
मणिपुर में हिंसा भयावह दर से बढ़ रही है। लोगों की जान जा रही है और इनमें बच्चे भी हैं। बम हमले, गोलीबारी और सशस्त्र लोगों द्वारा अपने समुदायों की सुरक्षा के लिए बनाए गए बफर जोन देखे जा रहे हैं। जिनेवा स्थित आंतरिक विस्थापन निगरानी केन्द्र (आईडीएमसी) की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में दक्षिण एशिया में हुए विस्थापनों में से 97 प्रतिशत मणिपुर में हिंसा के कारण हुए थे।
तीन साल बाद, हम राज्य के भीतर और अधिक हत्याओं, और अधिक झड़पों और और अधिक विस्थापन का खतरा देख रहे हैं। 18 अप्रैल को, नगाओं का एक काफिला सुरक्षाकर्मियों के साथ इंफाल-उखरुल सड़क पर यात्रा कर रहा था। उखरुल जिले में नगाओं पर पहले हुए हमलों के बाद सुरक्षा प्रदान की गई थी। सुरक्षाकर्मियों के जाने के कुछ ही समय बाद, काफिले पर कुकी उग्रवादियों ने हमला कर दिया जिसमें दो नगा मारे गए।
अपने बयान में, तांगखुल नगा जनजाति की सर्वोच्च संस्था- तांगखुल नगा लॉन्ग ने इसे 'क्रूर और अमानवीय हमला' बताया और आरोप लगाया कि सुरक्षाकर्मियों के हटने के तुरंत बाद आतंकवादियों ने लंबी दूरी के हथियारों का इस्तेमाल किया और महिलाओं, बच्चों और बीमार व्यक्तियों को ले जा रहे कई वाहनों पर गोलियां चलाईं।
तंगखुल के नागरिक समाज संगठनों ने एनएच-202 पर मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए कहा कि नागरिकों पर बार-बार होने वाले हमलों ने जनता का विश्वास कम कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि यह घटना मुख्यमंत्री युम्नाम खेमचंद सिंह के उखरुल दौरे के तुरंत बाद हुई, जहां उन्होंने राजमार्ग सुरक्षा में सुधार का आश्वासन दिया था। वॉइस ऑफ नगा यूथ ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर उखरुल और कामजोंग जिलों में केन्द्रीय सुरक्षा बलों की कथित निष्पक्षता की कमी की जांच की मांग की है।
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क्या यह महज दो समुदायों के बीच एक और झड़प है? एक तरह से यह है, लेकिन इन घटनाओं को केवल दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक झड़प के रूप में देखना मणिपुर में हिंसा के लगातार जारी रहने के व्यापक संदर्भ को नजरअंदाज करना है।
हिंसा बढ़ने के प्रमुख स्थानीय कारणों में से एक यह है कि उग्रवादियों, विद्रोहियों और सतर्कता समूहों के हाथों में अभी भी बड़ी मात्रा में हथियार मौजूद हैं। 2023 में, संघर्ष के शुरुआती महीनों में सरकारी शस्त्रागारों और पुलिस स्टेशनों से हथियारों की लूट की खबरें आई थीं।
हथियारों को बरामद करने के प्रयास किए गए और राष्ट्रपति शासन के दौरान ही इनमें से बड़ी संख्या में हथियार बरामद भी किए गए। इनमें लूटे गए, सीमा पार से तस्करी करके लाए गए और राज्य में लंबे समय से जमा अवैध हथियार शामिल थे। इसी कारण बाद की रिपोर्टों में बरामद हथियारों की संख्या लूटे गए हथियारों की संख्या से अधिक बताई गई है।
मीडिया रिपोर्टों में मणिपुर में विद्रोही समूहों, ग्राम रक्षा समूहों, सामुदायिक मिलिशिया, सशस्त्र स्वयंसेवकों, आपराधिक गिरोहों और निजी व्यक्तियों के पास मौजूद हथियारों की पूरी जानकारी नहीं मिलती। विश्लेषक पुलिस शस्त्रागारों से लूटे गए हथियारों की उपलब्धता और (अरमबाई तेंगगोल और मेइतेई लीपुन जैसे) सशस्त्र सतर्कता समूहों के उदय को अपने आप में सुरक्षा खतरे के रूप में उजागर करते हैं।
