिलता है। कभी-कभी गेहूं और चीनी भी मिलती है जो मस्जिद कमेटी द्वारा चलाए जाने वाले एक बड़े कम्युनिटी स्टोर से बांटा जाता है। डोनेशन नमाज पढ़ने वालों से आता है। जो धार्मिक रिवाज के तौर पर अनाज खरीदकर देते हैं। मस्जिद के बाहर, चावल की दुकानों का एक समूह है जो ज्यादातर इसी रिवाज को पूरा करने के लिए है। अंदर, एक छोटी सी प्रोसेसिंग फैसिलिटी में इसकी पैकिंग होती है और फिर टोकन के हिसाब से तैयार बोरे बांटे जाते हैं। इसका फायदा लेने वालों में 21 पंचायतों के 28,000 से ज्यादा परिवार हैं, जिसमें हर धर्म के लोग हैं।

मस्जिद कमिटी के सदस्य के. अनफाल कहते हैं, ‘इसके लिए धर्म कभी पैमाना नहीं रहा।’ चावल लेने वाले आधे से ज्यादा परिवार हिन्दू और ईसाई हैं। कई स्थानीय लोग कहते हैं कि वे पीडीएस के बजाय मस्जिद के इंतजाम को ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि वहां क्वालिटी बेहतर होती है और क्वांटिटी एक समान।

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एडक्कुलम गांव में, मुस्लिम किसान कमल के तालाबों की देखभाल करते हैं, जो केरल के चंद सबसे मशहूर मंदिरों को पूजा के फूल सप्लाई करते हैं। पिछले साल, एडक्कुलम के परिवारों ने गुरुवायूर में तुलाभरम रस्म के लिए सौ किलो से ज्यादा कमल भेजे। कोट्टक्कल में, पालप्पुरम मस्जिद का मिंबर आर्य वैद्यशाला के संस्थापक पी. एस. वारियर ने दिया। पनक्कड़ थंगल परिवार मलप्पुरम की सार्वजनिक जिंदगी में नैतिक सहारा देने वाले का काम करता है।

मुन्नियुर के कलियाट्टक्कवु भगवती मंदिर में, भक्त त्योहार का जुलूस शुरू करने से पहले सबसे पहले माम्बुराम थंगल के मकबरे पर जाते हैं। तिरुर के पास थुनचनपरम्बु में, जो थुनचथु एझुथाचन का जन्मस्थान है, ‘विद्यारंभम’ के दौरान हजारों बच्चों को, जिनमें मुस्लिम परिवारों के भी बच्चे होते हैं, अक्षर सिखाए जाते हैं और मुस्लिम दूध-नाश्ता बांटते हैं।

रोजमर्रा की जिंदगी के इन ताने-बाने के उलट, शक पैदा करने वाली सिसायत ने मलप्पुरम के स्थानीय मामलों को बार-बार देश में गलत रंग में प्रचारित करने की कोशिश की। राष्ट्रीय राजनीति में ‘मिनी-पाकिस्तान’ बेवफाई के लिए इस्तेमाल की की जाने वाली अभिव्यक्ति बन गया है। 2020 में एक गर्भवती हथिनी की हत्या के बाद मलप्पुरम के बारे में तरह-तरह की बातें उड़ीं, जबकि यह घटना उस जिले में हुई भी नहीं थी।

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हाल ही में, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) जैसे ऑर्गनाइजेशन के दफ्तर पर छापे को जमकर प्रचारित किया गया और फिर उसे गहरी साजिश के सबूत के तौर पर पेश किया गया। जब अगस्त 2020 में कोझिकोड एयरपोर्ट पर एयर इंडिया एक्सप्रेस की फ्लाइट क्रैश हुई, तो स्थानीय लोग सबसे पहले मदद करने वाले थे। उन्होंने घायलों को ले जाने के लिए निजी कारों का इस्तेमाल किया, लोगों के सामान की सुरक्षा की, खून दिया और बचे लोगों के खाने का इंतजाम किया। किसी ने नहीं पूछा कि कौन हिन्दू था, कौन मुसलमान। 2001 के कडालुंडी ट्रेन हादसे और अन्य मुसीबतों के दौरान भी ऐसा ही दिखा। 

जब किसी जिले में आपसी मदद के आम तौर-तरीकों को शक की नजर से देखा जाता है, तो सामाजिक पूंजी कमजोर हो जाती है। मलप्पुरम की असली कहानी कहीं और है। यह उस नारियल के पेड़ में है, जिसे नहीं काटा गया। उस मस्जिद में है जिसे कंक्रीट से दोबारा बनाया गया। उस दलित महिला में है जो मुस्लिम लीग के टिकट पर वाइस-प्रेसिडेंट चुनी गई। उस मंदिर में है जो बिना प्रचारित किए इफ्तार कराता है। उस चावल के बोरे में है जो मस्जिद में एक ईसाई महिला को दिया जाता है।

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