रंग चढ़ना तो कई साल पहले ही शुरू हो गया था, इस बार यह रंग अपने पूरे शबाब पर दिखा। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) का हर साल होने वाला नाट्य उत्सव इस बार पूरी तरह सत्ता के रंग में रंगा दिखा। अब जबकि महोत्सव खत्म हो चुका है, कुछ सवाल अब भी अनुत्तररित हैं। इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिला कि महोत्सव की टैगलाइन ‘एक रंग, श्रेष्ठ रंग’ का क्या कोई खास अर्थ था। एक रंगकर्मी ने धूमिल की पंक्ति उद्घृत करते हुए पूछा- “पार्टनर, क्या इस ‘एक रंग’ का कोई खास मतलब होता है।” वह धूमिल की वह कविता याद कर रहे थे- “क्या आजादी सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है/ जिन्हें एक पहिया ढोता है/ या इसका कोई खास मतलब होता है।” आगे उनका सवाल था- “क्या यह भी “एक हैं तो सेफ हैं, जैसा कोई ‘अभिनव’ प्रयोग मान लिया जाए कि इसे भी बस एक और रंग मानकर इग्नोर कर दिया जाए।”
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भारतीय रंग महोत्सव यानी ‘भारंगम’ का यह राष्ट्रीय कार्यक्रम दिल्ली में हाल-फिलहाल का नहीं है, सालों से होता चला आ रहा है। बल्कि यह तो 25 पूर्ति का ‘भारत रंग महोत्सव’ था। महोत्सव ने इस सफर में कई हुकूमतों की हवाएं अपने ऊपर से गुजरते देखीं लेकिन जो रंग पिछले कुछ सालों में दिखा या महसूस हुआ, वह किसी से छिपा नहीं है। पहले भी अन्य सरकारों के मातहत यह आयोजन हुआ लेकिन तब ‘उनका रंग’ कहीं दिखता नहीं था। प्रत्यक्ष तो बिलकुल नहीं। वहां अलग-अलग रंग, उनके शेड्श दिखाई देते थे। लेकिन इस बार ‘एक रंग, श्रेष्ठ रंग’ जैसी टैगलाइन ने इस पर चढ़ा नया रंग पूरी तरह दिखा दिया। यह टैगलाइन तो हर होर्डिंग और निमंत्रण पर दिखी ही, पच्चीस वर्ष पूर्ति के लेटर में ही नहीं, होर्डिंग से लेकर अन्य सभी अवसरों पर भगवा रंग का जैसा प्रयोग हुआ, वह भी इसी को स्थापित करता दिखा। एक रंगकर्मी ने कहा ‘एक रंग, श्रेष्ठ रंग’ से शायद उनका यही मतलब है?
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कहना न होगा कि नया वर्ष शुरू होते ही साहित्य की दुनिया में जिस तरह प्रगति मैदान में लगने वाले विश्व पुस्तक मेला के वृहद् आयोजन की प्रतीक्षा रहती है, वैसे ही देश भर के रंगकर्मियों को मंडी हाउस में होने वाले भारतीय रंग महोत्सव या ‘बीआरएम’ की रहती है। इस बार नाटक का यह महाकुंभ 28 जनवरी से शुरू होकर 16 फरवरी 2025 को संपन्न हुआ। मुख्य आयोजन का केन्द्र तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली था, लेकिन देश के विभिन्न 13 नगरों-महानगरों जैसे अगरतल्ला, अहमदाबाद, बेंगलुरु, भटींडा, भोपाल, गोवा, गोरखपुर, जयपुर, खैरागढ, रांची के अलावा काठमांडू (नेपाल) और कोलंबो ( श्रीलंका) में भी इसके आयोजन हुए। भारंगम का सेंट्रल पॉइंट इस बार एनएसडी परिसर में अभिमंच, बहुमुख, ओपन एयर बहुमुख, सम्मुख होने के अलावा मंडी हाउस का श्रीराम सेंटर, एलटीजी, एसएनए मेघदूत और कमानी ऑडिटोरिम इसके अहम हिस्सा बने, हर शाम नाटकों के मंचन हुए और दिन में रंगमंच संबंधी बहस-मुबाहसे, गीत-संगीत- पुस्तक लोकार्पण या मुम्बइया सेलिब्रिटीज से संवाद का सिलसिला चला।
