विचार

जलवायु परिवर्तन नियंत्रण से गायब है जनस्वास्थ्य, भारत समेत दुनिया के कई देश गंभीर नहीं, स्थिति विकराल

तमाम सबूतों और बढ़ते प्रभावों के बाद भी दुनिया जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि को रोकने के लिए जरा भी गंभीर नहीं है। पूंजीवाद और कट्टर दक्षिणपंथियों के सत्ता में आने के बाद से यह समस्या पहले से अधिक विकराल हो चली है।

जलवायु परिवर्तन नियंत्रण से गायब है जनस्वास्थ्य, भारत समेत दुनिया के कई देश गंभीर नहीं, स्थिति विकराल
जलवायु परिवर्तन नियंत्रण से गायब है जनस्वास्थ्य, भारत समेत दुनिया के कई देश गंभीर नहीं, स्थिति विकराल फोटोः महेंद्र पांडे

इन दिनों दिल्ली में यमुना झाग की भीषण समस्या से जूझ रही है और वायु प्रदूषण की स्थिति हरेक दिन बदतर हो रही है– ऐसे में हरेक टीवी चैनल पर आजकल दिल्ली सरकार के प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित विज्ञापन लगातार चल रहे हैं। बीजेपी सरकारों की किसी समस्या समाधान की यही नीति है– या तो मणिपुर जैसे समस्या को जनता तक पहुंचने से रोक दो, या फिर बढ़ते प्रदूषण के बीच प्रदूषण नियंत्रण के लंबे रंगीन विज्ञापन, जिसमें मुस्कराते मोदी जी और मुस्कराती रेखा गुप्ता की तस्वीर हो, जनता के बीच पहुंचा दो। जनता को समस्या के बीच देखकर मुस्कराते चेहरे ही बीजेपी सरकारों के समस्या-समाधान की टूलकिट है।

एक-दो दिन पहले ही समाचारों में झाग से पटी यमुना नदी के चित्रों के ठीक बाद गृहमंत्री अमित शाह तरह-तरह से हाथ हिलाकर, बड़ी-बड़ी डरावनी आंखें बनाकर और चीखकर यमुना नदी की समस्या के लिए अरविन्द केजरीवाल को जिम्मेदार ठहरा रहे थे, उन्हें यमुना में डुबकी लगवा रहे थे और अगले तीस साल तक सत्ता में बैठने की बात कर रहे थे। वैसे भी चुनाव लड़ने वाले अगले चुनाव के नतीजे नहीं जानते, पर यहां तो चुनाव को लूटना है, हड़पना है, ज्ञानेश कुमार करना है– फिर तीस साल ही क्यों?

बीजेपी के सत्ता में आने के बाद से सरकारी स्तर पर प्रदूषण की चर्चा से अधिक जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि की बातें होती है। प्रधानमंत्री मोदी अक्सर क्लाइमेट चेंज रिज़िलिएन्स और सौर ऊर्जा की बातें करते हैं। सौर ऊर्जा में अडानी का एकाधिकार है, हरेक सरकारी सहायता उनके साथ है, जिस जमीन पर हाथ रखते हैं वह जमीन मुफ़्त में सरकार उपहार में दे देती है, ऐसे में इस क्षेत्र में तरक्की निश्चित तौर पर जलवायु परिवर्तन नियंत्रण में उपलब्धि कम और अडानी को फायदा पहुंचाने का माध्यम अधिक है। प्रधानमंत्री मोदी भले ही अपने आप को जलवायु परिवर्तन नियंत्रण में विश्वगुरु के तौर पर प्रस्तुत करते हों, पर जब भी कोई भी संस्था इस संदर्भ में देश की नीतियों का विस्तृत आकलन करती है, तब हम दुनिया के सबसे अंतिम देश बन जाते हैं।

