
अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे के गबन कहें, चोरी या डकैती (जैसा कि पिछले दिनों उसकी निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेन्द्र मिश्र ने कहा), उसके एक महत्वपूर्ण पहलू की ओर अभी तक अयोध्या के बाहर के लोगों का बहुत कम ध्यान गया है। यह कि इसके बाद रोष व क्षोभ से भरी अयोध्या बीजेपी समेत समूचे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ परिवार के 'इमोशनल अत्याचारों' के शिकंजे से बाहर निकल आई लगती है।
अब यह तथ्य तो सुविदित ही है कि पिछले कई दशकों से राम व राम मंदिर के नाम पर उस पर लगातार ये अत्याचार किये जा रहे थे। कभी भगवान राम को अपनी सत्ता की सीढ़ी बनाने व वोटों की भरपूर फसल काटने के लिए और कभी लोकतंत्र द्वारा दी गई सहूलियतों को उसके ही खात्मे के लिए इस्तेमाल करते हुए रामराज्य के नाम पर हिंदुत्व के चोले में देश में खिड़की या दरवाजे से संविधान की जगह मनुस्मृति का विधान लागू करने के लिए।
2014 में बीजेपी के अपने बलबूते केन्द्र और 2017 में उत्तर प्रदेश की भी सत्ता में आ जाने के बाद ये अत्याचार इतने बढ़ गये थे कि बहुत से अयोध्यावासियों को लगने लगा था कि अब उनसे मुक्ति लगभग असंभव हो चली है।
इसलिए अपने को धर्मनिरपेक्ष या कि सर्वधर्म समभाव की पैरोकार बताने वाली कई शक्तियां दीवार से सिर टकराने के बजाय चुप बैठ गई थीं या अयोध्यावासियों को उनके हाल पर छोड़कर 'बाहर' निकल गई थीं। उनसे जुड़े कुछ लोगों का तो यहां तक मानना था कि अब, जब 'वहीं' भव्य व दिव्य राम मंदिर निर्माण के बहाने अयोध्या को अपने हिंदुत्व का अभेद्य केन्द्र बनाने की संघ परिवार की पुरानी अभिलाषा पूरी हो गई है तो उसके खिलाफ मुंह बंद रखने में ही भलाई है।
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लेकिन इस परिवार का दुर्भाग्य कि इस क्रम में उसने अपनी मनमानियों का जो किला बना रखा था, वह चढ़ावा चोरी के बाद अकस्मात भरभरा कर ढह गया और उसके टूटते ही लोगों के अरसे से बंद मुंह खुल गये। इस सीमा तक कि अब इससे चकित कुछ प्रेक्षक पूछ रहे हैं कि यह क्योंकर संभव हुआ? अयोध्या के लोगों की नुक्कड़ों, चौराहों, पार्कों, चाय-पान की दुकानों, स्टेशनों, मैदानों, धर्मस्थलों, प्रतीक्षालयों, मिलने-जुलने की दूसरी जगहों और यहां तक कि राम मंदिर के इर्द-गिर्द चलने वाली बतकही के पास उसका एक ही जवाब है : अब तो बर्दाश्त की हद हो गई है। दूसरे शब्दों में कहें तो दर्द का हद से बढ़ जाना दवा बन गया है।
गौरतलब है कि अयोध्यावासियों ने दो साल पहले हुए लोकसभा चुनावों में भी बीजेपी-संघ को यह संकेत देने में कोई कोताही नहीं की थी कि अब उसकी मनमानियां उनके निकट नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो गई हैं। लेकिन इस परिवार ने उनके उस संकेत को समझने में भी ग़लती की और अपनी हिमाकतों को कतई कोई लगाम नहीं लगाई। इसके बाद अयोध्यावासियों के पास मौका पाते ही मुखर हो उठने के अलावा कोई रास्ता नहीं रह गया।
अलबत्ता, अब उनकी स्वत: स्फूर्त मुखरता का एक साइड इफेक्ट भी दिख रहा है। यह कि जितने मुंह, उतनी बातें हो गई हैं। हर मुंह के पास कोई न कोई 'खुलासा' है और नाना प्रकार के 'खुलासों' की भीड़ सी लग गई है। गौरतलब है कि वे समाचारपत्र, न्यूज चैनल, यूट्यूबर और इंफ्लूएंसर वगैरह भी इन खुलासों का मजा ले रहे हैं, जो इससे पहले इस परिवार के लिए असुविधाजनक किसी भी मामले में उसकी विज्ञप्तियों से कतई आगे बढ़ने का साहस नहीं कर पाते थे और उसे किसी भी तरह की असुविधा में डालना जिन्हें कतई गवारा नहीं था।
