विचार

आकार पटेल का लेख: परंपराओं की अनदेखी कर मोदी सरकार ने साबित कर दिया कि वह कट्टरपंथी है

भारतीय संसद की शुरुआत 1927 में हुई, लेकिन अब एक कुछ नया करने की खातिर इसे खारिज कर दिया गया है, हालंकि यह स्पष्ट नहीं है कि नए भवन की आवश्यकता क्यों है। धार्मिक अनुष्ठान के साथ किए गए उद्घाटन में परंपरावाद के सिद्धांतों को छोड़ दिया गया।

संसद की नई इमारत के उद्घाटन के मौके पर पुजारियों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सौजन्य- @BJP4India)
संसद की नई इमारत के उद्घाटन के मौके पर पुजारियों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सौजन्य- @BJP4India) 

भारतीय संसद की समस्याएं हैं कि यहां बहस की गुणवत्ता, महत्वपूर्ण कानूनों पर चर्चा करने में समय की कमी, भाषणों के अधिकांश हिस्से में गुणवत्ता न होना, अफरातफरी और अराजकता, सांसदों की खरीद-फरोख्त और विपक्ष और अल्पसंख्यक राय की अनदेखी की जाती है।

एक नई इमारत इनमें से किसी भी समस्या को हल नहीं करेगी, और वैसे भी इसकी उम्मीद भी नहीं की जाती। मसलन वंदे भारत ट्रेनें, ये ऐसी समस्या के समाधान के तौर पर पेश की गई हैं जिसका अस्तित्व ही नहीं है। और नए रीति-रिवाजों की शुरुआत के पीछे स्पष्टता या दिशा का अभाव है और इसे नाटकीय रूप में सामने रखना इसे  परंपरावाद के रूप में प्रस्तुत करना है।

आइए देखें क्यों।

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रूढ़िवादिता को " परंपरागत मूल्यों और विचारों के प्रति प्रतिबद्धता के रूप में और परिवर्तन और नवाचार के रूप में वर्णित किया गया है।”

आखिर परंपरागत मूल्य क्या हैं? वे जो रूढ़िवादी, लंबे समय से स्थापित और प्रथा में हैं। ब्रिटेन (यूनाइटेड किंगडम) की संसद एक ऐसी इमारत में है जो 900 साल पुरानी है। हेनरी (तृतीय) के शासनकाल में 1293 में लगी आग ने इसके बहुत से हिस्से को नष्ट कर दिया। इसके बाद 1298 और फिर 1512 में भी इसमें आग लगने की घटन हुई। जो हिस्से आग से जले उन्हें हर बार नए सिरे से बना दिया गया। यह परंपरावाद और संरक्षणवाद है। और, यही एक कारण है कि आखिर हाउस ऑफ कॉमंस (ब्रिटेन की लोकसभा) और हाउस ऑफ लॉर्ड्स (ब्रिटेन की राज्यसभा) का इतना सम्मान है।

अगर आपने ब्रिटेन में संसदीय बहसें देखी हैं, तो स्पष्ट होता है कि वहां कठोर औपचारिकता और मर्यादाओं पर जोर और इनका पालन करने में सदस्यों का अनुशासन स्पष्ट होता है।  और, ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दोनों पक्ष इन मामलों में परंपरावाद को स्वीकार करते हैं।

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सेंगोल को दंडवत करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो सौजन्य - @BJP4India)

भारतीय संसद की शुरुआत 1927 में हुई, लेकिन अब एक कुछ नया करने की खातिर इसे खारिज किया जा रहा है, हालंकि यह स्पष्ट नहीं है कि नए भवन की आवश्यकता क्यों है। उद्घाटन परंपरा में विश्वास के संकेत के रूप में धार्मिक अनुष्ठान के साथ किया गया, लेकिन परंपरावाद के बड़े सिद्धांत को पिछली इमारत के साथ छोड़ दिया गया।

विचारधारा की जड़ सिद्धांतों में होनी चाहिए। तभी सभी किस्म के कामकाज में  रूढ़िवाद पर खुद ध्यान केंद्रित होगा। ऐसा करना आसान नहीं है क्योंकि यह परंपरा और मूल्यों को तात्कालिक लाभ से ऊपर रखता है। परंपरावाद शासकों के लिए एक नियंत्रक के रूप में काम करता है। यह कहता है कि धीमी गति से चलें, जो व्यवस्था काम कर रही है उसे परेशान न करें, जो आपको विरासत में मिला है उसका सम्मान करें और यह समझने की कोशिश करें कि यह क्यों काम करता है।

