
ज़बां को बंद करें या मुझे असीर करें,
मिरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते।
जो तू कहे तो शिकायत का ज़िक्र कम कर दें,
मगर यक़ीं तिरे वा'दों पे ला नहीं सकते।
चराग़ क़ौम का रौशन है अर्श पर दिल के,
उसे हवा के फ़रिश्ते बुझा नहीं सकते।
दमनकारी सत्ताओं के निर्मम शोषण और अत्याचार के प्रतिरोध के संकल्पों की मजबूरी जताने वाले ये शे'र अपने वक्त के उर्दू के बेहद मशहूर और मकबूल शायर पंडित बृजनारायण चकबस्त (19 जनवरी 1882-12 फरवरी 1926) ने हमें गुलाम बनाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को खुली चुनौती देते हुए रचे थे। यह आज इस मायने में नए सिरे से प्रासंगिक हो उठे हैं कि हम हमारे लोकतंत्र का दुरुपयोग करके सत्ता में आई तानाशाह प्रवृत्ति की ऐसी शक्तियों के हवाले हो गए हैं, जिन्हें हर किसी के देशप्रेम पर शक करने की बहुत बुरी आदत है। इसलिए उनका प्रतिरोध हमारे समय की अपरिहार्य जरूरत बन गया है।
प्रसंगवश, ऐसे प्रतिरोध की चेतना को यावत्जीवन पालते-पोसते रहे चकबस्त 1882 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद (अब अयोध्या) शहर के कश्मीरी मुहल्ले में पैदा हुए थे और उर्दू में आधुनिक कविता स्कूल के संस्थापकों में से एक थे। उनकी कश्मीरी पृष्ठभूमि के कारण उन्हें कश्मीरियत की खुशबू बिखेरने वाले अच्छे और सच्चे देशप्रेमी शायर के रूप में भी जाना जाता है।
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1926 में उनके असमय निधन के अगले बरस इलाहाबाद के ऐतिहासिक इंडियन प्रेस से 'सुबह-ए-वतन' नाम से उनकी कविताओं का संग्रह प्रकाशित हुआ तो उसके संपादक शशिनारायण ‘स्वाधीन’ ने उसमें लिखा था कि चकबस्त अल्लामा इकबाल के दोस्त तो थे ही, उनसे कम बड़े शायर भी नहीं थे। लेकिन जिंदगी उनके लिए छोटी पड़ गई। स्वाधीन की मानें तो चकबस्त उर्दू शायरी का भविष्य थे। उनमें गजब की सांस्कृतिक निष्ठा थी और उर्दू एवं फारसी पर उनका समान अधिकार था। चकबस्त के एक और दोस्त तत्कालीन मशहूर वकील तेजबहादुर ‘सप्रू’ तो इस बात को लेकर पूरे जीवन अफसोसजदा रहे कि इकबाल और चकबस्त जैसी प्रतिभाओं को अपना समय कहें या जीवन कानून एवं कविता के बीच बांटना पड़ा।
बहरहाल, इकबाल और चकबस्त में एक और चीज कामन थी : दोनों का संबंध कश्मीर की जमीन से था। चकबस्त के कश्मीरी मूल के पुरखे पन्द्रहवीं शताब्दी में उत्तर भारत में आ बसे थे। उनके पिता पंडित उदितनारायण (जो स्वयं भी शायर थे) अवध के फैजाबाद जिले में डिप्टी कलेक्टर हुआ करते थे। अंग्रेजी राज में डिप्टी कलेक्टर का पद ही वह सर्वोच्च पद था, जो किसी भारतीय को मिल सकता था।
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लेकिन विडंबना यह कि चकबस्त अभी पांच साल के भी नहीं हुए थे कि उनके सिर से पिता का साया उठ गया। तब मजबूरी में उनको अपनी मां के साथ फैजाबाद से लखनऊ चले जाना पड़ा। फैजाबाद की ही तरह वहां भी उनको कश्मीरी मुहल्ले में ही ठौर मिला, जहां रहते हुए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संबद्ध कैनिंग कालेज से कानून की पढ़ाई पूरी की। 1905 में विवाह, 1906 में पत्नी की मृत्यु और 1907 में पुनर्विवाह उनके जीवन की इससे पहले की घटनाएं हैं।
कानून की पढ़ाई के बाद जल्दी ही वह लखनऊ के सफल वकीलों में गिने जाने लगे और साहित्य के उन दिनों के एक बहुचर्चित मामले में उन्होंने शहर के प्रसिद्ध कवि दयाशंकर कौल ‘नसीम’ का बचाव किया। नसीम पर आरोप था कि वे झूठ-मूठ ही खुद को ‘गुलबकावली’ का रचयिता बताते हैं।