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अब कोई मुंह इस परिवार को परिवार के बजाय गिरोह बताकर उसकी हिमाकतें व कारस्तानियां गिना रहा है तो कोई उसकी बेशर्मी पर लानतें भेज रहा है। कभी नफरत की खेती में इस परिवार के साझीदार रहे छुटभैये हिंदुत्ववादी संगठनों के अलम्बरदार, जो तब उससे आगे बढ़ने की कोशिश में उससे ज्यादा अनर्थों की अगवानी को बेकरार रहते थे और अभी चंद दिनों पहले तक जिनको इस परिवार के 'सौभाग्य' से ईर्ष्या हुआ करती थी, अब उसके बारे में ऐसी-ऐसी भाषा में बात कर रहे हैं, जिसे उस रूप में लिखा नहीं जा सकता।
उनकी बातों का लब्बोलुआब यह है कि रामलला को अपनी आड़ बना कर उनके बहाने यह परिवार अब तक बहुत फूल-फल लिया। अब उनकी अमानत में ख़यानत करके यह रामद्रोही हो गया है, तो इसके गाल पिचका देना ही ठीक है। बाबरी मस्जिद ध्वंस के मुख्य आरोपियों में शामिल रहे शिव सैनिक व कारसेवक (जिनका दावा है कि कारसेवा के दौरान मस्जिद पर चढ़े कारसेवकों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने पुलिस की गोलियां खाईं) और अब धर्म सेना के प्रमुख संतोष दुबे जहां इस परिवार के मुखर आलोचक बने हुए हैं और अपनी आलोचना में कोई सीमा नहीं मान रहे, वहीं हिंदू महासभा ने सरयू का जल हाथ में लेकर श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को भंग करवाने का संकल्प कर रखा है।
महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनीष पांडेय का दावा है कि वह संघ परिवार के वर्चस्व वाले श्रीरामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के न्यासियों एवं उनके नियुक्त किए कर्मचारियों द्वारा की गई चोरी, गबन, कमीशनखोरी व भ्रष्टाचार और मंदिर निर्माण में ब्लैकलिस्टेड कंपनियों को काम देने तथा हिंदू भावनाएं आहत करने के विरुद्ध संघर्ष करेगी।
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बताते हैं कि पहले जब भी ऐसे 'संकट' आते थे (यों, कई अयोध्यावासियों का कहना है कि साख के ऐसे संकट से संघ परिवार इससे पहले कभी नहीं गुजरा) यह परिवार कांग्रेसियों व सपाइयों आदि को राम व राम मंदिर का विरोधी करार देकर बच निकलता था। यह कहकर कि वे तो राम के अस्तित्व को ही नकार चुके हैं और उनका मंदिर ही नहीं बनने देना चाहते थे, अब पता नहीं किस मुंह से उसकी व्यवस्था पर सवाल उठा और चढ़ावा चोरी की बात कर रहे हैं।
लेकिन अब उसकी यह जुगत भी कुछ काम नहीं आ रही। चाय की चुस्कियां लेते लोग उसके स्वयंसेवकों के मुंह पर ही एक कामेडियन के शब्द दोहरा कर पूछ ले रहे हैं कि संघ परिवार को कांग्रेस व सपा के कथित रूप से राम को नकारने की बड़ी तकलीफ़ है, तो अपने द्वारा उनका चढ़ावा डकार जाने को लेकर तनिक भी अफसोस क्यों नहीं है।
इस पर भी बात खत्म होती नहीं लगती तो लोग कहने लगते हैं कि दूसरों की छोड़ो, अपनी करनी पर कुछ शर्माओ और बताओ कि उसे लेकर तुम्हारे साथ कौन-सा सलूक किया जाये।
अपने को 'परमहंस' बताने वाले हेट स्पीच के आदती एक संत ने पिछले दिनों एक वीडियो में कह दिया कि चढ़ावा चोरी में गिरफ्तार चम्पत राय के दाहिने हाथ टिन्नू यादव को फांसी दे दी जाये और शेष अभियुक्तों को छ: महीने की सजा देकर छोड़ दिया जाये तो उसके इस पोच सोच को लेकर भी लोगों ने उसकी भरपूर थुक्का फजीहत की।
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इस बीच अशफ़ाकउल्ला खां मेमोरियल शहीद शोध संस्थान ने तो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिख डाला है कि अब संघ के किसी भी स्वयंसेवक को श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का ट्रस्टी न बनाया जाए।
संस्थान के प्रबंध निदेशक सूर्यकांत पांडेय के अनुसार उक्त पत्र में लिखा गया है कि चढ़ावा चोरी में उसके आठ अभियुक्तों को जेल भेजे जाने और श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के दो ट्रस्टियों के इस्तीफे देने के बाद उसके पुनर्गठन की संभावनाओं के बीच संगठित तरीके से प्रयास किया जा रहा है कि नये ट्रस्टी भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों में से ही बनाये जायें। लेकिन संघ के स्वयंसेवक रहे ट्रस्टी अपने एकछत्र राज के बावजूद चढ़ावा चोरी होने से नहीं रोक पाए तो पुनः संघ के ही स्वयंसेवकों को ट्रस्टी बनाना सर्वथा अनुचित होगा। इसलिए बेहतर होगा कि इस परिवार से दूरी बनाए रखने वाले अयोध्या के संतों में से ही नये ट्रस्टी बनाये जायें।
