विचार

कोरोना संकटः युद्ध की हालत में हैं हम, लेकिन असर से निपटने के लिए सरकार के पास कोई योजना तक नहीं

कोविड-19 वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित होने जा रहा है और भारत पर भी इसका खासा असर पड़ेगा। अभी से देश की अर्थव्यवस्था के हर हिस्से पर बुरा असर पड़ना शुरू हो गया है। ऐसे में मंदी का आना तय है और इससे निकलने का फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखता।

फोटोः सोशल मीडिया
फोटोः सोशल मीडिया 

ऐसे समय जब भारत समेत तमाम देशों की सत्ताएं कोविड-19 के संक्रमण को रोकने के लिए शहर, जिले, राज्यों और यहां तक कि देश की भौगोलिक सीमाओं को भी सील करने में जुटी हैं, इतना तय हो गया है कि अर्थव्यवस्था के लिए यह महामारी अभूतपूर्व तरीके से विनाशकारी साबित होने जा रही है। पहले से ही मंदी जैसी स्थिति से गुजर रही भारतीय अर्थव्यवस्था का क्या होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है और इसका सबसे ज्यादा बुरा असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ेगा।

यह बात शीशे की तरह साफ है कि पिछले तमाम दशकों के दौरान और संभवतः देश की आजादी के बाद समय-समय पर आई विभिन्न महामारियों की तुलना में कोरोना वायरस का हमारी अर्थव्यवस्था पर कहीं अधिक असर पड़ेगा। 2008 में लेहमन ब्रदर के दिवालिया होने के बाद दुनिया भर में आई मंदी की बात हो या फिर आजादी के बाद लड़े तीन युद्धों समेत देश पर समय-समय पर घुमड़े तमाम अन्य तरह के संकटों की, इनके कारण हमारी अर्थव्यवस्था ने बड़े आघात सहे लेकिन कोरोना वायरस महामारी के कारण हमारी अर्थव्यवस्था पर जो असर पड़ेगा, वह इन सबसे कहीं अधिक घातक होगा।

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नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (एनआईपीएफपी) के निदेशक रथिन रॉय ने बिजनेस स्टैंडर्ड के साथ एक इंटरव्यू में कहा कि सरकार और निजी क्षेत्र को इस समस्या को युद्धग्रस्त अर्थव्यवस्था की तरह लेना होगा। रॉय का मानना है कि पिछले युद्धों के कारण हमारी अर्थव्यवस्था पर जितना असर पड़ा, उससे कहीं ज्यादा इस बार पड़ने जा रहा है। इसकी सामान्य सी वजह है। पिछले मौकों पर शुरू में चंद क्षेत्रों पर ही मार पड़ी और फिर धीरे-धीरे कुछ अन्य क्षेत्रों और उद्योंगों पर भी असर पड़ना शुरू हुआ।

उदाहरण के तौर पर 2008 के संकट में सबसे पहले दुनिया का वित्तीय क्षेत्र प्रभावित हुआ और उसके बाद ही अन्य सेवाओं, विनिर्माण और कृषि जैसे अर्थव्यवस्था के दूसरे हिस्सों पर इसका असर पड़ा। उस समय भी भारत की स्थिति अमेरिका, इंग्लैंड या यूरोपीय देशों से बेहतर थी, क्योंकि भारत के केंद्रीय बैंक भारतीय रिजर्ब बैंक ने हमारी वित्तीय प्रणाली को वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से आंशिक ही सही, लेकिन अलग रखा हुआ था। आजादी के बाद के आरंभिक दशकों के दौरान जब भारत ने युद्धों का सामना किया, तब हमारी अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत काफी छोटी थी और वैश्विक अर्थव्यवस्था से बहुत कम जुड़ी थी। एक और बात, युद्धों के समय भी कर्फ्यू लगाया जाता रहा है, लेकिन तब पूरा देश बंद नहीं हो जाता था और लोगों से लेकर वस्तुओं का एक राज्य से दूसरे राज्य तक आवागमन बंद नहीं होता था।

