विचार

म्यांमार में अभी तक तो शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं नागरिक, लेकिन कब तक कायम रहेगा लोगों का धैर्य

म्यांमार में सेना नागरिकों के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को कुचल रही है और पूरी दुनिया ने मुंह बंद कर रखा है। लोग फिलहाल तो शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन यह स्थिति कब तक रह पाएगी, कहना मुश्किल है।

फोटो : Getty Images
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म्यांमार में सैन्य तख्ता पलट के खिलाफ महीने भर से चल रहे विरोध प्रदर्शन को बंदूक के बल पर दबाया जा रहा है। म्यांमार ने लंबे अरसे तक सैन्य शासन को देखा-झेला है और उसने वर्ष 1988 और 2007 में हुए व्यापक विरोध प्रदर्शनों को भी ताकत के बूते दबा दिया था। एक बार फिर सेना का वही रूप देखने को मिल रहा है। शायद सेना को महसूस हो रहा है कि उसके पास समय कम है और जो करना है, आनन-फानन करना होगा। सेना की कार्रवाई में 50 से ज्यादा प्रदर्शनकारियों की जान जा चुकी है। 3 मार्च का दिन अब तक का क्रूरतम रहा है। इस एक दिन सुरक्षाबलों की फायरिंग में कम से कम 38 लोग मारे गए। सोशल मीडिया पोस्टों की जांच की जा रही है और जो भी सेना के खिलाफ और राजनीतिक व्यवस्था की बहाली की बात कर रहा है, उसे गिरफ्तार कर लिया जा रहा है।

म्यांमार से दिल दहला देने वाली तमाम तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं। 3 मार्च की कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत क्रिस्टीन स्क्रैनर बर्गनर ने 38 लोगों के मारे जाने की पुष्टि की है। तख्ता पलट के बाद यह सबसे खूनी दिन रहा। लेकिन आसियान देशों या संयुक्त राष्ट्र पर इनका इतना असर नहीं पड़ रहा कि म्यांमार का शासन अपने हाथ में लिए बैठे सैन्य जनरलों पर वे जरूरी दबाव बना सकें। इतना जरूर है कि दुनिया के तमाम देशों ने म्यांमार के हालात पर चिंता जताई है और सैन्य शासन से संयम से काम लेने का आह्वान किया है। लेकिन जमीनी हकीकत तो यही है कि म्यांमार के लोगों को क्रूर सेना से निपटने के लिए अकेला छोड़ दिया गया है।

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म्यांमार के सैन्य शासन के विरोध के कारण अपने तमाम साल जेल में बिता चुकीं 75 वर्षीय आंग सान सू की हिरासत में हैं। आम लोगों के बीच वह आज भी बेहद लोकप्रिय हैं, हालांकि इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में सेना का बचाव करने के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी छवि जरूर कमजोर हुई है। उन्होंने सेना के साथ सत्ता साझा की लेकिन रोहिंग्या मुसलमानों के नरसंहार को रोकने में असमर्थ रहीं। इसमें कोई संदेह नहीं कि रोहिंग्याओं को इंसाफ दिलाने में वह विफल ही रहीं। अब जब खुद उन पर तमाम तरह के आरोप लग चुके हैं, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्हें उतनी सहानुभूति नहीं मिल पा रही है।

सेना ने 1 फरवरी को जिस आसानी के साथ निर्वाचित राष्ट्रपति आंग सान सू की और अन्य नेताओं को हिरासत में लेते हुए सत्ता पर कब्जा कर लिया, उससे एक बात शीशे की तरह साफ हो गई है कि म्यांमार में लोकतंत्र की जड़ें कितनी कमजोर थीं। सू की पर छह वॉकी टॉकी की तस्करी और अब हिरासत में रहते हुए लोगों को उकसाने का आरोप लगाया गया है। दावा किया गया कि आंग सान सू की को वर्चुअल तरीके से अदालत के समक्ष पेश किया गया था, हालांकि उन्हें अपने वकीलों की टीम से मिलने नहीं दिया गया।

