विचार

मानसून ने फिर धोखा दिया तो क्या करेंगे किसान ?

मानसून अपना ढर्रा बार-बार बदल रहा, लेकिन भारतीय खेती आज भी पुरानी सोच और मान्यताओं में ही फंसी हुई है। संभव है कि मानसून फिर पटरी पर आ जाए। जलाशय भर जाएं, बुवाई में तेजी आए। लेकिन क्या हमें हालात सुधरने की ‘संभावना’ पर ही निर्भर रहना चाहिए? 

पीटीआई फोटो
पीटीआई फोटो 

विदर्भ के कपास समृद्ध जिले यवतमाल में पांच एकड़ जमीन के खेतिहर और सामाजिक कार्यकर्ता नितिन खडसे के लिए इस मॉनसून का पहला महीना ही पहेली बन गया है।

अपने गांव जलका से फोन पर ‘नवजीवन’ से बात करते 45 वर्षीय खडसे कहते हैं, “पिछले कुछ सालों में हमने देखा कि 10-12 गांवों के दायरे में बारिश एक जैसी नहीं होती, लेकिन इस साल यह पैटर्न एक ही खेत में दिखा- मेरे ही खेत के एक हिस्से में बारिश हुई, दूसरे हिस्से में नहीं।” उन्होंने कहा, “कई किसानों ने कम बारिश के बावजूद बुआई पूरी कर ली, लेकिन हमें शायद दोबारा बुआई करनी पड़े, क्योंकि पहली बुआई शायद बेकार चली जाएगी।”

जून का महीना ग्रामीण भारत के लिए किसी जुए की शुरुआत जैसा होता है। किसान खेतों की जुताई करते हैं, ज्यादातर बीज और खाद उधार खरीदते हैं, और इंतजार करते हैं भरोसेमंद बारिश के पहले दौर का। सूखे इलाकों में खेती हमेशा से मानसून पर एक दांव जैसी रही है, क्योंकि वहां सिंचाई का यही एकमात्र साधन है। लेकिन इस साल जून खत्म होते-होते दांव की अनिश्चितता बढ़ती गई है। किसानों की भाषा में कहें, तो इसमें देरी हुई है या यह कहीं अटक गया है।

देश के बड़े हिस्सों में ठीक-ठाक बारिश छोड़िए, कई इलाकों में तो शुरुआत भी नहीं हुई है। जून के आखिर तक, दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के आने के बाद से भारत में सामान्य से लगभग 42 प्रतिशत कम बारिश हुई, जिससे यह सदी के सबसे सूखे जून महीनों में से एक बन गया। यह पूरे देश का औसत है।

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मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार बारिश की कमी मध्य भारत में खासतौर से ज्यादा रही, जहां कई इलाकों में यह सामान्य से लगभग 60 प्रतिशत कम रही। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और पड़ोसी राज्यों के किसानों के लिए, यह समय पर बुवाई और फिर एक हफ्ते तक बेचैन इंतजार के बीच का फर्क है।

भारतीय अर्थव्यवस्था पर मानसून का बहुत ज्यादा असर होता है।

सुखद यह है कि मौसम विभाग ने जुलाई के प्रथम सप्ताह में देश के ज्यादातर हिस्सों में अच्छी और ठीक-ठाक बारिश का अनुमान लगाया है। लेकिन बढ़ती महंगाई, घटती आमदनी और अन्य दबावों के बीच, बिगड़ी बारिश से छोटे किसानों की मुश्किल और बढ़ेगी, जो खाड़ी युद्ध से उपजे ईंधन संकट और खाद की बढ़ती कीमतों से पहले ही परेशान हैं।

किसी भी नजरिये से देखें तो 2026-27 में सूखे जैसे हालात की आशंका बहुत प्रबल है।

दक्षिण-पश्चिम मानसून तय समय से कुछ दिन देरी से केरलम पहुंचा, लेकिन फिर जो हुआ, वह विलंब से कहीं ज्यादा अहम था। मानसून पश्चिमी और मध्य भारत में दो हफ्ते से ज्यादा समय तक रुका रहा, और खेती कैलेंडर के हिसाब से गर्मी बीत जाने के बाद भी लू और उमस बनी रही। देश भर में तेजी से आगे बढ़ने के बजाय इसकी रफ्तातर धीमी पड़ गई, जिससे खेतों के बड़े हिस्से सूखे रह गए, जबकि आम तौर पर किसान बारिश के पहले दौर के बाद बुआई पूरी कर रहे होते हैं।

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मौसम वैज्ञानिक कई वायुमंडलीय कारकों के एक साथ मिलने की ओर इशारा करते हैं। भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र में अब ‘अल नीनो’ के हालात हैं और उम्मीद है कि इस मौसम के दौरान ये और मजबूत होंगी। 25 जून को जारी मौसम विभाग की साप्ताहिक पूर्वानुमान प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, “समुद्र की सतह के बढ़ते तापमान का असर वायुमंडल पर पड़ा है, और अब समुद्र-वायुमंडल का मिला-जुला सिस्टम ‘अल नीनो’ जैसे हालात के लक्षण दिखा रहा है।”