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हाल के समय में सबसे बड़ा नीतिगत अवरोध अचानक आई नोटबंदी था, जिसने अचानक प्रचलन की 86.5 फीसदी करेंसी को बेकार कर दिया और सबसे पहले इसका प्रभाव असंगठित क्षेत्र और नकद आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ा। लेकिन औपचारिक क्षेत्र अच्छी तरह फलता-फूलता रहा, बल्कि नोटबंदी के रूप में आए इस अवरोध की बदौलत कुछ हद तक फायदे में ही रहा। इस बार यह अवरोध एक वैश्विक महामारी के कारण है और इसने एक ही साथ अर्थव्यवस्था के हर तबके को अपनी गिरफ्त में ले लिया है, औपचारिक-अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों पर असर डाला है।

इसका परिवहन और हॉस्पिटलिटी सेक्टर पर सबसे पहले असर पड़ा, क्योंकि सरकार ने शुरुआती कदम के तहत हवाई और सड़क यात्राओं को धीरे-धीरे प्रतिबंधित करना शुरू किया। देशभर में होटलों में कमरे खाली पड़े हैं, क्योंकि चाहे काम-काज के कारण हो या फिर घूमने-फिरने के लिहाज से, लोगों ने यात्राएं रोक दी हैं और अब ताजा प्रतिबंधों के कारण यही स्थिति अगले महीने 15 तारीख तक बनी रहनी है। हालत कब सामान्य होंगे, पता नहीं। ऐसे में पर्यटन क्षेत्र पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा, इसमें संदेह नहीं। अधिकतर शहरों में ओला और उबर जैसी ऐप आधारित टैक्सी सेवाएं बंद हो चुकी हैं और यही हाल दूसरी टैक्सी सेवाओं का भी है।

इसी तरह पूरे देश में 15 अप्रैल तक के लिए घोषित लॉकडाउन के कारण औपचारिक और अनौपचारिक विनिर्माण गतिविधियों पर खासा प्रभाव पड़ा है। सप्लाई चेन बाधित हो चुका है। फैक्टरियों के बंद होने या फिर ज्यादातर कामकाज के बंद हो जाने के कारण कामगार अपने गांवों को लौट चुके हैं। पहले से ही मुश्किल दौर से गुजर रहे कंस्ट्रक्शन क्षेत्र पर लॉकडाउन का काफी बुरा असर पड़ेगा। वैसे भी, कच्चे माल और इस उद्योग के लिए जरूरी साजो सामान बनाने वाले इलाके कोरोना वायरस की चपेट में हैं जिससे वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुकी है।

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वहीं, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का तो भट्ठा ही बैठ गया है, क्योंकि दिहाड़ी मजदूर काम पर नहीं जा पा रहे। इसका असर दोनों पर पड़ रहा है। एक तो उद्योग चौपट हो गया और दूसरा पिछले कुछ सालों से संकट का सामना कर रहे प्रवासी कंस्ट्रक्शन वर्कर के लिए आज का समय बहुत ही बुरा संदेश लेकर आया है। इसके साथ ही कृषि पर भी असर पड़ा है, क्योंकि उपज को मंडी तक नहीं ले जाया जा रहा है और आने वाले समय में यह समस्या और भी बड़ी होने जा रही है।

यहां तक कि औपचारिक क्षेत्र में भी काम कर रहे लोगों पर संकट मंडराने लगा है, क्योंकि उनकी कंपनी के लिए खुद को जिंदा रखना मुश्किल हो रहा है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग ऑफ इंडियन इकोनॉमी के प्रबंध निदेशक और सीईओ महेश व्यास कहते हैं कि अच्छे समय में भी भारत की 33 फीसदी कंपनियां घाटे में रहती थीं। वित्त वर्ष 2019-20 अभूतपूर्व तरीके से बुरा रहा और घाटा दर्ज करने वाली कंपनियों का प्रतिशत बढ़कर 40 हो गया। अब बंदी के कारण घाटे वाली कंपनियों का प्रतिशत शर्तिया 50 से कहीं अधिक हो जाएगा।

