विचार

जंतर-मंतर पर सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन में क्या मांगें रखी गईं और क्या नहीं!

नई दिल्ली में उथल-पुथल भरे दिन के आखिर में, अब इस बात पर गौर करने का समय है कि जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन में क्या मांगें रखी गईं और इससे आंदोलनकारियों को क्या मिल सकता है।

फोटो : विपिन
फोटो : विपिन 

संसद की तरफ कूच करते प्रदर्शनकारियों पर सोमवार, 20 जुलाई को दिल्ली पुलिस ने अपनी भारी ताकत का भरपूर इस्तेमाल किया। इस दौरान कुछ सांसदों को कुछ देर के लिए हिरासत में लिया गया, प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया गया, प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया, रेलवे भवन और शास्त्री भवन के पास आंसू गैस के गोले छोड़े गए और जंतर-मंतर पर लगे टेंट उखाड़कर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने की कोशिशें की गईं। विपक्ष ने संसद में यह मुद्दा उठाया और बिना किसी खास कामकाज के दोनों सदनों की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई।

प्रदर्शनकारियों के नज़रिए से, एकमात्र प्रगति केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा के आवास पर उनसे हुई संक्षिप्त मुलाक़ात थी। कॉकरोच जनता पार्टी के दो प्रवक्ताओं, आशुतोष रंका और सौरव दास, को दोपहर के समय पुलिस मंत्री के आवास पर ले गई। केंद्रीय मंत्री ने उनसे थोड़ी देर बात की, मांगों का तीन-सूत्रीय ज्ञापन लिया और ज़ाहिर तौर पर भरोसा दिलाया कि वह सरकार में अपने वरिष्ठ सहयोगियों के साथ इन मांगों पर चर्चा करेंगे।

आशुतोष रांका ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा, "हम लगभग 12 बजे नड्डा जी के आवास पर पहुँचे। हमारी उनसे दोपहर करीब 2:15 बजे मुलाक़ात हुई। हमने अपनी माँगें उनके सामने रखीं। पहली माँग यह है कि सोनम वांगचुक जी को तुरंत रिहा किया जाए और उन्हें वीडियो संदेश के ज़रिए लोगों को संबोधित करने की अनुमति दी जाए। दूसरी माँग यह है कि धर्मेंद्र प्रधान जी, जिन्हें हम एक अक्षम शिक्षा मंत्री मानते हैं, उन्हें या तो तुरंत हटाया जाए या उनका इस्तीफ़ा स्वीकार किया जाए। तीसरी माँग यह है कि नीट पेपर लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये का मुआवज़ा दिया जाए।"

देश में हाल ही में हुए दूसरे विरोध-प्रदर्शनों की मांगों की तुलना में सीजेपी की मांगें काफी सामान्य और लगभग वाजिब लगती हैं। जन लोकपाल आंदोलन में भ्रष्टाचार-रोधी कानून बनाने की मांग की गई थी। शाहीन बाग और सीएए-एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को रद्द करने की मांग की गई थी। किसानों के विरोध-प्रदर्शन में तीन कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग की गई थी। लद्दाख में राजनीतिक आंदोलन, जिसके लिए वांगचुक ने खुद पहले उपवास भी किया था, मुख्य रूप से छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा और राज्य का दर्जा पाने पर केंद्रित था। सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन के कारण 20 जुलाई तक कोई व्यवधान नहीं हुआ और CJP ने सरकार द्वारा तय की गई 'निर्धारित' विरोध-प्रदर्शन स्थल पर नियमों के दायरे में रहकर ही प्रदर्शन किया।

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर बैठे आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा समेता अन्य कार्यकर्ताओं का अनशन तुड़वाया