लेकिन बीच-बीच में चर्चा चल जाती है कि राममंदिर की संचालन व्यवस्था बदलकर किसी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी को उसका सीईओ बना दिया जायेगा, तो अयोध्या के संत-महंत एक सुर में उसके खिलाफ बोलने और उसकी बागडोर संतों महंतों को सौंपने की मांग करने लगते हैं। वे कहते हैं कि सीईओ की नियुक्ति मंदिर के संचालन में प्रधानमंत्री कार्यालय का दखल और बढ़ा देगी। लेकिन आम लोग कहते हैं कि संतों में भी सब एक जैसे नहीं हैं। वहां भी 'बड़े फ्रेम में टंगे हुए हैं ब्रह्मचर्य के कड़े नियम और उसी के पीछे चिड़िया गर्भवती हो जाती है।' ऐसे में बहुत सोच समझकर कदम उठाना अभीष्ट होगा।
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आम अयोध्यावासियों की बातचीत से लगता है कि वे कुछ हल्कों के इस प्रचार से भी इत्तेफाक नहीं रखते कि बार-बार 'जांच में दूध का दूध और पानी का पानी कर देने' का दावा करने और चम्पत राय जैसे ट्रस्ट के संदिग्धों से दूरी बनाने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही चढ़ावा चोरी के मामले को उसकी तार्किक परिणति तक पहुंचा सकते हैं।
वे कहते हैं कि मोदी हों, मोहन या योगी, सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं और दूध का दूध, पानी का पानी करने का दावा करके योगी अपनी उस गफलत की ओर से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं, जिसके कारण हर महीने या हर पखवाड़े और कभी-कभी हफ्ते भर में ही किसी न किसी कार्यक्रम में अयोध्या आते रहने के बावजूद उनको इस चोरी की कतई भनक तक नहीं लग पाई। या लगी तो वे ट्रस्ट की तरह वे भी उसे ढकने तोपने में ही लगे रहे।
अयोध्यावासी इस बात पर भी विश्वास नहीं कर पा रहे कि अयोध्या के जिलाधिकारी (जो ट्रस्ट के पदेन सदस्य हैं) और मुख्यमंत्री के प्रमुख/अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) और सूचना संजय प्रसाद (जो ट्रस्ट में प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि हैं) राम मंदिर में अरसे से चल रहे गोरखधंधे से वाकिफ नहीं रहे होंगे और वाकिफ रहे होंगे तो उससे मुख्यमंत्री को अवगत नहीं कराया होगा। ख़ासकर जब, संजय प्रसाद मुख्यमंत्री के सबसे भरोसेमंद और शक्तिशाली अधिकारियों में से एक माने जाते हैं।
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जहां तक दूध का दूध और पानी का पानी करने की बात है, लोग याद दिलाते हैं कि योगी ने 2021 में भी ऐसी ही बड़बोली घोषणा की थी, जब चम्पत राय पर ट्रस्ट के लिए दो करोड़ की जमीन अठारह करोड़ में खरीदने के आरोप लगे थे। लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला।
बहरहाल, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अयोध्या में यह पहली बार है जब बढ़चढ़कर बोलने और सब पर हावी रहने की कोशिश करने में अपना सानी न रखने वाले उनके भक्तों को रक्षात्मक होना व खिसियाना पड़ रहा है और वे लोगों का सामना नहीं कर पा रहे।
यों, भाजपाइयों के रूप में इन भक्तों को 1990 की कार सेवा, 1992 के बाबरी मस्जिद ध्वंस और उसके बाद के उतार-चढ़ाव भरे वर्षों में भी कई बार उनको असहज करने वाली स्थितियों का सामना करना पड़ा है, लेकिन खुद पर ऐसा कलंक उन्होंने इससे पहले कभी महसूस नहीं किया। अब तो 'जय श्रीराम' का नारा लगाते फैजाबाद बार एसोसिएशन के सदस्य भी उनके खिलाफ हो गये हैं और चंपत राय, अनिल मिश्र व गोपाल राव के खिलाफ एफआईआर की मांग कर रहे हैं।
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