
हाल ही में हुई दो घटनाओं से कुछ सवाल खड़े हुए हैं। सवाल हैं कि क्या हमारे समाज में असहमति और आलोचनात्मक विचारों के लिए अब कोई स्थान नहीं बचा है? क्या आज सामाजिक और राजनैतिक मंच पर कोई भी अपने अनुभवों, वर्तमान राजनीतिक माहौल और अभिव्यक्ति-स्वतंत्रता पर विचारों को नहीं रख सकता? सवाल उठाना इसलिए लाज़िमी क्योंकि इस स्थिति और वातावरण पर गंभीर और ईमानदार मंथन की जरूरत है। स्थ्ति यह है कि अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पहरे ही नहीं बल्कि प्रतिबंध लगाए जा चुके हैं। भले ही इसकी औपचारिक और अधिकारिक घोषणा न की गई हो।
पहली घटना मशहूर सामाजिक चिंतक, लेखक और विद्धान आनंद तेलतुंबडे की एक पुस्तक पर आयोजित कार्यक्रम के रद्द होने से जुड़ी है। आनंद तेलतुंबडे की किताब ‘द सेल एंड द सोल : ए प्रिजन मेमॉयर’ - पर मुंबई के मशहूर काला घोड़ा कला महोत्सव में चर्चा होनी थी। गुरुवार रात 8 बजे होने वाले इस कार्यक्रम का शीर्षक रखा गया था ‘इनकार्सिरेटेड : टेल्स फ्रॉम बिहाइंड बार्स’। आनंद तेलतुंबड़े की किताब जेल से जुड़ी कहानियों पर आधारित है। लेकिन इस कार्यक्रम को अचानक रद्द कर दिया गया और इसके पीछे ऑनलाइन ट्रोलिंग और मुंबई पुलिस के कथित अनुरोध का हवाला दिया गया है। क्या यह कारण तार्किक लगते हैं या फिर यह सेंसरशिप या अभिव्यक्ति की आज़ादी को दबाने जैसा है? इस फैसले ने साहित्यिक और बौद्धिक हलकों में बहस और चिंता दोनों को जन्म दिया है। यह कार्यक्रम पुस्तक पर चर्चा और विचार-विमर्श के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा था, जिसमें लेखक, शिक्षाविद, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता भाग लेने वाले थे।
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कार्यक्रम के आयोजकों का कहना था कि आयोजन स्थल पर दबाव और संभावित “कानून-व्यवस्था” संबंधी आशंकाओं का हवाला देते हुए कार्यक्रम को अंतिम समय में रद्द करने का निर्णय लिया गया। हालांकि, आयोजकों का कहना है कि यह निर्णय मजबूरी में लिया गया, न कि स्वेच्छा से।
आनंद तेलतुंबड़े का नाम समकालीन भारत में विचार, असहमति और आलोचनात्मक सोच से जुड़ा रहा है। उनकी पुस्तकें जाति, लोकतंत्र, राज्य की भूमिका और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर तीखे सवाल उठाती हैं। ऐसे में उनकी पुस्तक पर होने वाले कार्यक्रम का रद्द होना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक संवाद की सीमाओं पर एक बार फिर सवाल खड़ा करता है। कई लेखकों, शिक्षाविदों और नागरिक अधिकार समूहों ने इस रद्दीकरण की आलोचना की है। उनका कहना है कि किसी पुस्तक पर शांतिपूर्ण चर्चा को रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। यदि असहमति या विरोध है, तो उसका जवाब संवाद और बहस से दिया जाना चाहिए, न कि कार्यक्रम रद्द करके।
वैसे कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि आयोजनों के दौरान शांति और सुरक्षा बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, और यदि किसी कार्यक्रम से तनाव की आशंका हो तो सावधानी बरतना आवश्यक है। लेकिन क्या “आशंका” के आधार पर विचारों को दबाना एक खतरनाक प्रवृत्ति नहीं है?