जगजाहिर है, जो अब तक नहीं हुआ, अब होने जा रहा है। एनएसडी एक स्वायत्त संस्था होने के बावजूद इस पर अप्रत्यक्ष रूप से किस राजनीति का दबाव लगातार बढ़ रहा है, वह सवा घंटे विलंब से आए केन्द्रीय संस्कृति मंत्री के उद्बोधन से सामने आ गया। उनका कहना था कि नेता और अभिनेता में ज्यादा अंतर नहीं है। अब तो हर राजनेता अभिनय में माहिर हो गया है। उन्होंने भी ‘भारंगम’ जैसे प्रतिष्ठित आयोजन को ‘भारतीय संस्कृति के सबसे अहम रंग’ से जोड़ने पर जोर दिया। एक पत्रकार ने सवाल भी उठाया कि आखिर एनएसडी के भारंगम में ऐसा यह कौन सा रंग है और वह श्रेष्ठ रंग कैसे है? तो स्वाभाविक रूप से उनका कोई जवाब नहीं था। हालांकि रंग का खुलासा तब स्वतः हो गया जब संस्कार भारती के प्रमुख अभिषेक बनर्जी को मंच पर बुला कर सम्मानित किया गया। यह बहुप्रतीक्षित सवाल का सांकेतिक जवाब जैसा था।
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हालांकि बाद में महोत्सव के नाटकों के मंचन से गुजरते हुए परदा पूरी तरह हट चुका था। ज्यादातर निर्देशक सत्ता की नजर में आने के लिए ज्यादा से ज्यादा धार्मिक (संस्कारी) बनने की कोशिश करते दिखे। निर्माण कला मंच के निर्देशक संजय उपाध्याय ने तो भिखारी ठाकुर के नाटक ‘बिदेसिया’ की शुरुआत ही मंगलाचरण को धार्मिक अनुष्ठान में तब्दील कर की। सूत्रधार और उसके सहयोगी गुटका पर रखे रामचरितमानस का सस्वर पाठ करते दिखे। भिखारी ठाकुर के लेखन पर रामचरितमानस मानस के प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन मंगलाचरण को जिस तरह एक धर्मविशेष के अनुष्ठान से जोड़ कर प्रस्तुत किया गया, उससे निर्देशक की मंशा साफ हो जाती है । संजय उपाध्याय वैसे भी संस्कार भारती के बिहार के शीर्ष लोगों में हैं। स्लोगन या टैगलाइन में जिस ‘श्रेष्ठ रंग’ को इशारों में रखा गया था, एनएसडी के बनारस सेंटर ने निर्लज्जता से ‘उत्तर रामचरितमानस’ में उसे खोल कर रख दिया। भवभूति का जो नाटक सीता के पक्ष से राम की आलोचना का है, उसे काट छांटकर राममय बना। प्रस्तुति न तो शंबूक के सवालों पर फोकस करती है, न वनवास का एकांत जीवन जी रही सीता का कोई तार्किक पक्ष ही दिखता है। पूरा नाटक राम के महिमा मंडन और सीता को लाचार, विवश, कमजोर, निर्बल साबित करने में लगा दिखता है।
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सामाजिक यथार्थ से मुठभेड़ करने के बजाए अधिकतर नाट्य संस्थाएं पौराणिकता में ही समसामयिकता तलाशने का प्रयास करती दिखीं। सत्यब्रत राउत निर्देशित ‘अंकिता केशरी’ हो या लोकरंग के तहत ओपन एयर बहुमुख में मंचित नाटक, सारे के सारे पौराणिक विषय के बहाने जो दर्शकों के बीच कथ्य-विचार सामने ला रहे थे, सब कहीं-न-कहीं एक विशेष धर्म, उसके रंग की ही स्थापना करते दिखे। कहीं से भी उनकी पक्षधरता जनता का जीवन, उनका संघर्ष या उन पर होने वाले शोषण-दमन नहीं था। एक्स थिएटर एशिया, ताइवान की प्रस्तुति ‘कर्ण’ जिसे हिमांशु बी जोशी ने लिखा और जयंत मितेई ने निर्देशित किया था, जाति का सवाल तो उठाती दिखी, लेकिन मूल व्यवस्था पर चोट करने से वह भी बचती नजर आई। अभिनय और संगीत पक्ष से अत्यंत सुदृढ़ यह नाटक ताइवानी और हिन्दुस्तानी कलाकारों के सामूहिक प्रयासों से तैयार किया गया था। देखने में यह नाट्य प्रस्तुति भव्य और अलंकृत भले हो, व्यवस्था विरोध में कहीं कोई स्वर जोड़ने का प्रयास भी नहीं करती दिखी, जबकि उसकी पूरी गुंजाइश थी। बल्कि यहां जैसा प्रतिरोध दिखा भी, वह अंततः सत्ता पक्ष में ही खड़ा, यानी यथास्थितिवाद का पोषक दिखता है।
