
अब तो नीची से लेकर देश की सबसे ऊंची अदालत ने भी यह अच्छी तरह समझा दिया है कि 'देश के गद्दारों को, गोली मारो सालों को' जैसा नारा लगाना न तो संज्ञेय अपराध है और न यह किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध है! इससे न तो दिल्ली में 2020 में हिंसा भड़की थी, न सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा पड़ी थी। सब सामान्य था। वामपंथी विध्नसंतोषियों ने फालतू में बावेला मचाकर केस दर्ज करवाया, सांप्रदायिकता का हल्ला मचाया और अदालत का समय खराब किया! वामपंथी ऐसी हरकतों से पता नहीं कब बाज आएंगे!
अदालत सही है क्योंकि नारे में केवल गोली मारने की बात थी। उस समय और वहां किसी को गोली नहीं मारी गई! यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ठाकुर साहब ने गोली मारने की बात स्वयं अपने श्रीमुख से नहीं कही थी! उन बेचारे ने तो केवल इतना कहा था- 'देश के गद्दारों को'। किसी धार्मिक समुदाय का नाम नहीं लिया था और भीड़ ने भी कहा था- 'गोली मारो सालों को'! उसने भी किसी धर्म का नाम नहीं लिया था! मामला बिलकुल सेकुलर था!
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और भीड़ तो साहब भीड़ होती है! उसने कहा- 'गोली मारो सालों को' तो ठाकुर साहब चूंकि नेता हैं, इसलिए उन्हें उपस्थित जनता की इच्छा का सम्मान करते हुए इस नारे को दो-चार बार दोहराना पड़ा- 'देश के गद्दारों को'। उधर से उत्तर आया 'गोली मारो सालों को'। इसमें बताइए मुस्लिम कहां हैं, हिंदू कहां है? इसमें तो ईसाई तक नहीं है!
तो बात दरअसल सालों की थी। बात सालियां तक भी नहीं पहुंची थी। जहां तक सालों का सवाल है, यह जीजा और सालों का आपसी मामला है! अदालत ऐसे मामलों में तब तक दखल नहीं दे सकती, जब तक कि पीड़ित पक्ष खुद सामने नहीं आए। इस मामले में ठाकुर साहब के किसी साले ने उनकी गोली मारने की बात का बुरा नहीं माना, वे जीजा के विरुद्ध सामने नहीं आए। उन्हें अपने जीजा पर पूरा विश्वास था कि जीजा, अपनी राजनीति के लिए सालों को गोली मारने तक के नारे लगवा सकते हैं मगर गोली नहीं मार सकते, इसलिए ठाकुर साहब के विरुद्ध भी कोई मामला नहीं बनता!
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साले, जीजा के साथ या जीजा, साले या सालों के साथ क्या सलूक करे, इसका कोई सरकारी नियम नहीं है। संविधान में इसका कोई उल्लेख नहीं है और न सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में कोई निर्णय अभी तक दिया है! तो ठाकुर साहब दोषी नहीं हैं। और जब ठाकुर साहब दोषी नहीं हैं तो उनकी पार्टी के परवेश वर्मा को दोषी कैसे माना जा सकता है? वैसे भी वे फिलहाल दिल्ली सरकार में उपमुख्यमंत्री हैं। उन्हें दोषी ठहराने से दिल्ली सरकार के सामने समस्या पैदा हो जाती!
वैसे भी उन बेचारों ने आज से छह साल पहले मांस-मच्छी की दुकानवालों का दिमाग ठीक करने की बात कही थी! दिमाग तो सबका ठीक रहना चाहिए। इसमें गलत बात क्या है! खुद का दिमाग ठीक हो न हो मगर दूसरों का ठीक करना तो पुण्य कार्य है और परवेश जी ने वही करने की बात उस समय कही थी!
