विचार

बंगाल में चुनाव आयोग की ‘तार्किक त्रुटियां’

क्या एक व्यक्ति के अहंकार को पूरा करने के लिए बची-खुची लोकतांत्रिक मर्यादा की आहुति दी जाएगी? जवाब जल्द ही मिल जाएगा।

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Getty Images Hindustan Times

बंगाल में चुनाव नहीं हो रहे, अश्वमेध यज्ञ हो रहा है। विश्वगुरु बनने का सपना तो ट्रम्प ने धराशायी कर दिया। अब कम-से-कम अपने देश में चक्रवर्ती घोषित होने की तैयारी चल रही है। लेकिन एक विघ्न आन पड़ा है। अश्व केरला और तमिलनाडु के बाजू से कन्नी काट कर निकल गया, लेकिन उसे बंगाल में पकड़ लिया गया है। सम्राट की इज्जत बचाकर बंगाल से अश्व छुड़ाने की कोई सूरत नहीं दिख रही। इसलिए अब बंगाल पर चढ़ाई करनी पड़ेगी। मुकाबला आसान नहीं है। ऊपर से बंगाल का कोई एक तिहाई वोटर किसी भी हालत में बीजेपी को वोट नहीं देता। चाणक्य इसी सोच में डूबे थे: अश्वमेध यज्ञ में आन पड़े इस विघ्न का निवारण कैसे हो? पुजारी ज्ञानेश कुमार ने जजमान को एक युक्ति सुझाई: क्यों ना एक ‘विशेष विघ्न निवारण अभियान’ चलाया जाए। अंग्रेजी में ‘स्पेशल इंपीडिमेंट रिमूवल’ यानी एसआईआर।

इस चश्मे से देखें तो आपको बंगाल में एसआईआर के नाम पर हो रहा अजीबोगरीब घटनाक्रम समझ आने लगेगा। अनेक सवालों के जवाब सुझाने लगेंगे। बंगाल में एसआईआर इतना बड़ा मुद्दा क्यों बन रहा है? चुनाव आयोग अभूतपूर्व कदम क्यों उठा रहा है? यह “तार्किक त्रुटियों” का खेल क्या है? बंगाल में ही अनोखे किस्म की कांट-छांट क्यों हो रही है? 

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अब आप तथ्य देखिए। बंगाल में एसआईआर शुरू होने के वक्त से ही चुनाव आयोग की जिद थी कि बंगाल की एसआईआर में विशेष सावधानी की जरूरत है, क्योंकि वहां की लिस्ट में बड़ी संख्या में अवैध नाम शामिल हैं। लेकिन कभी उसका प्रमाण नहीं दिया गया। दरअसल, हर संभव तथ्य चुनाव आयोग के इस शक का खंडन करता था। एसआईआर शुरू होने से पहले बंगाल की वोटर लिस्ट का आकार एकदम सटीक था। प्रदेश की वयस्क आबादी 7.67 करोड़ थी, जबकि वोटर लिस्ट में 7.66 करोड़ नाम थे — यानी लगभग उतने ही जितने होने चाहिए थे। एसआईआर शुरू होने से पहले नाम जोड़ने की अर्ज़ियां बढ़ीं थीं, लेकिन बंगाल के चुनावी अधिकारियों ने उनमें से 41 प्रतिशत खारिज कर दी थीं। यानी बड़े पैमाने पर नाम जोड़ने का षडयंत्र नहीं चल रहा था।

इसका भी कोई प्रमाण नहीं है कि एसआईआर शुरू होने के बाद बंगाल में बहुत कम नाम कटे। बंगाल में अनमैप्ड वोटर, यानी वे वोटर जो पुरानी लिस्ट में किसी रिश्तेदार से नहीं जुड़ सके, 4.5 प्रतिशत थे, यानी छत्तीसगढ़  (3.5) या राजस्थान और मध्य प्रदेश (1.6) से ज्यादा। पहले दौर में बंगाल में कुल मिलाकर 7.7 प्रतिशत नाम कटे, जो फिर राजस्थान (7.6)  और मध्य प्रदेश (7.3) के बराबर थे। लब्बोलुआब यह की बंगाल की वोटर लिस्ट या उसकी शुरुआती छंटनी में कुछ भी अजीब नहीं था।