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लेकिन वकालत की सफलता उनको बांधकर नहीं रख सकी और वह स्वतंत्रता संघर्ष में सक्रिय भागीदारी के साथ उर्दू साहित्य के विशद अध्ययन में व्यस्त हो गए। फिर तो उन्होंने स्वराज के आंदोलन समेत अपने वक्त के कई राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों में खुलकर भागीदारी की। समाज सुधार के आंदोलनों में उनकी दिलचस्पी इस तथ्य से समझी जा सकती है कि कश्मीरी ब्राह्मणों के समुदाय में पहली बार आगरा में एक विधवा विवाह हुआ तो उन्होंने उसकी प्रशंसा में अपनी ‘बर्के-इस्लाह’ शीर्षक रचना में लिखा : गम नहीं दिल को यहां दीन की बरबादी का। बुत सलामत रहे इंसाफ की आजादी का।
उनका मानना था कि इंसाफ की यह आजादी देश की आजादी के बिना किसी भी देशवासी को मयस्सर नहीं हो सकती थी। इसलिए उन्होंने अपना संकल्प घोषित करते हुए यह भी लिख डाला : तलब फिजूल है कांटों की फूल के बदले। न लें बहिश्त, मिले होम रूल के बदले।
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इस बीच अपने अध्ययन क्रम में वह मिर्ज़ा ग़ालिब, मीर अनीस और आतिश की कविताओं से तो बेहद प्रभावित हुए ही, इकबाल से उनकी दोस्ती इस सीमा तक जा पहुंची कि इकबाल मुंबई में मालाबार हिल्स पर रहने वाली अपनी प्रेमिका अतिया फ़ैज़ी (राजा धनराजगीर के सेक्रेटरी अंकल फ़ैज़ी की बहन) से मिलने भी बिना उनके न जाते। बताते हैं कि वहां धनराज महल में शाम की महफिलें जमतीं तो चकबस्त झूम-झूमकर अपने कलाम सुनाते। उनमें जिंदगी और मौत को परिभाषित करने वाला उनका यह दार्शनिक शे'र भी शामिल होता जो उनके दुनिया को अलविदा कहने और उनकी जन्मभूमि फैजाबाद के फैजाबाद न रह जाने के बाद भी बहुत लोकप्रिय है: जिंदगी क्या है अनासिर में जहूरे तरतीब। मौत क्या है इन्हीं अजजां का परीशां होना।
लेकिन उनकी काव्य प्रतिभा की ज्यादातर जड़ें इस दार्शनिकता के बजाय उनकी राष्ट्रीयता की भावना में ही हैं। हां, वह इस भावना और इससे जुड़ी चेतना के साथ अपनी कविताओं की शक्ल में ‘तहजीब के दरख्तों के तवील सायों’ को भी छोड़ गए हैं। उनके समकालीनों ने उन्हें इसके लिए बहुत सराहा है कि भले ही उन्हें अपने लखनवी होने पर गर्व था, उनके निकट जहालत के गुरूर के हाथों मुल्क की बरबादी ही अफसोस का सबसे बड़ा वायस थी : गुरूर और जेहल ने हिन्दोस्तां को लूट लिया। बजुज निफाक के अब खाक भी वतन में नहीं।
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देशप्रेम की इसी धुन में उन्होंने आगे चलकर पारंपरिक उर्दू कविता के मानकों को दरकिनार कर अपने पाठकों को भावप्रधान कविता का सर्वश्रेष्ठ रूप दिया।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ट्रांसवाल में शासकों से दुखी भारतीयों की दशा सुधारने के प्रयत्नों में लगे हुए थे तो चकबस्त ने ‘फरियादे कौम’ की रचना की। यह रचना एक छोटी पुस्तिका के रूप में छपी थी, जिस पर महात्मा का नाम इस प्रकार दिया गया था : महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी की सेवा में/निसार है दिले शायर तेरे करीने पर/किया है नाम तेरा नक्श इस नगीने पर।
इससे पहले पंडित विशन नारायण दर की याद में लिखी उनकी नज़्म ‘नजराना-ए-रूह’ प्रसिद्ध हो चुकी थी। लखनऊ में कश्मीर के नवयुवकों की सभा के आठवें अधिवेशन में उन्होंने अपनी नज़्म ‘दर्दे दिल’ पढ़ी तो कहते हैं कि सारे नवयुवकों का दर्द उनकी आंखों में छलक आया था। 3 सितंबर 1911 को महामना मदनमोहन मालवीय और उनके समर्थक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के लिए चंदा मांगने लखनऊ आए। इस अवसर पर एक बड़ा अधिवेशन हुआ तो चकबस्त की नज़्म ‘कौमी मुसद्दस’ ने समां बांध दिया था :