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वैसे भी मांस-मच्छी की दुकान खोलने का ठेका भारत के संविधान ने किसी धर्म-विशेष के लोगों को तो दिया नहीं है, इसलिए भी परवेश जी की बात किसी कोने से सांप्रदायिक नहीं है, इसलिए सेकुलर है! उनकी यह बात जनहित में थी और तुलसीदास जी मोदी युग के आने से शताब्दियों पहले कह गए थे कि परहित सरिस धरम नहिं भाई ....।
सांप्रदायिकता का ठेका तो दरअसल धर्म विशेष के लोगों ने ले रखा है। हिंदू तो आप जानते हैं और नहीं जानते हैं तो सुना तो होगा ही कि वे सांप्रदायिक नहीं हो सकते और अगर संघी हैं तो फिर तो इसका सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि वे 'सच्चे देशभक्त' होते हैं! ऐसे 'देशभक्त' सांप्रदायिक नहीं हो सकते। यह बात गुरु गोलवलकर से लेकर मोहन भागवत तक और श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर नरेन्द्र मोदी तक सबने कही है। यही बात अमित शाह भी कहते हैं!
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रही बात दूसरे धर्म वालों की तो वे 'सांप्रदायिक' होते हैं। जैसे उमर खालिद या आल्ट न्यूज़ के मोहम्मद ज़ुबैर को लें! उमर खालिद को नागरिकता संशोधन कानून से क्या तकलीफ थी भाई?उसकी नागरिकता तो खतरे में नहीं थी। उसे इसका विरोध क्यों करना चाहिए था मगर वामपंथियों को हर जगह टांग फंसाने की आदत है और भारत को आज भी लोकतांत्रिक देश मानने की टेव है।
आप बताइए क्यों उसे शाहीनबाग जाना चाहिए था? और गये हैं तो क्या पुलिस को इसमें षड़यंत्र सूंघने की स्वतंत्रता नहीं है? उसे क्यों महाराष्ट्र के अमरावती में भाषण के अंत में 'इन्कलाब जिंदाबाद' का नारा लगाना चाहिए था? यह 'षड़यंत्र' नहीं तो और क्या है? यह साफतौर पर राष्ट्रद्रोह है! इस देश में इन्कलाब क्यों चाहिए? मोदी जी जो लाए हैं, उससे संतोष क्यों नहीं है!
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ठीक है कि हत्या और बलात्कार के दोषी राम रहीम को तो अभी तक पंद्रह बार परोल दी गई है और सोलहवीं बार भी जल्दी ही दी जा सकती है मगर उमर खालिद को करीब छह साल बाद भी जमानत नहीं दी गई! यही न्यू इंडिया का नया आदर्श है! इसमें बलात्कार और हत्या संगीन अपराध नहीं रहा मगर सीएए और एनआरसी का विरोध करना देशद्रोह है क्योंकि देश प्रधानमंत्री से शुरू होकर प्रधानमंत्री पर आकर खत्म होता है!
और ये मोहम्मद ज़ुबैर! इसे तो पता होना चाहिए था कि भले ही यह पत्रकार है, फैक्ट चैकर है मगर है तो मुसलमान ही! इतनी बड़ी बात वह भूल कैसे गया! 2018 में मोदी जी की हुकूमत आ चुकी थी, तब उसने किस गलतफहमी में पड़कर ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म 'किसी से न कहना' के एक सीन को अपने ट्विटर अकाउंट पर चेंप दिया था, जिसमें हनीमून होटल का नाम बदलकर हनुमान होटल कर दिया गया था! ठीक है कि उस समय हिंदुओं की भावनाएं आहत नहीं हुईं। आहत होने में चार साल का समय लगा मगर भावनाएं आहत होने का अपना कर्तव्य भूल नहीं पाईं! वह पत्रकार था, इसलिए बाल-बाल बच गया वरना तिहाड़ में उमर खालिद और शरजिल इमाम की संगत कर रहा होता!
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तो 'नये भारत' में कपिल मिश्रा कदापि सांप्रदायिक नहीं हो सकते, यति नरसिंहानंद भी नहीं हो सकते, महंत बजरंग मुनि भी नहीं हो सकते, आनंद स्वरूप भी नहीं हो सकते और लोगों को कपड़ों से पहचानने वाला 140 करोड़ जनता का प्रतिनिधि भी नहीं हो सकता। बंगाल की मतदाता सूची से 27 लाख नाम काटने वाले चुनाव आयोग के मुखिया को भी सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता। फिर कौन हो सकता है सांप्रदायिक, यह अब आप अदालत के फैसले से जान गए होंगे। इसलिए आइए अब भारत के जन-जन जयश्री राम भजें और मस्त रहें, पस्त रहें और व्यस्त रहें!
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