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लेकिन चुनाव आयोग ने बंगाल में विघ्न निवारण की ठान रखी थी। इसलिए एसआईआर के पहले चरण के बाद चुनाव आयोग ने भारी नाराजगी जताई और बंगाल में वोटर लिस्ट के विशेष पर्यवेक्षक नियुक्त किए — उत्तर प्रदेश में 4 पर्यावेक्षक, लेकिन बंगाल में 30 पर्ववेक्षक। ऊपर से बंगाल में  8,000 माइक्रो पर्यवेक्षक लगाए गए, बाकी देश में एक भी नहीं। जब इससे भी बात नहीं बनी, तो चुनाव आयोग ने “तार्किक त्रुटि” का ब्रह्मास्त्र चलाया। यानी कंप्यूटर सॉफ्टवेयर ने आज के वोटर की अर्जी का 2002 की सूची से मिलान कर उसमें “तार्किक त्रुटि” ढूंढी।

छोटी से छोटी मीन-मेख के आधार पर लोगों को नोटिस दिए गए — नाम की वर्तनी में बदलाव, मां-बाप की आयु में तब और अब कोई विसंगति होने पर, बाप-बेटे की आयु में पर्याप्त अंतर ना होने पर आदि। ऐसी तार्किक त्रुटियां बाकी सब राज्यों में भी मिली थीं, लेकिन उन्हें रफ़ा दफ़ा कर दिया गया। इधर बंगाल में चुनाव आयोग ने 60 लाख विवादित मामले ढूंढ निकाले। सुप्रीम कोर्ट ने एक अभूतपूर्व फैसला देते हुए इन विवादित मामलों का निपटारा करने के लिए विशेष जज बैठा दिए और उनसे 35 दिन में इनका फैसला करने को कहा। हर जज एक दिन में कम-से-कम 250 केस निपटा रहा था। 

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जाहिर है वही हुआ जो होना था। पहले दौर में बंगाल में 58 लाख नाम पहले ही कट चुके थे। शिकायत के आधार पर काटे 6 लाख नाम जोड़ दें तो कुल 64 लाख। ऐसी कटौती बाकी राज्यों में भी हुई है, लेकिन सब जगह दूसरे दौर में कुछ भरपायी की गई, यानी वोटर लिस्ट के नाम बढ़े। लेकिन बंगाल में अनूठा खेल हुआ — दूसरे दौर में 27 लाख नाम और कट गए। यानी कुल मिलाकर कोई 91 लाख नाम वोटर लिस्ट से कट गए। “तार्किक त्रुटि” की लपेट में ऐसे लोगों का नाम भी कट गया जिनके पास आधार, पैन कार्ड, जन्मप्रमाण और यहां तक कि पासपोर्ट तक हैं। पता लगा कि दूसरे दौर में जिन लोगों का नाम कटा है, उनमें कोई दो-तिहाई मुसलमान हैं।

नंदीग्राम जैसे क्षेत्र में जिसमें मुसलमान सिर्फ 25 प्रतिशत हैं, वहां 95 प्रतिशत मुसलमान का नाम कटा। सुप्रीम कोर्ट इन 27 लाख वोटरों को कहता है कि आप अपील कर लीजिए। अपील की सुनवाई करने वाले ट्रिब्यूनल शुरू भी नहीं हो सके हैं और चुनाव का दिन आ गया। कोर्ट हमदर्दी दिखाता है, कहता है कोई बात नहीं। अगली बार वोट डाल लेना।

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तो क्या चुनाव आयोग ने बंगाल में विघ्न निवारण कर भाजपा की जीत का रास्ता साफ कर दिया है? बेशक चुनाव आयोग ने इस दिशा में भरसक कोशिश की है, लेकिन  इससे चुनाव का परिणाम तभी पलट सकता है, अगर भाजपा अपने दम पर जीत के नजदीक हो। बंगाल से मिले संकेत इसकी पुष्टि नहीं करते।बंगाल की राजनीतिसमझने वाले सभी लोग मानते हैं कि चुनाव आयोग के सहारे के बावजूद भाजपा पीछे चल रही है। तो क्या अश्वमेध यज्ञ पूरा करने के लिए चुनाव वाले दिन देश भर से जुटाए सुरक्षा बल की मदद ली जाएगी? क्या एक व्यक्ति के अहंकार को पूरा करने के लिए देश की बची-खुचीलोकतांत्रिक मर्यादा की आहुति दी जाएगी? जवाब जल्द ही मिल जाएगा।

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