जो अपने वास्ते मांगे ये वो फकीर नहीं। तमअ में दौलते दुनिया की ये असीर नहीं। तमाम दौलते जाती लुटा के बैठे हैं। तुम्हारे वास्ते धूनी रमा के बैठे हैं। सवाल इनका है तालीम का बने मंदिर। कलश हो जिसका हिमाला से औज में बरतर। यहां से जाएं तो जाएं ये झोलियां भरकर। लुटाएं इल्म की दौलत तुम्हारे बच्चों पर।
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कौम की लड़कियों से खिताब करते हुए तो वे अपनी भावनाओं को यह कहने से भी नहीं रोक पाए थे : हम तुम्हें भूल गए उसकी सजा पाते हैं। तुम जरा अपने तईं भूल न जाना हरगिज।
उन्होंने मुख्य रूप से नज़्में रची हैं, हालांकि गजलों के मश्क को वह 'मजहब-ए-शायराना' कहते थे और मसनवी रचने के साथ उनकी लेखनी से पचास गजलें भी निकलीं। उर्दू के गद्य में भी उन्होंने अपने हाथ आजमाए हैं। उनकी कई रचनाएं मीर अनीस के मर्सियों की याद भी दिलाती हैं। खाके हिन्द, गुलजार-ए-नसीम, रामायण का एक सीन (मुसद्दस), नाल-ए-दर्द, नाल-ए-यास और कमला (नाटक) आदि उनकी प्रमुख रचनाएं हैं।
लेकिन यहां उस प्रसंग का जिक्र किए बगैर बात अधूरी रह जाएगी, जो 2023 में 18 सितंबर को पुराने संसद भवन में संपन्न हुए विशेष सत्र (जो उस भवन का अंतिम सत्र भी था) के अंतिम दिन राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने अपने भाषण से चर्चित किया।
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संविधान सभा की 11 दिसंबर 1946 की कार्यवाही का जिक्र करते हुए झा ने चकबस्त की खाक-ए-हिंद शीर्षक रचना की कुछ पंक्तियां यह कहते हुए पढ़ीं कि ‘बुलबुल-ए-हिंद/द नाइटिंगेल ऑफ इंडिया’ कहलाने वाली सरोजिनी नायडू ने उस दिन संविधान सभा में अपना भाषण ‘एक कश्मीरी कवि’ (चकबस्त) की इन्हीं पंक्तियों से शुरू किया था- ‘बुलबुल को गुल मुबारक, गुल को चमन मुबारक, रंगीं तबीयतों को रंगे-सुखन मुबारक’।
लेकिन जो बात झा ने नहीं बताई, वह यह थी कि चकबस्त की उक्त पंक्तियां पढ़ते वक्त सरोजिनी नायडू की याद्दाश्त उन्हें दगा दे गई थी। अपने मूल रूप में वे पंक्तियां इस क्रम में हैं- ‘शैदां-ए-बोस्तां को सर्व-ओ-समन मुबारक/ रंगीं तबीयतों को रंग-ए-सुखन मुबारक/ बुलबुल को गुल मुबारक गुल को चमन मुबारक/ हम बेकसों को अपना प्यारा वतन मुबारक/ गुंचे हमारे दिल के इस बाग में खिलेंगे/ इस खाक से उठे हैं इस खाक में मिलेंगे’।
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बहरहाल, जैसा कि स्वाधीन के शब्दों में पहले कह आए हैं, उम्र ने चकबस्त के साथ बड़ी नाइंसाफी की। 12 फरवरी 1926 को वह रायबरेली रेलवे स्टेशन के निकट अचानक गिर पड़े तो फिर कभी नहीं उठे। कुछ ही घंटों बाद उन्होंने अंतिम सांस ले ली। तब वह सिर्फ 44 वर्ष के थे। 1983 में उनकी जन्मशती आई तो उनका गद्य-पद्य का समग्र साहित्य ‘कुल्लियाते चकबस्त’ नाम से कालिदास गुप्ता ‘रजा’ के संपादन में प्रकाशित हुआ।
उनकी जन्मस्थली फैजाबाद (अब अयोध्या) में स्थित उनके घर के आधे हिस्से में अब एक स्कूल संचालित होता है, जबकि आधे हिस्से में उनसे नजदीकी का दावा करने वाले कुछ लोग रहते हैं। लेकिन न स्कूल और न ही उनके नजदीकी लोगों को उनकी स्मृतियों और विरासत के संरक्षण से कोई लेना-देना है। उनकी स्मृतियों को संजोने का इस शहर में सिर्फ एक उपक्रम है, वह लाइब्रेरी जिस पर मीर अनीस के साथ उनका नाम भी चस्पां है, लेकिन उसका हाल भी कुछ अच्छा नहीं है।
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