विचार

विष्णु नागर का व्यंग्यः कल तक जो 'बंटेंगे तो कटेंगे' के नारे लगा रहे थे, वे खुद इन दिनों बंटे और कटे हुए हैं!

लोहे पर चांदी और सोने की पालिश अब धीरे-धीरे उतरने लगी है। जो दूसरों को संकट में डाल रहे थे, बुलडोजर चला रहे थे, शस्त्र पूजन कर रहे थे, मस्जिद के आगे हनुमान चालीसा का पाठ करवा रहे थे, खुद संकट में आए हुए से हैं। कम से कम इसका श्रीगणेश तो हो चुका है।

कल तक जो 'बंटेंगे तो कटेंगे' के नारे लगा रहे थे, वे खुद इन दिनों बंटे और कटे हुए हैं!
कल तक जो 'बंटेंगे तो कटेंगे' के नारे लगा रहे थे, वे खुद इन दिनों बंटे और कटे हुए हैं! फोटोः सोशल मीडिया

तो प्यारे देशवासियों, हमारा देश एक बहुत रोचक मुकाम पर पहुंचता दिख रहा है। भूल जाइए अजट-बजट। बजट तो आते रहते हैं, जाते रहते हैं। लोग रोते हैं और सरकार सदैव हंसती रहती है। सरकार के मंत्री-सांसद बजट के पक्ष में राग बेसुरा गाते हैं और विपक्ष जोर-जोर से रोता- चीखता है। इनमें से किसी को बजट से कोई फर्क नहीं पड़ता। कोई गरजने-बरसने का आनंद उठाता है तो कोई नाचने-गाने का! इस बीच वित्त मंत्री के पैरों, जुबान और आंखों की परीक्षा हो भी जाती है। हैल्थ चैकअप हो जाता है।

बजट का यह स्थायी भाव है। जिसे सब पॉज़िटिव दिखता है, समझो कि वह सत्ता पक्ष में है और जिसे सब निगेटिव दिखता है, समझो वह विपक्ष में है। सेठ दोनों तरफ़ होते हैं। उन्हें यह सुविधा है। उनके लिए अपना फायदा-नुकसान, देश का फायदा-नुकसान है। हर बार यही होता है और जब तक इस देश में बजट रहेगा, यह सब भी होता रहेगा। इसमें कुछ भी नया नहीं है और नया हो भी नहीं सकता। विपक्ष बजट की तारीफ़ नहीं कर सकता, सत्ता पक्ष उसकी निंदा नहीं कर सकता। जिस दिन ऐसा होगा, उस दिन हम केवल बजट की ही बात करेंगे!

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अभी बजट से अधिक रोचक है, धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र में जो आजकल युद्ध चल रहा है। दोस्तों, कल तक जो 'बंटेंगे तो कटेंगे' के नारे लगा रहे थे, वे खुद इन दिनों बंटे और प्रतीकात्मक ढंग से कटे हुए हैं। जो एक हैं तो सेफ हैं, कह रहे थे, उनकी एकता इतनी अधिक ख़तरे में है कि उनकी हालत पर रोना आ रहा है और मुश्किल यह है कि मेरे पास रूमाल नहीं है। बंटने-कटने की बातें जिनको केंद्र में रखकर कही जा रही थीं, वे फिलहाल केंद्र से बाहर हैं और यह शुभ है, अच्छा है। लड़ वे रहे हैं, जो एक हो रहे थे!

एक मुख्यमंत्री, एक शंकराचार्य से भिड़ा हुआ है। उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण मांग रहा है तो शंकराचार्य, मुख्यमंत्री से उनके हिंदू होने का प्रमाण मांग रहे हैं! मुख्यमंत्री ने कहा कि तुम शंकराचार्य नहीं हो, तो शंकराचार्य भी शंकराचार्य हैं आखिर, उन्होंने कहा कि तुम तो हिंदू भी नहीं हो। मुख्यमंत्री ने कहा, मैं तुम्हें राजसी ठाठ-बाट के साथ माघ मेला में गंगा स्नान नहीं करने दूंगा।

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शंकराचार्य ने कहा कि अच्छा अब एक मुख्यमंत्री मुझसे शंकराचार्य होने का प्रमाणपत्र मांगेगा, उसकी ये हैसियत हो गई है? चालीस दिन देता हूं उसे, वह अपने को हिंदू साबित करे। नहीं किया तो उसे हिंदू धर्म से बाहर करवा दूंगा! वह हिंदू रहना चाहता है तो अपने राज्य में गोहत्या बंद करे वरना यह साबित हो जाएगा कि वह हिंदू नहीं, कालनेमि है, पाखंडी है, ढोंगी है। वह हिंदू है तो गोमाता को राष्ट्रमाता घोषित करे वरना हम साधु संत मिलकर उसे देख लेंगे!

