विचार

हारे हुए मोदी की चुनावी बिसात पर आखिरी चाल है सवर्ण आरक्षण!

देश में एक बार फिर आरक्षण का शोर है और इस बार आरक्षण का कदम उठाने वाले मंडल मसीहा वी पी सिंह नहीं बल्कि स्वयं ‘कमंडल मसीहा’ नरेन्द्र मोदी हैं। मंडल अर्थात पिछड़ों के आरक्षण के खिलाफ राम मंदिर का कार्ड खेलने वाली बीजेपी इस बार मोदी जी के साथ-साथ है।

फोटो: सोशल मीडिया 
फोटो: सोशल मीडिया  

यह साल 1990 के दशक के शुरूआती दौर का जिक्र है। विश्वनाथ प्रताप सिंह 1990 में केंद्र में सत्ता संभाल चुके थे। लेकिन कुछ ही महीनों के अंदर अंतर्कलह के कारण उनकी सरकार डगमगाने लगी। कभी उनके उपप्रधानमंत्री देवीलाल तो कभी चंद्रशेखर जैसे दिग्गज नेता वी पी सिंह के खिलाफ उपद्रव में खड़े होने लगे। जल्द ही स्पष्ट हो गया कि वी पी सिंह की सरकार अब लंबे समय तक टिकने वाली नहीं है। यकायक एक रोज सरकार ने मंडल सिफारिश लागू कर दी। इस आदेश के अनुसार देश की पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण का अधिकार मिल गया। बस क्या था, यह आदेश आते ही मानो देश में एक आग लग गई। हिंदू समाज अगड़ों और पिछड़ों में बंट गया। सवर्ण बच्चों ने स्वयं को आग लगाकर आत्महत्या करनी शुरू कर दी। देश मानो जातीय भट्टी में झोंक दिया गया।

इधर देश में जातीय दरार तो पड़ ही गई थी, उधर संघ परिवार ने सोचा कि क्यों ना इस हंगामे के हालात में अपनी रोटी सेंकी जाए। बीजेपी ने अब राम मंदिर का मुद्दा उठा लिया। यकायक देश में ‘मंदिर वहीं बनाएंगें’ का शोर उठ खड़ा हुआ। आडवाणी जी ने रथयात्रा का ऐलान करा दिया। साथ ही बीजेपी के आधार पर टिकी वी पी सिंह सरकार को पार्टी ने धमकी दे दी कि ‘राम मंदिर या सरकार’। वी पी सिंह राजी नहीं हुए।

आडवाणी रथ यात्रा पर निकल पड़े। देश में हिंदु-मुस्लिम दंगे भड़क उठे। उधर आडवाणी जी का रथ बिहार में लालू प्रसाद ने रोका और उनको केंद्र सरकार की मंशा पर गिरफ्तार कर लिया और इधर बीजेपी ने वी पी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। सरकार तो गई, लेकिन देश जातिवाद और सांप्रदायिकता की आग में धधक उठा। जिन्होंने 1990 के दशक का वह दौर देखा है वह इस समय को कदापि कभी नहीं भूल सकते।

यह लंबी तमहीद इसलिए कि देश में एक बार फिर आरक्षण का शोर है। और इस बार आरक्षण का कदम उठाने वाले मंडल मसीहा वी पी सिंह नहीं बल्कि स्वयं ‘कमंडल मसीहा’ श्री नरेन्द्र मोदी हैं। मंडल के विरूद्ध कमंडल अर्थात पिछड़ों के आरक्षण के खिलाफ राम मंदिर का कार्ड खेलने वाली कमंडल पार्टी बीजेपी इस बार मोदी जी के साथ-साथ है। वी पी सिंह को पिछड़ों के आरक्षण के लिए उस समय मीडिया ने देशद्रोही तक कहा था। आज वही मीडिया नरेंद्र मोदी की आरक्षण चाल को ‘मास्टर स्ट्रोक’ बता रहा है। अंतर केवल इतना है कि वह पिछड़ों का आरक्षण था, अबकी मुद्दा अगड़ों के आरक्षण का है।

सवाल बहुत सारे हैं और जवाब अभी तक कम हैं। जैसे, आखिर चुनाव का ऐलान होने से लगभग तीन माह पहले देश का संविधान बदलने की ऐसी क्या आवश्यकता पड़ गई मोदी जी को? क्या इससे देश का भला होगा या नहीं? यह 10 प्रतिशत आर्थिक रूप से पिछड़ों का आरक्षण अब क्यों?