चूंकि नौकरी छूटने और आय कम होने का असर आबादी के हर हिस्से को प्रभावित करता है, इससे खपत का संकट खड़ा होता है। चिंता की बात इसलिए है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था को सरकारी निवेश और खपत ने ही थाम रखा था, लेकिन अब इसका पहिया विपरीत दिशा में घूमने जा रहा है। खपत के घटने से उद्योग संकट में आएंगे और अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और उसे देखते हुए रही-सही खपत पर भी दबाव बढ़ेगा और इस तरह एक अजीब सा दुश्चक्र बनता चला जाएगा।

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और फिर, जब कंपनी और लोगों, दोनों की आय घटेगी तो इसका असर यह होगा कि दोनों के लिए ऋण वगैरह चुकाना और मुश्किल होता जाएगा जिससे बैंक संकट में आएंगे और जब बैंक संकट में आएंगे तो अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिहाज से जरूरी तरलता का भी संकट खड़ा हो जाएगा। इसलिए कोरोना वायरस के संक्रमण की चेन को तोड़ने की कोशिशों में जुटे भारत के लिए इस तरह की चेनों को भी तोड़ना उतना ही जरूरी है।

अब यह स्थापित तथ्य है कि चालू वित्त वर्ष के लिए 5 फीसदी की जीडीपी विकास दर को पाना संभव नहीं है। तमाम अर्थशास्त्री पहले ही जीडीपी अनुमान के स्तर को घटा चुके हैं। लेकिन सबसे बुरा असर तो इस साल अप्रैल से शुरू होने वाले वित्त वर्ष पर पड़ेगा। तमाम विशेषज्ञ और उद्योग संघ अर्थव्यवस्था के इस आसन्न संकट को देखते हुए सबको न्यूनतम आय से लेकर महामारी के कारण बेरोजगार हो गए औनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को प्रत्यक्ष आय समर्थन, ऋण माफी और औपचारिक क्षेत्र से जुड़े लोगों से लेकर कंपनियों तक को कई माह के लिए ईएमआई भुगतान से छूट देने संबंधी सुझाव देने लगे हैं।

कुछ का मानना है कि एक बार जैसे ही महामारी का प्रकोप खत्म हो जाता है, सरकार को सस्ते ऋण उपलब्ध कराने से लेकर कर माफी जैसे कदम भी उठाने चाहिए, जिससे अर्थव्यवस्था को दोबारा खड़ा होने में मदद मिले। ये सभी अपने आप में अच्छे सुझाव हैं, लेकिन सरकार अब भी वेट एंड वाच मोड में है। इसने टास्क फोर्स बनाने की घोषणा की है और लोगों से सुझाव मांगे हैं, लेकिन इसके बारे में विशेष तौर पर और कोई खास जानकारी नहीं।

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सरकार ने अब तक ज्यादा कुछ तो किया नहीं सिवाय इस अपील के कि उद्योग अपने कर्मचारियों को न निकालें या उनके वेतन न काटें। लेकिन यह कैसे होगा, इसकी चिंता नहीं की गई। केंद्र से ज्यादा अच्छी पहल तो कुछ राज्य सरकारों ने की और उन्होंने अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों तथा सर्वाधिक प्रभावित लोगों को न्यूनतम आय समर्थन देने की घोषणा की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के लिए समस्या और भी बड़ी इसलिए है क्योंकि एक तो अर्थव्यवस्था पिछले कुछ वर्षों के दौरान काफी सुस्त रही और जीडीपी विकास दर गिरती चली गई, दूसरी नोटबंदी, आधी-अधूरी तैयारी के साथ जीएसटी लागू करने जैसे बुरे नीतिगत फैसलों के कारण स्थिति और भी खराब हो गई। हालिया तिमाही के दौरान जीडीपी विकास दर 4.7 फीसदी रही, जो सात सालों में न्यूनतम है।

अब जबकि कोविड-19 महामारी के कारण अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र की मुश्कें कस गई हैं, यहां कहा जा सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था एक जबर्दस्त मंदी की ओर बढ़ रही है, क्योंकि सरकार के पास उतने संसाधन नहीं हैं कि अर्थव्यवस्था को मंदी से निकालने के लिए जरूरी निवेश करके स्थिति को संभाल सके।

(पूर्व संपादक बिजनेस वर्ल्ड और बिजनेस टुडे)

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