विचार

आकार पटेल / राजस्थान का डिस्टर्ब एरिया एक्ट, धर्मनिरपेक्षता को छोड़ते बहुसंख्यकवादी राज्य का असली चेहरा

कदम दर कदम, एक के बाद एक कानून से, हम एक ऐसे न्यू इंडिया में पहुंच चुके हैं, जो एक बहुसंख्यकवादी राज्य है और धर्मनिरपेक्षता का अपना खोल उतार रहा है।

जयपुर में ईद मीलादुन्नबी मनाता मुस्लिम समुदाय (फोटो : Getty Images)
जयपुर में ईद मीलादुन्नबी मनाता मुस्लिम समुदाय (फोटो : Getty Images) Vishal Bhatnagar

राजस्थान की बीजेपी सरकार इस सप्ताह गुजरात के अलगाव वाले एक कानून की तर्ज पर ही एक कानून पास करने वाली है। इस बात की संभावना कम ही है कि ज़्यादातर भारतीयों को इसके बारे में पता चलेगा क्योंकि मीडिया शायद ही इसके बारे में रिपोर्ट करेगा। आइए देखते हैं कि इसके पीछे क्या हासिल करने की मंशा है।

गरीब लोगों को एक साथ ऐसी जगह रहने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसे हम झुग्गी-झोपड़ी कहते हैं। एक जातीय समूह को जबरदस्ती कुछ खास इलाकों में रहने के लिए मजबूर करना घेटो या बस्ती कहते हैं। गरीब लोगं के पास कहीं और जाने का कोई साधन नहीं होता। जातीय समूहों के पास साधन होने पर भी कोई विकल्प नहीं होता। रंगभेद का मतलब है अलगाव और यह दक्षिण अफ्रीका की उस नीति की याद दिलाता है जिसमें काले अफ्रीकियों को खास बस्तियों में रहने के लिए मजबूर किया जाता था। वे कानून के अनुसार केवल तय जगहों पर ही रह सकते थे।

अमेरिका में जब 1960 के दशक में कानूनी तौर पर रंगभेद खत्म हुआ, तो सरकार ने फेयर हाऊसिंग एक्ट जैसे कानून पास किए जिनका मकसद अलग-अलग नस्लों को एक साथ लाना था। इसके तहत संपत्ति या मकान आदि खरीदने और बेचने में होने वाले उस भेदभाव को रोका गया, जो नस्लों को अलग रख रहा था। पूरे गुजरात में, सभी बड़े शहरों और कई कस्बों में, बीजेपी सरकार ने इसका उल्टा किया है। गुजरात अशांत क्षेत्र अधिनियम के तहत मुसलमानों को जानबूझकर घेटो या तय बस्तियों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

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इस कानून के मुताबिक, शहरों के कुछ खास हिस्सों में नागरिकों को अपनी संपत्ति बेचने या किराएदार बदलने से पहले सरकार से इजाज़त लेनी होती है और उन्हें धर्म के आधार पर जांचा-परखा जाता है। आवेदन में खरीदार और बेचने वाले का नाम होना चाहिए और इसमें एक हलफनामा भी शामिल होता है कि संपत्ति की बिक्री बिना किसी दबाव के और बाजार मूल्य पर हुई है।

यह कानून शुरू में कांग्रेस ने पास किया था, और 2009 में, तत्कालीन मोदी सरकार ने इसमें बदलाव करके कलेक्टर या जिलाधिकारी को जांच करने और एक्ट के तहत संपत्ति पर कब्ज़ा करने के लिए विवेकाधीन शक्तियां दे दीं। जुलाई 2019 में इसमें एक और बदलाव किया गया। पहले, संपत्ति बेचने वालों को अपनी संपत्ति ट्रांसफर करने की इजाज़त के लिए आवेदन करना होता था और हलफनामा देकर अपनी सहमति रजिस्टर करनी होती थी। अब, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा कि बिक्री मर्ज़ी से हुई थी या नहीं, और मालिक को सही कीमत दी गई थी या नहीं। कलेक्टर अपनी मर्ज़ी से प्रॉपर्टी की बिक्री रोक सकता है, अगर उसे लगता कि ट्रांसफर होने पर 'डेमोग्राफिक संतुलन में कोई गड़बड़ी' होगी या 'किसी समुदाय के लोगों का गलत तरीके से एक इलाके में इकट्ठा होना' होगा या 'ध्रुवीकरण की संभावना' होगी।