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मौजूदा हालात में पूरे देश में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। हजारों की टुकड़ियों में लोग सड़कों पर निकलकर विरोध कर रहे हैं। कुछ भी हो, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले एक दशक के दौरान लोगों को आंशिक ही सही, आजादी का जो स्वाद चखने का मौका मिला और यह उसी का असर है कि लोग अपने आप सड़कों पर निकल आए हैं। शायद इसलिए कि लोग नहीं चाहते हैं कि बड़ी मुश्किल से जिस सैन्य सत्ता से उनका पीछा छूटा, वह फिर से बागडोर अपने हाथ में बनाए रखे।

म्यांमार में विभिन्न जाति-धर्म को मानने वाले लोग हैं। यहां बौद्धों की आबादी करीब 88 फीसदी है। फिर मुसलमान, कचिन, करेन, राखीन जैसे अल्पसंख्यक समुदाय हैं। तख्ता पलट के बाद सभी समुदाय परस्पर मतभेदों को भुलाकर एकजुट होकर सड़कों पर निकलकर सेना का विरोध कर रहे हैं। इनमें से तमाम लोगों ने सार्वजनिक तौर पर अल्पसंख्यक रोहिंग्याओं, कचिन और करेन जैसे अल्पसंख्यक समुदायों के साथ हुए खराब बर्ताव पर अफसोस जाहिर किया है।

चीन और भारत- दोनों ही का अपना- अपना धर्म संकट है। दोनों ही देशों ने न तो म्यांमार की सेना की निंदा की और न ही निर्वाचित नेताओं का समर्थन किया। भारत लोकतंत्र समर्थक है लेकिन उसने म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के लिए अपनी आवाज मुखर नहीं की। न तो म्यांमार में चीन विरोधी भावना बढ़ने और चीनी वस्तुओं के बहिष्कार के आह्वान के बावजूद बीजिंग ने जनरलों से विरोध जताया। इंडोनेशिया ने गतिरोध दूर करने का यह उपाय सुझाया कि चूंकि सेना को लगता है कि नवंबर में हुए चुनाव के परिणाम सही नहीं हैं तो वह दोबारा चुनाव कराले। लेकिन जैसे ही इंडोनेशिया के इस बयान के बाद म्यांमार में जनता का गुस्सा फूटा, वह आनन-फानन में अपने बयान से पीछे हट गया।

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म्यांमार में नेताओं के साथ अधिकारियों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों को भी गिरफ्तार कर लिया गया है। सेंट्रल बैंक के उप गवर्नर बो बो नगे को 1 फरवरी को सैनिक उठाले गए और उसके बाद उनके परिवार ने अब तक उन्हें नहीं देखा, उन्हें नहीं पता कि बो बो किस हालत में कहां हैं। बो बो ने अमेरिका में पढ़ाई की और अर्थशास्त्री के तौर पर अपना कॅरियर शुरू किया और वह लौटकर म्यांमार आए थे। जब वह म्यांमार में पढ़ाई कर रहे थे, उन्होंने 1988 में सेना के खिलाफ प्रदर्शन में भाग लिया था और इस कारण उन्हें तब गिरफ्तार भी किया गया था। उस कम उम्र में ही जेल जाने के कारण बो बो म्यांमार के पुनर्निर्माण में योगदान देना चाहते थे। 2017 में उन्हें डिप्टी गवर्नर नियुक्त किया गया। इस बार जिन अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है, उनमें से ज्यादातर बो बो की तरह हैं। 1988 में वे छात्र थे और तब उन्हें जेल में भी डाला गया था। बो बो लगभग तीन दशक के बाद दोबारा जेल में हैं।

3 मार्च को भी म्यांमार में जगह-जगह हो रहे प्रदर्शनों का सिलसिला जारी रहा। यंगून में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और तमाम लोगों को हिरासत में ले लिया गया। यूंगून से लेकर दक्षिण पूर्व म्यांमार के दावेई जैसे छोटे शहरों में भी जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं और बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार करके जेल में भरा जा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से तकरीबन दो दर्जन पत्रकारों को भी गिरफ्तार किया गया है। अब तक तो म्यांमार के लोगों ने अत्याचारी सेना का डटकर विरोध किया है । लेकिन बड़ा सवाल यही है कि यह कब तक?