उधर कोई हिंदू रक्षा दल कह रहा है, ये शंकराचार्य नहीं है, रावणाचार्य है, कांग्रेसाचार्य है। दोनों में लट्ठमलट्ठा हो रही है। हम जैसे दर्शकों को मज़ा आ रहा है। अभी तो दोनों की नाक इतनी ज्यादा ऊंची है कि गर्दन नीची होने पर भी नाक नीची होती! एक चाहता है पहले, दूसरा अपनी नाक नीची करे, दूसरा कह रहा है पहले वह नीची करे।

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बाहरी शरीर में वैसे नाक थोड़ा सा स्थान घेरती है, मगर पुरुष की सारी इज्ज़त इस टुन्नी सी नाक में समाई रहती है। बिना कटे यह नाक कट जाती है और बिना जुड़े यह जुड़ जाती है। तो अब दोनों एक-दूसरे की नाक काटने पर तुले हैं और संघ ने चाहा तो दोनों की कटकर भी बच जाएगी, मगर अभी तो दोनों ओर से छुर्रियां तनी हुई हैं। दोनों वार के लिए सही मौके का इंतजार कर रहे हैं। दोनों की हथेलियां एक-दूसरे की कटी हुई नाक रखकर दिखाना चाहती हैं। पिछले साढ़े ग्यारह साल का यह अपनी तरह का सबसे रोचक दृश्य है!

तो ये तो है हिंदुत्व का एक मोर्चा, जो खुला हुआ है। एक और मोर्चा भी खुल चुका है और वह बंद होकर भी बंद नहीं होने वाला है! यूजीसी की नियमावली का झगड़ा तो सुप्रीम कोर्ट की कृपा से हिंदुत्ववादियों के पक्ष में अभी सुलझ गया है मगर सुलझ कर भी गहरे घाव दे गया है और ये घाव ऐसे हैं कि मरहम कोई भी लगाओ, सूखने वाले नहीं हैं। यूपी में 'आई लव योगी जी, गो बैक यूजीसी', 'योगी तुझसे बैर नहीं, मोदी तेरी खैर नहीं', 'तूने सवर्ण समाज की पीठ में छुरा भोंका है, हम तुझे छाती ठोंककर जवाब देंगे', 'मोदी तेरी क़ब्र खुदेगी, योगी जी की छाती में' के नारे लगे हैं। मोदी के पुतले को पीटा गया है, जलाया गया है। मोदी को उनकी जाति बताई गई है और किसी का कुछ नहीं हुआ है!

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मोदी जी की छाती में ये सब क्या अंदर तक घुसा नहीं है? मोदी जी की आदत किसी को माफ़ करने की नहीं है। इसके लिए वह योगी जी को कभी माफ कर सकते हैं? कभी नहीं! मोदी, योगी से बड़ा और पुराना खिलाड़ी है। ऊपर की चुप्पी अंदर की खलबली दिखा रही है। उधर योगी के बंदे कह रहे हैं कि मोदी तेरी खैर नहीं, उधर मोदी बिना कहे कह रहे हैं, योगी अब तेरी तो बिलकुल खैर नहीं।

तो योगी जी ने दोनों मोर्चे खोल रखे हैं। घर की लड़ाई पहली बार सड़क पर आ गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस जंग पर ठंडा पानी डाला है मगर चिंगारियां दबी हुई हैं। हिंदुत्व के सौ साला अभियान की यह गति होगी, महीने भर पहले तक यह कौन जानता था! इतनी जल्दी हिंदुत्व की सांस फूलने लगी है, किसे पता था? इतनी जल्दी द्वंद्व युद्ध शुरू होगा, किसे मालूम था!

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लोहे पर चांदी और सोने की पालिश अब धीरे-धीरे उतरने लगी है। जो दूसरों को संकट में डाल रहे थे, बुलडोजर चला रहे थे, शस्त्र पूजन कर रहे थे, मस्जिद के आगे हनुमान चालीसा का पाठ करवा रहे थे, खुद संकट में आए हुए से हैं। कम से कम इसका श्रीगणेश तो हो चुका है। ये सब सत्ता के नशे में चूर हैं। विश्वगुरु जी और जगद्गुरु जी भिड़ रहे हैं।

ऐसे में असम के मुख्यमंत्री सरमा जी का बंगाली मुसलमानों वाला राग पहली बार बेसुरा लग रहा है। जो 'दुश्मन' को नष्ट करने चले थे, जो इतिहास मिटाने चले थे, आज खुद नष्ट होने-मिटने के कगार पर आ चुके हैं। इनके'अच्छे दिन' जाने को बेताब हैं। यह शुभ है, मंगल है। अच्छा है कि इनमें दंगल है। इनका सनातन, तनातन हो रहा है। अगर मैं ईश्वर को मानने वाला हुआ होता तो कहता कि हे भगवान इन भटकाने वालों को इतना भटका कि ये घर का रास्ता ही भूल जाएं।

 मगर सावधान, अभी विश्राम का समय आया नहीं है।

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