चुनाव जब सिर पर खड़े हैं तो मोदी जी को आर्थिक रूप से पिछड़े क्यों याद आ रहे हैं। मुझे इस बात पर फिर वी पी सिंह की याद आ रही है। वी पी सिंह ने जिस तरह मंडल आयोग की सिफारिश जिस समय लागू की थी उस समय यह स्पष्ट था कि उनकी सरकार दम तोड़ रही है और अब सत्ता उनके हाथों से जाने वाली है। ठीक उसी प्रकार नरेंद्र मोदी को भी साफ दिख रहा है कि 2019 में सत्ता उनके हाथों में आना असंभव होता जा रहा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की चुनावी हार के पश्चात यह तय है कि हिंदी भाषी राज्य मोदी के हाथ से गए। साल 2014 में आठ हिंदी भाषी राज्यों में (हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तरप्रदेश और बिहार) से बीजेपी का कुल 176 सीटें मिली थीं। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि केवल इन राज्यों में अगले चुनाव में बीजेपी को 80-100 सीटों का नुकसान हो सकता है। ऐसे में भला मोदी का 2019 चुनावी गणित बिगड़ेगा कि नहीं!

अरे गणित क्या मोदी की तो चुनावी बिसात ही बिगड़ चुकी है। वही मोदी जो साल 2014 में चंदन था, अब 2019 में राख हो चुका है। मोदी अब एक नाकाम प्रधानमंत्री हैं जो जनता को वादों का पहाड़ दिखाकर सत्ता में तो आ गया, लेकिन उसने एक भी वादा पूरा नहीं किया। देश की अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न है। नोटबंदी और जीएसटी जैसी मूर्ख चालों ने सबकी कमर तोड़ दी। किसान सड़कों पर पुलिस की लाठियां खा रहे हैं। नौजवान नौकरी की तलाश में ठोकर खा रहे हैं। दुकानदार और मझोले व्यापारी को समझ में नहीं आ रहा कि आखिर बाजार में कब रौनक दिखेगी। जाहिर है कि इन हालात में भला मोदी जी देश के अगले प्रधानमंत्री फिर कैसे बनेंगे।

स्पष्ट है कि स्वयं मोदी को वी पी सिंह के समान जमीन पैर के नीचे से खिसकती दिखाई दे रही है। यह 10 प्रतिशत आर्थिक रूप से अगड़ों का कोटा हारे हुए मोदी की चुनावी बिसात पर आखिरी चाल है। कोशिश इस बात की है कि किसी प्रकार देश की चर्चा अपनी नाकामियों से हटाकर आरक्षण के मुद्दे पर टिका दी जाए। प्रयास इस बात का है कि देश राफेल, नोटबंदी, जीएसटी, बेरोजगारी, किसान पीड़ा, बैंकों का डाका जैसे मोदी पाप भूल जाए। और उन्होंने देश को जो आरक्षण का झुनझुना दिया है उसकी राग पर देशवासी फिर उनको सत्ता में भेज दें।

लेकिन बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते! अब समय कम है और आरक्षण की चाल पुरानी हो चुकी। अब तो आरक्षण राजनीति के बहुत खिलाड़ी हैं। अरे क्या मुलायम, मायावती, अखिलेश, लालू और शरद जैसे मंझे मंडल नेता कमंडल आरक्षण पर चुपचाप रहेंगे। भले ही यह सब सदन में वोट डाल दें, लेकिन क्या यह सब चुनावी रण में भी 10 प्रतिशत नए कोटे पर मोदी जी का गुणगान करेंगे। नहीं हरगिज नहीं। अगर चुनाव जीतने के लिए मोदी जी गुजरात दंगों में हजारों का खुन-खराबा चुपचाप देख सकते हैं तो दूसरे भी सत्ता की होड़ में ‘अगड़ा-पिछड़ा’ बखेड़ा फैला सकते हैं। और निःसंदेह फैलाएंगे।

बस जल्द ही यही होने वाला है। याद रखिए इस बार आरक्षण की भट्टी से जो सामाजिक दरार पैदा होने जा रही है वह जल्दी बुझना मुश्किल है। लब्बोलुबाब यह है कि 2019 के चुनाव तक देश को जो सामाजिक नुकसान होगा उसका अनुमान अभी लगाना कठिन है। पर मोदी जी को देश की चिंता कहां, सत्ता की चिंता है। पर यह खेल तो ऐसा है कि इसमें दोनों को ही क्षति हो सकती है। आखिर मंडल मसीहा वी पी सिंह फिर कभी सत्ता में वापस नहीं लौट पाए।

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