हाल में ही अन्तरराष्ट्रिय वैज्ञानिकों का एक समूह, ग्लोबल क्लाइमेट एंड हेल्थ अलाइन्स, ने जलवायु परिवर्तन नियंत्रण के संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र में प्रस्तुत किए जाने वाले राष्ट्रीय लक्ष्यों  में जनस्वास्थ्य के लिए नीतियों का विस्तृत आकलन किया है, और इस आधार पर “हेल्थी नेशनल क्लाइमेट कमिटमेंट्स स्कोरकार्ड 2026” प्रकाशित किया है। इस स्कोरकार्ड में कुल 117 देश शामिल हैं और प्रधानमंत्री मोदी का तथाकथित कार्बन-न्यूट्रल विकास वाला भारत अंतिम स्थान से महज तीन पायदान ऊपर, यानि 114वें स्थान पर है। इस रिपोर्ट के अनुसार जीतने देशों ने अपने राष्ट्रीय लक्ष्य प्रस्तुत किए हैं, यदि सभी लक्ष्य हासिल भी कर लिए जाएं तब भी वर्ष 2100 तक तापमान वृद्धि 2.2 डिग्री सेल्सियस से अधिक होगी– पर, भारत के लक्ष्य 3 डिग्री सेल्सियस तक तापमान बढ़ाने में सक्षम हैं।

इस रिपोर्ट में वायु प्रदूषण से मरने वालों की संख्या भी है। यह संख्या प्रति एक लाख आबादी में मृत्युदर के तौर पर प्रस्तुत है। भारत के लिए यह दर 186.2 है। वायु प्रदूषण से सर्वाधिक मृत्युदर, 421.4, सोलोमन आइलैंड में है, इसके बाद बांग्लादेश में 259.2, सेंट्रल अफ्रीकी रिपब्लिक में 248.8, वनुआतु में 234.8, यमन में 212.5, गिनीआ में 209.2, सीयेरा लियोन में 208.8, कजाखस्तान में 200.8 और तिमोर लेसते में 195.5 है। शेष सभी देशों में वायु प्रदूषण के संदर्भ में मृत्युदर भारत से कम है।   

इस स्कोरकार्ड में 8 प्रमुख विषय हैं– स्वास्थ्य पर प्रभाव, वायु प्रदूषण, स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर, लक्ष्यों से स्वास्थ्य-लाभ, पूरी आबादी को समान लाभ, समन्वित संचालन, आर्थिक पहलू और निगरानी और कार्यान्वयन। इन सभी विषयों को समान तौर पर 4-4 अंक देकर, इसी संदर्भ में देशों को अंक दिए गए हैं– यानि सबसे कारगर देश को 32 अंक मिलेंगे और सबसे फिसड्डी देश को शून्य। भारत के हिस्से महज 2 अंक आए हैं– 1 अंक स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर में और 1 अंक समन्वित संचालन में। इस स्कोरकार्ड में पाकिस्तान समेत सभी पड़ोसी देश भारत से आगे हैं। नेपाल 19 अंकों के साथ 12वें स्थान पर, श्रीलंका 19 अंकों के साथ 14वें स्थान पर, बांग्लादेश 13 अंकों के साथ 48वें स्थान पर, पाकिस्तान 12 अंकों के साथ 63वें स्थान पर, 10 अंकों के साथ भूटान 70वें स्थान पर और 9 अंकों के साथ चीन 79वें स्थान पर है।