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म्यांमार से हथियारों की आवक की खबरें आई हैं, जहां म्यांमार की सेना (वहां अब एक नागरिक सरकार है) भारत में विद्रोहियों से जुड़े विभिन्न सशस्त्र जातीय समूहों के साथ एक भीषण युद्ध में लगी हुई है।
एनआईए ने हाल ही में सात विदेशियों को गिरफ्तार किया है, जिन पर म्यांमार में जातीय सशस्त्र समूहों को ड्रोन युद्ध का प्रशिक्षण देने का आरोप है। गिरफ्तार विदेशियों में छह यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक हैं। यूक्रेनियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, लेकिन अमेरिकी नागरिक वैनडाइक का इतिहास दिलचस्प है।
मैथ्यू आरोन वैनडाइक की निजी वेबसाइट के अनुसार, उसंने इराक युद्ध और लीबिया के गृहयुद्ध में भाग लिया था। वह वाशिंगटन स्थित परामर्श फर्म- संस ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल का संस्थापक है जिसकी वेबसाइट कहती है कि यह 'कमजोर आबादी को आतंकवादी और विद्रोही समूहों से खुद का बचाव करने में सक्षम बनाने के लिए मुफ्त सुरक्षा परामर्श और प्रशिक्षण सेवाएं प्रदान करती है।' कंपनी ने 2022 और 2023 के बीच यूक्रेन में भी काम किया और उसने यूक्रेन की सेना को गैर-घातक उपकरणों के उपयोग में प्रशिक्षण और सलाह प्रदान की।
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विश्वसनीय रिपोर्टों से पता चलता है कि चीन के पूर्वोत्तर भारत में हित हैं। उदाहरण के लिए, एशिया-प्रशांत सुरक्षा अध्ययन केन्द्र के डेनियल के. इनौये विश्लेषण से संकेत मिलता है कि भारत को डर है कि चीन म्यांमार और मणिपुर के आसपास की अस्थिरता का इस्तेमाल पूर्वोत्तर में भारत के प्रभाव को कमजोर करने और म्यांमार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कर रहा है। ऐसी खबरें भी हैं कि चीन सशस्त्र समूहों को हथियार मुहैया करा रहा है और कुछ विद्रोहियों को शरण दे रहा है।
दुर्भाग्यवश, मणिपुर में ऐसा कोई राजनीतिक नेता नहीं है जिसे सभी समुदाय सम्मान देते हों। वैकल्पिक राजनीति के अभाव में, समुदाय अपनी संकीर्ण पहचानों के गुलाम बन गए हैं और पहचान की राजनीति के घातक चक्र में फंसे हुए हैं। इसका अर्थ यह भी है कि हमलों की स्थिति में वे अपनी रक्षा के लिए अपने ही सशस्त्र समूहों पर निर्भर हैं और सरकार तथा उसकी सुरक्षा बलों से उनका अलगाव बढ़ता जा रहा है।
मणिपुर में हालात पर वास्तविक चर्चा की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि आलोचना करने वाले किसी भी व्यक्ति को डरा-धमकाकर चुप करा दिया जाता है। सशस्त्र समूह अपने ही समुदाय के लोगों पर भी हमला कर सकते हैं, अगर वे किसी को गद्दार समझते हैं जो उनके समुदाय की आलोचना करने का साहस करता है।
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पहले से ही अस्थिर स्थिति को और भी जटिल बना रही है विदेशी और भारतीय खुफिया एजेंसियों और निहित स्वार्थों की मौजूदगी। भारत सरकार के पास अपनी खुफिया एजेंसियों से आंतरिक और बाह्य सुरक्षा खतरों के बारे में पर्याप्त जानकारी है। फिर भी, इतने लंबे समय से चली आ रही गंभीर समस्याओं का समाधान क्यों नहीं किया जा रहा है? बाहरी ताकतें मणिपुर की कमजोरियों का फायदा उठा सकती हैं।
हमें पहले इस जटिल स्थिति के बारे में जानकारी प्राप्त करनी होगी और फिर कार्रवाई करनी होगी, न कि किसी एक समुदाय के हित में, बल्कि मणिपुर और भारत के हित में।
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