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मुंबई तो हमेशा से विचारों, साहित्य और सांस्कृतिक बहसों का केंद्र रहा है, उस शहर में ऐसे कार्यक्रम का रद्द होना याद दिलवाता है कि आज के समय में विचारों की स्वतंत्रता को लेकर सतर्क और सजग रहना कितना जरूरी है।
दूसरी घटना वह है जिसका जिक्र मशहूर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने द इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में किया है। उनके लेख से भी इसी प्रवृत्ति को लेकर एक बहस शुरु हुई है। नसीर के लेख का शीर्षक है ‘व्हेन ए यूनिवर्सिटी स्पीक्स पॉवर टू ट्रुथ’। नसीरुद्दीन शाह को मुंबई विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित ‘जश्न-ए-उर्दू’ कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था। 1 फरवरी को होने वाले इस कार्यक्रम में उन्हें अचानक 31 जनवरी को ‘डिस्इन्वाइट’ कर दिया गया। यानी उनका आमंत्रण रद्द कर दिया गया।
नसीर लिखते हैं कि ऐसा करने पर न तो उन्हें न तो कोई स्पष्ट कारण बताया गया और न ही इसके लिए खेद व्यक्त किया गया। इतना नहीं विश्वविद्यालय ने बाद में यह घोषणा तक कर दी कि उन्होंने (नसीरुद्दीन शाह ने) खुद इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया। नसीर इस दावे को पूरी तरह नकारते हैं। वे कहते हैं कि यह ऐसा फैसला था जिसके जरिए उन्हें बेइज्जत किया गया और छात्रों और शिक्षार्थियों के साथ होने वाले उनके संवाद को अवसर को छीन लिया गया।
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नसीरुद्दीन शाह लेख में छात्रों के साथ बातचीत की अहमियत बताते हुए लिखते हैं कि उनसे सीखना उनकी ज़िंदगी के सबसे ख़ुशी देने वाले अनुभवों में से एक रहा है। उन्होंने कहा कि यह आयोजन उसी तरह की सीख और आपसी संवाद का एक अवसर था, जिसे खो देना उनके लिए व्यक्तिगत और पेशेवर तौर पर निराशाजनक रहा। वे इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि इस कार्यक्रम का रद्द कर दिया जाना शायद उनके द्वारा व्यक्त की गई राजनीतिक आलोचना से प्रेरित था। वे लिखते हैं कि उन पर आरोप है कि “देश के खिलाफ बयान देते हैं।” शाह कहते हैं कि उन्होंने कभी भारत के प्रति अपनी देशभक्ति पर सवाल नहीं उठाया, बल्कि वे उन नीतियों और रवैयों की आलोचना करते हैं जिन्हें वे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं।
अपने लेख में शाह ने लिखा है कि, “हाँ, मैंने कभी भी खुद को "विश्वगुरु" कहने वाले की तारीफ़ नहीं की है। असल में, मैं जिस तरह से वह बर्ताव करते हैं, उसकी आलोचना करता रहा हूं... पिछले 10 सालों में उनके किए किसी भी काम से मैं प्रभावित नहीं हुआ हूँ। मैंने अक्सर सत्ताधारी सरकार के कई कामों की आलोचना की है और करता रहूँगा। मैंने अक्सर अपने देश में नागरिक भावना और दूसरों के प्रति लगातार कम होते सम्मान पर दुख जताया है। मैं कई दूसरे मुद्दों पर भी खुलकर बोलता रहा हूँ क्योंकि ये ऐसी बातें हैं जो मेरे जैसे लोगों को उस दिशा के बारे में परेशान करती हैं जिसकी तरफ हम बढ़ते दिख रहे हैं, जहाँ छात्र कार्यकर्ताओं को बिना मुकदमे के सालों तक जेल में रखा जाता है लेकिन दोषी बलात्कारी/हत्यारों को अक्सर ज़मानत मिल जाती है, जहाँ गाय के नाम पर हिंसा करने वालों को हिंसा की पूरी छूट है, जहाँ इतिहास को फिर से लिखा जा रहा है और किताबों को बदला जा रहा है, जहाँ विज्ञान के साथ छेड़छाड़ की जा रही है, जहाँ एक मुख्यमंत्री, और कोई नहीं, "मियाँ" लोगों को परेशान करने की बात करता है। यह नफ़रत कब तक कायम रह सकती है?
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शाह के इस लेख को भारत के मौजूदा विचार-वातावरण की एक बड़ी तस्वीर सामने आती है, अभिव्यक्ति-स्वतंत्रता, शैक्षणिक स्वतंत्रता और आलोचनात्मक दृष्टिकोण पर बहसें बढ़ी हैं। इस लेख के प्रकाशित होने के बाद भी सवाल उठे हैं कि क्या किसी व्यक्ति की राजनैतिक दृष्टि या विचार को लेकर उसके सार्वजनिक कार्यक्रमों से अलग किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है?
नसीरुद्दीन शाह का लेख सिर्फ एक अभिनेता की व्यक्तिगत पीड़ा का बयान नहीं है, बल्कि वह आज के भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका और असहमति के प्रति समाज के बदलते रवैये पर एक गंभीर टिप्पणी है। उनका लेख हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम धीरे-धीरे ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहाँ सवाल पूछना, आलोचना करना और संवाद करना असुविधाजनक माना जाने लगा है।
नसीरुद्दीन शाह यह स्पष्ट करते हैं कि सत्ता या नीतियों की आलोचना करना देशद्रोह नहीं है। बल्कि यह तो लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है। उनकी चिंता इस बात को लेकर है कि आलोचना को अब अक्सर “देश के खिलाफ” खड़ा कर दिया जाता है। यह एक खतरनाक सरलीकरण है, क्योंकि इससे देश और सरकार के बीच का अंतर मिटने लगता है। लोकतंत्र में सरकार अस्थायी होती है, लेकिन देश स्थायी—और देश की भलाई के लिए सरकार से सवाल करना नागरिक का अधिकार ही नहीं, कर्तव्य भी है।
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यह सच है कि संस्थानों पर दबाव, सुरक्षा की चिंताएं और राजनीतिक माहौल की जटिलताएं वास्तविक हैं। लेकिन सवाल है कि समाधान क्या हो—संवाद को रोक देना या संवाद को और व्यापक बनाना? इतिहास गवाह है कि विचारों को दबाने से शांति नहीं आती, बल्कि असंतोष और गहराता है।
नसीरुद्दीन शाह का लेख हमें आईना दिखाता है और याद दिलाता है कि असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी ताकत है। यदि हम ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ हर कोई एक-सा बोले, एक-सा सोचे, तो वह समाज लोकतांत्रिक नहीं रह जाता। इसलिए इस लेख को केवल एक अभिनेता की शिकायत के रूप में नहीं, बल्कि एक नागरिक की चेतावनी के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।
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