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कलेक्टर इन आधारों पर जांच करने के बाद संपत्ति के कानूनी ट्रांसफर के लिए अर्जी को खारिज कर सकता है। बिना मंज़ूरी के प्रॉपर्टी ट्रांसफर करने पर सज़ा बढ़ाकर छह साल जेल कर दी गई (जब यह कानून पहली बार लागू हुआ था, तब यह छह महीने थी)। अब इस कानून ने राज्य सरकार को मोहल्लों में डेमोग्राफिक स्ट्रक्चर (जनसंख्या में हो रहे बदलाव) पर नज़र रखने के लिए एक 'मॉनिटरिंग और एडवाइजरी कमेटी' बनाने की भी इजाज़त दे दी है। यह कमेटी कलेक्टरों को सलाह देगी कि बिक्री की इजाज़त दी जा सकती है या नहीं।

यह कानून वर्तमान में राज्य के तीन सबसे बड़े शहरों, अहमदाबाद, वडोदरा और सूरत के बड़े हिस्सों में लागू है, और भरूच, कपडवंज, आनंद और गोधरा में भी इस्तेमाल होता है। ये वही जगहें हैं जहां गुजरात के मुसलमान ज़्यादा रहते हैं, जिससे वे असल में हमेशा के लिए अलग-थलग पड़ गए हैं। इसका मतलब है कि विदेशी तो गुजरात में ऐसी प्रॉपर्टी किराए पर ले सकते हैं और खरीद सकते हैं जो भारतीय मुसलमान नहीं खरीद सकते।

पिछले सप्ताह राजस्थान मंत्रिमंडल ने भी एक ऐसे कानून को मंज़ूरी दी है जो गुजरात की तर्ज पर है। राजस्थान के कानून मंत्री जोगाराम पटेल ने कहा कि "गलत तरीके से बसी" कॉलोनियों पर नजर रखी जाएगी। इन इलाकों में सरकार की इजाज़त के बिना अचल संपत्तियों का ट्रांसफर अमान्य होगा।

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अलपसंख्यकों को निशाना बनाने वाले दूसरे कानूनों की तरह, इस कानून को भी एक लुभावना नाम दिया गया है: राजस्थान अशांत क्षेत्रों में अचल संपत्ति के ट्रांसफर पर रोक और परिसर से किरायेदारों को बेदखल करने से सुरक्षा के प्रावधान विधेयक, 2026।

इसका असर बिल्कुल वैसा ही होंगा जैसा हमने गुजरात में देखा है। ठीक नाजी जर्मनी की तरह यह समुदायों के बीच सामाजिक और कारोबारी या कमर्शियल लेन-देन को गैर-कानूनी बनाता है। राजस्थान कानून के प्रावधानों का उल्लंघन गैर-जमानती और संज्ञेय अपराध है, और इसके लिए पांच साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। प्रॉपर्टी किराए पर देने पर आपको जेल हो सकती है। राज्य में कांग्रेस इस कानून का विरोध कर रही है, लेकिन उसके पास ज़रूरी संख्या नहीं है और वह इसे रोक नहीं पाएगी। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने कहा है कि “डेमोग्राफिक असंतुलन कोई कानूनी शब्द नहीं है। इस बात का कोई ज़िक्र नहीं है कि किस आधार पर किसी इलाके को डिस्टर्बड घोषित किया जाएगा। बीजेपी गुजरात मॉडल को फॉलो करके सत्ता में बने रहना चाहती है।”

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यह सच है कि मोदी के नेतृत्व में भारत ने कई ऐसे कानूनों के ज़रिए संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को खोखला कर दिया है, जिनका कोई तीखा विरोध भी नहीं हुआ। अदालतों ने भी इससे मुंह फेरे रखा, विपक्ष बहुत कमज़ोर है और मीडिया तो आंखे मूंदे ही है।

बीफ़ रखने को अपराध बनाना 2015 में शुरू किया गया था, जिसकी शुरुआत महाराष्ट्र और हरियाणा से हुई। अलग-अलग धर्मों में शादी को अपराध बनाना 2018 में शुरू हुआ, जिसकी शुरुआत उत्तराखंड से हुई। मुस्लिम तलाक को अपराध बनाना 2019 में हुआ, और साथ ही उन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम से खास तौर पर बाहर रखा गया। राजस्थान का कानून इस सिलसिले को आगे बढ़ाता है।

कदम दर कदम, एक के बाद एक कानून से, हम एक ऐसे न्यू इंडिया में पहुंच चुके हैं, जो एक बहुसंख्यकवादी राज्य है और धर्मनिरपेक्षता का अपना खोल उतार रहा है।

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