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सत्ता की संस्कृति और उनकी विचारधारा का आतंक प्रत्यक्ष भले न दिखा हो, पूरे महोत्सव पर काले बादल की उसकी छाया बनी रहती है। कोई लिखित आदेश न भी हो, सीधा मौखिक बयान भी इस रूप में न हो, लेकिन रंगकर्मियों के बीच यह संदेश स्पष्ट दिखा कि किसी भी प्रस्तुति में सत्ता के प्रति असहमति का स्वर मंज़ूर नहीं है। 12 फरवरी को अभिमंच में रागा, पटना की प्रस्तुति ‘स्मॉल टाउन जिंदगी’ थी। यह नाटक हृषीकेश सुलभ के उपन्यास ‘दातापीर’ पर आधारित था जिसका नाट्य रूपांतरण कृष्णा समिधा ने किया है। यह नाटक पटना के एक इलाके में रहनेवाले उस मुस्लिम परिवार की कहानी है जो कब्रिस्तान में कब्र खोदने का काम करता है। पूरा नाटक एक परिवार की जिंदगी, उसके उतार-चढ़ाव और उनके द्वंद्व-अन्तर्द्वन्द्व के दायरे में घूमता रहता है। लेकिन नाटक को जानबूझकर कर इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि उनकी लाचारी, बदबूदार जिंदगी तो सामने आए, लेकिन उनके बीच से किसी तरह का विरोध न दिखे। आजकल देश का मुसलमान जिस तरह डरा हुआ, शक के घेरे में जीवन गुजार रहा है, उनके साथ बहुसंख्यक समाज के जुल्म, सत्ता द्वारा दोयम मान लिए जाने जैसे किसी सच से नाटक बचता दिखाई देता है। शायद बचने की इसी कोशिश में इसका शीर्षक भी बदल कर ऐसा रख दिया गया जो मूल्य कथ्य की जरा सी आहट तक नहीं देता।
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लेकिन निश्चित ही कुछ निर्देशक ऐसे भी दिखे जिन्होंने कोई समझौता नहीं किया और सच को किसी न किसी रूप में ला पाने में सफल रहे। जॉय मैसनाम की ‘द जर्नी ऑफ सॉरो’ और एनएसडी डिप्लोमा प्रस्तुति ‘रोमियो, जूलिएट और अंधेरा’ इसी कड़ी में हैं। जॉय मैसनाम एनएसडी, सिक्किम सेंटर के छात्रों के साथ किसानों की आत्महत्या को शारीरिक अभिनय के जरिये उनके आंदोलन का विश्लेषण करते हैं तो रजनीश कुमार ने नाजीवाद में प्रेम पर लगे पहरे और यहूदियों पर हुए अमानवीय जातीय जुल्मों को दर्शकों से ऐसे रूबरू कराया कि उन्हें बैकग्राउंड में चलने वाली टैंक, बम-बारूद के बीच अपने देश में चलने वाली बुलडोजर की गरजती आवाज ज्यादा सुनाई पड़ रही थी। दर्शक मंच पर भले ही जर्मनी में हिटलर के ढाए आतंक को देख रहा था, लेकिन उसे आभास अपने देश में फासीवाद की आहट का हो रहा था।
लेकिन इस पूरे उत्सव का एक बड़ा और क्रूर सच यही है कि यहां अगर कहीं, किसी स्तर पर भगवा रंग के विरोध का कोई स्वर रहा भी तो उस कोशिश को सुनने के लिए कान लगा कर सुनने की जरूरत है। यह कोशिश जारी रहनी चाहिए, भले वह हल्की-धीमी-दूर की ही क्यों न हो…। हमें नहीं भूलना चाहिए कि हम अनेकता में एकता वाले लोग हैं। ऐसे में किसी एक रंग, एक भाषा, एक जाति को श्रेष्ठ कैसे कह सकते हैं। ऐसी विभिन्नताओं के बीच ‘एक’ की तलाश और उसे श्रेष्ठ बताना, हमारे देश की मूलभूत अवधारणा से ही अलग है, जहां हम कहते नहीं थकते हैं कि हम वसुधैव कुटुंबकम् में विश्वास करते हैं। सोचें कि अपनी नई स्थापना के साथ आप भारंगम को आखिर किस दिशा में ले जाना चाहते हैं?
लेखक वरिष्ठ रंगकर्मी, नाटककार और लेखक हैं।
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