सीपीआई (एमएल) और एआईएसए (आइसा) , एसएफआई और एआईएसएफ जैसे वाम-संबद्ध छात्र संगठनों के सक्रिय समर्थन ने विरोध को और मजबूत किया। नेहा बोरा, अमीन समेत आइसा के तीन छात्र कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के साथ अनशन में शामिल हुए और इन संगठनों के कार्यकर्ताओं ने अपने ही अंदाज में धरना स्थल पर कविताएं पढ़ीं, विरोध गीत गाए, पोस्टर और नारे लगाए और छात्रों को एकजुट किया। विरोध को 'गैर-राजनीतिक' रखने के सीजेपी के फैसले के सम्मान में उनमें से किसी ने भी पार्टी का झंडा नहीं उठाया। उन्होंने साफ ऐलान कर दिया था कि “हम इस मंच को राजनीतिक मंच नहीं बना सकते हैं” क्योंकि सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने ऐसी घोषणा कर दी थी। और शुरु में इस आंदोलन में किसी भी राजनीतिक दल का स्वागत भी नहीं किया गया।

लेकिन हैरानी की बात है कि इस विरोध-प्रदर्शन में विवादित नेशनल टेस्टिंग अथॉरिटी (एनटीए) को खत्म करने की मांग भी नहीं की गई, जो नीट परीक्षाएं आयोजित करती है। एनटीए एक ​​कानूनी संस्था (स्टैच्यूटरी बॉडी) होने के बजाय एक ऐसी रजिस्टर्ड सोसाइटी बनी हुई है जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है। जिस सरकार ने यूजीसी, एआईसीटीई और एनसीटीई को खत्म करने के लिए वीबीएसए बिल पेश किया है, उसने एनटीए के खिलाफ शिकायतों और हर साल पेपर लीक होने के उसके खराब रिकॉर्ड पर कोई ध्यान नहीं दिया है।

सीजेपी ने अपनी पुणे रैली में एक "एग्जाम मैनिफेस्टो" जारी किया था, जिसमें मुआवज़े, आंसर शीट की फिजिकल जांच, पारदर्शी टेस्टिंग और प्राइवेट एग्ज़ाम वेंडर्स के साथ सरकारी कॉन्ट्रैक्ट्स के ऑडिट की मांग की गई थी। क्रांतिकारी युवा संगठन के 40-पॉइंट वाले "जंतर-मंतर डिक्लेरेशन" में असल में एनटीए को खत्म करने, इसकी गड़बड़ियों की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच कराने और इसे राज्य शिक्षा बोर्डों के प्रतिनिधित्व वाली संस्था के तौर पर फिर से बनाने की मांग की गई थी। डॉक्टरों के दो संगठनों, एफएआईएमए और यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट ने भी ऐसी ही मांगों के साथ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।

सीजेपी के विरोध-प्रदर्शन में देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा और बुजुर्ग, सभी शामिल हुए। इनमें शुरुआती किशोरावस्था वाले स्कूली छात्र, अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे बेरोजगार ग्रेजुएट, अपने बच्चों के करियर को लेकर चिंतित माता-पिता और अपने पोते-पोतियों को देश की विरोध-प्रदर्शन की संस्कृति से परिचित कराने के लिए उनके साथ आए दादा-दादी शामिल थे। साथ ही, एकजुटता दिखाने के लिए एक्टिविस्ट, जाने-माने बुद्धिजीवी और कुछ मशहूर हस्तियां भी वहां पहुंचीं।

सरकार के लिए शायद सीजेपी की मांगें मान लेना और हालात को शांत करना आसान होगा। शिक्षा मंत्री, जिन्होंने दिन में गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक की थी, उन्हें किसी दूसरे मंत्रालय में भेजा जा सकता है और सोनम वांगचुक को अस्पताल से छुट्टी देकर मुआवज़ा दिया जा सकता है। भारत की शिक्षा प्रणाली में बड़े सिस्टम और ढांचे से जुड़े बदलावों के लिए सीजेपी आंदोलन को कैसे आगे बढ़ाती है, इसी से इस विरोध प्रदर्शन की अहमियत तय होगी।

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