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म्यांमार में सेना जिस तरीके से विरोध प्रदर्शन को कुचल रही है और पूरी दुनिया ने मुंह बंद कर रखा है, उसे देखते हुए अनुमान तो यही है कि अंततः आम लोगों का यह प्रदर्शन दम तोड़ देगा। हां, इतना जरूर है कि इस बार सेना के लिए लोगों को काबू करना ज्यादा मुश्किल भरा काम होगा। लोग फिलहाल तो शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन यह स्थिति कब तक रह पाएगी, कहना मुश्किल है। लोगों का गुस्सा अब काफी हद तक मुखर होकर सामने आ रहा है। प्रदर्शनकारियों ने वरिष्ठ सैन्य जनरल मिन आंग ह्लेंग के खिलाफ पोस्टर के साथ मार्च किया जिस पर लिखा था,: “तुम्हें शर्म आनी चाहिए तानाशाह! हम तुम्हें कभी माफ नहीं करेंगे”। प्रदर्शनकारियों ने आसपास से गुजर रहे लोगों को जनरल के पोस्टर को जूते मारने के लिए प्रोत्साहित किया। जनरल के पोस्टर सड़क पर इधर-उधर बिखरे पड़े थे और इस कारण सुरक्षाबलों को आगे बढ़ने से पहले सड़क से उन पोस्टरों को उठाते देखा गया। एक युवती का वह वीडियो पिछले दिनों वायरल हुआ जिसमें वह रोती हुई चीख रही है कि “मैं मर जाऊंगी लेकिन तुम्हें कभी माफ नहीं करूंगी”।

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संयुक्त राष्ट्र में राजदूत क्यॉ मो तुन को बर्खास्त करने के बाद सैन्य शासन ने विदेशों से तमाम राजदूतों और राजनयिकों को वापस बुला लिया। मो तुन ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में कहा था कि वह आंग सान सू की सरकार का प्रतिनिधित्व करते हैं और वह म्यांमार के खिलाफ प्रतिबंध लगाए जाने की अपील करते हैं। उन्होंने बड़े साफ शब्दों में कहा था कि, “सैन्य तख्ता पलट को तुरंत खत्म करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हरसंभव सख्ती से पेश आना चाहिए।” म्यांमार के सरकारी टीवी एमआरटीवी ने कहा कि राजदूत ने “देश के साथ विश्वासघात किया है और एक ऐसे संगठन की बात की है जो अब देश का प्रतिनिधित्व नहीं करता और ऐसा करना एक राजदूत के अधिकारों और जिम्मेदारियों का दुरुपयोग है।” इसी के तुरंत बाद म्यांमार ने अपने कई राजनयिकों को वापस बुला लिया।

समाचार एजेंसी रॉयटर ने एक कार्यकर्ता शर यमोन के हवाले से कहा, “लोग शांतिपूर्ण तरीके से विरोध कर रहे हैं लेकिन वे हमें हथियारों से धमका रहे हैं; हम उस सैन्य गुंडागर्दी को खत्म करने के लिए लड़ रहे हैं जो पीढ़ियों से चली आ रही है।” लेकिन हालात यही है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने म्यांमार से अपने को एक तरह से अलग ही कर रखा है और इस वजह से भी सैन्य शासन को प्रदर्शनकारियों के साथ और सख्ती से पेश आने का मौका मिल गया है।

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