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इस स्कोरकार्ड के अनुसार, दुनिया के सबसे गरीब देश जलवायु परिवर्तन से स्वास्थ्य की रक्षा में बेहतर काम कर रहे हैं– सूची से सबसे पहले के 20 देशों में से 19 दुनिया के गरीब देश हैं। पहले स्थान पर 29 अंकों के साथ कोलंबिया, इसके बाद क्रम से नाइजीरिया, कंबोडिया, परागुए, तिमोर लेस्टे, मोरक्को, रिपब्लिक ऑफ मॉल्डोवा, सीयेरा लियॉन, सूरीनाम और आर्मेनिया का स्थान है। बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में यूनाइटेड अरब अमीरात 22वें स्थान पर, मेक्सिको 25वें पर, कनाडा 28वें, साउथ अफ्रीका 53वें, यूरोपीय संघ 57वें, फ़्रांस 58वें, ऑस्ट्रेलिया 78वें, यूनाइटेड किंगडम 83वें, ब्राजील 87वें, सऊदी अरब 89वें, अमेरिका 91वें, रूस 92वें, साउथ कोरिया 99वें, स्विट्ज़रलैंड 103वें और जापान 115वें स्थान पर है।

तापमान वृद्धि के लक्ष्य और दावे, सभी केवल भाषणों में ही सीमित रहते हैं। प्रोसीडिंग्स ऑफ नेशनल अकैडेमी ऑफ साइन्सेज में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में जहां भी आर्थिक प्रगति हो रही है, प्रति व्यक्ति आय बढ़ रही है, उन सभी क्षेत्रों में से महज 30 प्रतिशत क्षेत्र ऐसे हैं जहां कार्बन उत्सर्जन में कमी आ रही है। इन 30 प्रतिशत क्षेत्रों में से लगभग सभी क्षेत्र यूरोप में हैं।

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दूसरी तरफ उत्तरी अमेरिकी देशों और भारत समेत एशिया में स्थिति इसके ठीक विपरीत है। इस अध्ययन के लिए दुनिया के 1500 क्षेत्रों के आर्थिक विकास और कार्बन उत्सर्जन का पिछले 30 वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया है। इन 1500 क्षेत्रों से कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 85 प्रतिशत उत्सर्जित होता है। अध्ययन के अनुसार, दुनिया के शून्य उत्सर्जन के तमाम दावों के बाद भी अब तक आर्थिक विकास को कार्बन उत्सर्जन से अलग नहीं किया जा सका है।

लान्सेट काउन्टडाउन श्रंखला की 9वीं रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य पर प्रभाव से संबंधित है। इसमें बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के कारण किस तरीके से पूरी दुनिया में गर्मी और चरम प्राकृतिक आपदाओं से मृत्यु के आंकड़े बढ़ रहे हैं, खाद्य असुरक्षा से कुपोषण का दायरा बढ़ता जा रहा है, जंगलों में आग के बढ़ते मामलों के कारण प्रदूषित हवा का प्रभाव पहले से अधिक लोगों पर पड़ रहा है और अनेक संक्रामक रोगों का दायरा बढ़ता जा रहा है।

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इस दौर में जलवायु परिवर्तन के कारण स्वास्थ्य पर अभूतपूर्व खतरे बढ़ रहे हैं। रिकार्ड तोड़ गर्मी, मारक प्राकृतिक आपदाएं और जंगलों की आग का प्रभाव दुनिया के हरेक कोने में पड़ा। दुनिया का 48 प्रतिशत हिस्सा भयानक सूखे की चपेट में रहा और दुनिया के अधिकतर हिस्सों में भयानक गर्मी का दौर 50 दिनों से भी अधिक समय तक रहा। पहले से भूखी आबादी में 15 करोड़ से भी अधिक नई आबादी जुड़ गई। वर्ष 1990 से अब तक चरम गर्मी के कारण 65 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी के मृत्यु दर में 167 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। डेंगू, मलेरिया और वेस्ट नाईल वायरस का प्रकोप पहले से अधिक भौगोलिक क्षेत्रों और आबादी पर पड़ रहा है।

तमाम सबूतों और बढ़ते प्रभावों के बाद भी दुनिया जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि को रोकने के लिए जरा भी गंभीर नहीं है। पूंजीवाद और कट्टर दक्षिणपंथियों के सत्ता में आने के बाद से यह समस्या पहले से अधिक विकराल हो चली है।

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