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परंपरावाद यह भी समझाता है कि सीमाएं हैं, और परंपरावाद खुद इन सीमाओं का पालन करके उनका सम्मान करता है। संस्थानों के बीच जुड़ाव के अक्सर अलिखित नियमों का परंपरावादियों द्वारा नवाचार और आविष्कार के बजाय सम्मेलन और मिसाल के माध्यम से पालन किया जाता है। फिर से, यह दोहराने की आवश्यकता है कि यह विशेष रूप से तब प्रकट होता है जब संस्थानों के बीच तनाव होता है। यह तब होता है जब रूढ़िवादी, परंपरावादी पीछे हट जाते हैं।

कट्टरपंथी व्यक्ति यह सब जानता है और परंपरावाद या रूढ़िवाद की परवाह नहीं करता है। यहां लक्ष्य अतीत को पहले जैसा करना और उससे पूरी तरह से नाता तोड़ना है। कट्टरपंथी का आह्वान पूर्ण राजनीतिक और सामाजिक सुधार का होता है, जिसे भीषण सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के रूप में भी परिभाषित किया गया है।

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भारतीय मुद्रा (करेंसी नोटों) के साथ मौजूदा अनिश्चितता परंपरावाद या रुढ़िवाद नहीं है। यह एक कट्टरपंथी कृत है, बिल्कुल उसी तरह का जिससे कि 2016 में इसकी प्रेरणा मिली थी। इस किस्म के प्रयोगवाद न तो ब्रिटेन और न ही अमेरिका की परंपरावादी सरकारों में मिलेंगे। इन देशों में जिन लोगों के पास बड़े मूल्य के नोट हैं, उन्हें भरोसा है कि जब वे बैंक या बाजार में इन्हें लेकर जाएंगे तो उन्हें आज भी, कल भी और आने वाले दिनों में भी स्वीकार किया जाएगा। अमेरिकी डॉलर पर लिखा होता है, 'यह नोट सभी कर्जों, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के लिए कानूनी मुद्रा है'। अमेरिका में डॉलर या ब्रिटेन में पाउंड लेने से कोई दुकानदार मना नहीं करता है।

परंपरावाद को संविधान और उसके मूल्यों तक विस्तारित होना चाहिए। यदि यह बहुलतावाद और स्वतंत्रता का समर्थन करता है तो परंपरावादियों को उस पर जोर देना होगा। यदि इसमें मौलिक अधिकार शामिल हैं, जिसका अर्थ है कि ऐसे मूल्यों को प्रतिध्वनित करना चाहिए जो सरकारी हस्तक्षेप से उच्च स्तर का संरक्षण देते हैं। संवैधानिक लोकतंत्रों में विपक्ष वैध है और विधायिका का हिस्सा है। इसे दुश्मन के रूप में देखना और विश्वास और निष्कासन के माध्यम से इससे छुटकारा पाने की कोशिश करना परंपरावाद नहीं है क्योंकि यह लोकतांत्रिक नहीं है।

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परंपरावादी उन कानूनों पर सावधानी से अमल करते हैं जो बदलाव लाते हैं। विशेष रूप से ऐसा परिवर्तन जो अस्पष्ट हो। अगर कानून में सुरक्षा उपाय हैं तो इन बदलावों को विराम देना चाहिए। लोकप्रिय कारणों या यहां तक कि राष्ट्रवाद के नाम पर संविधान के कुछ हिस्सों को पूर्ववत करना कट्टरपंथ का कार्य है। इस बात पर गौर करें कि सरकारी कार्रवाई के तीन साल के बाद भी आज कश्मीर कहां। अगर वहां आज भी अनिश्चितता का माहौल है तो इसका कारण यह है कि जो कार्रवाई की गई वह रूढ़िवादी या परंपरावादी नहीं थी।

जब यह कहा जात है कि जो पार्टी इस समय देश में शासन कर रही है वह दक्षिणपंथी है तो इसका अर्थ यह निकाला जा सकता है कि यह परंपरावादी और रुढ़िवादी है। इसे उदारवाद से चिढ़ है, जो समय की भावना के आधार पर कानूनों की व्याख्या करना चाहता है न कि कुछ शाश्वत सिद्धांतों पर। लेकिन यह परंपरावाद किसी भी भाषा या व्यवहार में खुद को प्रकट नहीं करता है। यह गलत चीजों के पीछे भागता है। और इसके भागने के लिए हमेशा एक नई चीज सामने होगी।

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