विचार

विष्णु नागर का व्यंग्य: ‘न्याय’ की विजय होते ही डरने लगता हूं मैं

अगर आप एक खास विचारधारा और पार्टी के हैं तो कई बार न्याय आपका दरवाजा खटखटाता मिलेगा। अमित शाह जी को सोहराबुद्दीन मामले में तो न्याय मिला ही था,जज लोया के मामले में भी तुरत फुरत मिल गया है।

फोटो : विश्वदीपक, NH
फोटो : विश्वदीपक, NH सुप्रीम कोर्ट के बाहर जज लोया की मौत की स्वतंत्र जांच की मांग करने वाली याचिकाओं पर फैसले का इंतजार करते मीडिया कर्मी

मैं बहुत डरा हुआ आदमी हूं। जैसे ही कोई कहता है, 'अंतत: न्याय की विजय हुई', और कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए 'V' का निशान टीवी कैमरे को दिखाते हुए चला जाता है, तो मैं डर जाता हूं।जैसे ही कोई कहता है, 'मुझे न्याय व्यवस्था पर अटूट विश्वास है', मैं डर जाता हूँँ,न मेरा विश्वास टूट जाता है।

आप कहोगे तुम अजीब उल्लू हो बल्कि उल्लू भी क्या, उल्लू के पट्ठे हो। कहूँँगा, हाँ जी हूँ , ठीक पहचाना आपने, दोनों ही हूँ। उल्लू और उसका पट्ठा होना तो फिर भी छोटी बात है,इससे भी जबर कुछ कहो तो भी कहूँगा- माँ कसम आप बिल्कुल सही हो।

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पता नहीं मोदी जी के आने के बाद मुझे न जाने क्या हुआ है कि न्याय की विजय में या न्याय व्यवस्था में विश्वास जताने वालों को देखकर मेरा ब्लड प्रेशर इतना ज्यादा बढ़ने लगा है, कि हृदयाघात का खतरा सिर पर मंडराने लगता है, जबकि आजकल जब देखो, तब न्याय की ही विजय होती रहती है, अन्याय की विजय का जमाना तो लगता है, ससुरा न जाने कब का लद चुका! श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ का जमाना तो जैसे चला ही गया- कहीं बहुत दूर मंगल पर।अब तो सोचता हूँ कि उन्हें मिले बड़े- बड़े पुरस्कार भी वापिस ले लेना चाहिए और ‘ राग दरबारी’ को प्रतिबंधित तो कर ही देना चाहिए या यह लिखवाना चाहिए कि अब यह उपन्यास अप्रासंगिक है। यह सब कांग्रेस के जमाने में होता था। अब तो लंगड़ को भले न्याय न मिले मगर अमित शाहों और असीमानंदों को मिल जाता है।

अगर आप एक खास विचारधारा और पार्टी के हैं तो कई बार न्याय आपका दरवाजा खटखटाता मिलेगा। अमित शाह जी को सोहराबुद्दीन मामले में तो न्याय मिला ही था,जज लोया के मामले में भी तुरत फुरत मिल गया है। अन्याय बस इतना हो रहा है कि जब भी किसी ऐसे को 'न्याय' मिलता है,सवाल उठने लग जाते हैं।लेकिन 'न्याय' तो मिल ही जाता है,चाहे उसे दिलाने की विधि और प्रक्रिया, जो भी हो,आलोचना जो भी हो!

अच्छा है कुछ बड़ों को तो न्याय मिलने लगा है, कुछ बड़े कुछ बड़ों से माफी मांगकर केस बंद करवा रहे हैं। लालूजी टाइप के लिए अभी न्याय दुर्लभ है, मगर सबका वक्त आता है, उनका आया तो उनको भी मिलेगा। इधर वालों को न्याय मिल गया तो किसी दिन उधर वालों को भी मिलना शुरू हो सकता है! और फिर ऊपर से रिसकर किसी दिन न्याय नीचे भी फल की तरह टपकने लगेगा और क्या पता लंगड़ टाइप गरीबों तक भी इसका थोड़ा- बहुत लाभ पहुंच जाए!

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इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि अदालतों को जितने जज चाहिए, देने में आनाकानी की जा रही है।इससे भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि अदालतों के पास केसों का अंंबार लगा हुआ है। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि कभी-कभी जजों की भी हत्या या कथित हत्या हो जाती है और किसी जज को 'न्याय' देते ही 'निजी कारणों' से त्यागपत्र दे देना पड़ जाता है और कोई सरकारी वकील ऊपरी दबाव झेलने की बजाय अपनी अंतरात्मा के दबाव में त्यागपत्र दे देता है। इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि सुप्रीम कोर्ट के चार जज पहली बार मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ सार्वजनिक मंच पर आ जाते हैं। यह सब तो होगा ही।

देखना किसी दिन आसाराम की भी 'न्याय' की आशा पूरी होगी और रामरहीम भी 'न्याय' से वंचित नहीं रहेगा। जाँच अंततः इनके पक्ष में जाएगी तो 'न्याय' भी इनके साथ हो लेगा। गवाह 'पलट' जाएंगे या पलटा दिए जाएंगे, सबूत नष्ट हो जाएंगे यानी करवा दिए जाएंगे। बहुत तरीके हैं। जब तय कर लिया है कि 'न्याय' देना है तो फिर देना है। नरसंहार करने वालों को भी न्याय मिलता है, मिलेगा। 'न्याय' देने का एक तरीका यह भी है कि निर्णय ही मत दो या मत देने दो। कोई न कोई फच्चर फँसाये रहो! अभियुक्त मर जाएगा, केस खत्म हो जाएगा।

लेकिन मैं डर जाता हूं कि न्याय प्रसाद की तरह बटंने लगा, तो मेरे जैसों का क्या होगा,जो किसी मंदिर में नहीं जाते और उनका भी क्या होगा, जो भक्त नहीं हैं या एक खास देवता के भक्त तो बिल्कुल ही नहीं हैं, जिसका मंदिर देश की राजधानी में शिफ्ट हो चुका है।

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