पिछले कुछ सालों में, भारत अक्सर अल-नीनो के सबसे बुरे असर से बच जाता था क्योंकि ‘पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल’ (‘इंडियन नीनो’)- जो ट्रॉपिकल हिन्द महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह के तापमान के अंतर से बनने वाला एक अनियमित मौसम पैटर्न है, अतिरिक्त नमी पहुंचाता था। इस साल, वैसे संतुलन के हालात नदारद हैं।

साथ ही, अरब सागर से नमी लाने वाली हवा की निचली धारा ‘सोमाली जेट’ भी, सामान्य से कमजोर रही है। कुछ वायुमंडलीय प्रक्रियाओं के साथ मिलकर, इन कारकों ने बार-बार ‘ब्रेक’ लगाया, जिससे मॉनसून की रफ्तार बाधित हुई है।

किसानों के जमीनी अनुभव उन प्रक्रियाओं के बारे में वैज्ञानिकों की समझ से बहुत अलग होते हैं। वे सूखे खेत देखते हैं जहां अब तक सोयाबीन, कपास, मक्का या अनाज की फसल उग जानी चाहिए थी। खेती के सामान पर अपनी बचत या फसल के लिए गए लोन का कुछ हिस्सा पहले ही खर्च हो जाने की स्थिति में वे परेशान होते हैं कि एक हफ्ते और बारिश नहीं हुई तो क्या उन्हें एक और कर्ज लेना होगा।

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असर अभी से दिखने लगा है: 25 जून तक, देश में खरीफ की बुआई पिछले साल के इसी समय की तुलना में 23 प्रतिशत कम थी। सोयाबीन, कपास और यहां तक कि मक्के की बुआई भी तेजी नहीं पकड़ पाई। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, सोयाबीन की बुआई में लगभग 65 प्रतिशत और कपास की बुआई में 35 प्रतिशत की कमी आई है। कई इलाकों में धान की रोपाई रुक गई है; जो पैदावार कम होने का कारण बनेगी।

देरी के हर हफ्ते से फसल उगाने का समय कम हो जाता है, संभावित पैदावार घट जाती है, कीट और बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, और यह सब किसान को और ज्यादा कर्ज तथा निराशा में धकेल देता है।

खबरों के मुताबिक, मोदी सरकार ने उन 315 संवेदनशील जिलों के लिए आपात योजनाएं बनाई हैं, जहां कमजोर मानसून असर डाल सकता है। इनमें सूखे इलाकों वाले सौ से ज्यादा जिले शामिल हैं जिन्हें ‘अत्यंत संवेदनशील’ माना गया है, क्योंकि वहां सिंचाई सुविधाएं बहुत कम हैं। कृषि विभाग ने उम्मीद के मुताबिक बारिश न होने की स्थिति में किसानों को जहां संभव हो, कम समय में तैयार होने वाली फसलों, दालों और मोटे अनाजों की खेती अपनाने की सलाह दी है। दिक्कत है कि ऐसा बदलाव तभी संभव है, जब उन फसलों के लिए वैकल्पिक बीज और दूसरी जरूरी चीजें उपलब्ध हों।

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विलंबित और कमजोर मानसून एक बड़े पैटर्न की ओर इशारा हैं। आपात स्थिति से निपटने की योजना, जो प्रायः नाकाफी होती है, धीरे-धीरे भारतीय खेती का एक स्थायी हिस्सा बनती जा रही है।

हमने पिछले 20 सालों में जलवायु परिवर्तन के दौर में भारतीय मानसून में बदलाव साफ देखा है। बारिश वाले दिन कम होते गए हैं, जबकि अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं। यही कारण है कि कई इलाके ‘क्लाइमेट हॉटस्पॉट’ बन रहे हैं और खेतिहरों की योजनाएं गड़बड़ा रही हैं।

कई जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, अल नीनो और सूखे के बीच के पुराने रिश्ते का अनुमान अब आसान नहीं रहा। बढ़ते समुद्री तापमान और हवा के बदलते ढर्रे का मतलब है कि कुल मौसमी बारिश में उतार-चढ़ाव। संभव है किसी जिले में मानसून के चार महीनों में कुल मिलाकर ‘सामान्य’ बारिश हो, फिर भी वहां ‘सूखे’ के हालात बन जाएं, क्योंकि ज्यादातर बारिश कुछ ही बार जोरदार तरीके से हुई हो और उसके बीच लंबे समय तक सूखा रहा हो।

किसान यह उतार-चढ़ाव बेहतर समझते हैं क्योंकि यह उनकी रोजमर्रा की सच्चाई है। वे मानसून के अच्छे या बुरे होने का अंदाजा मौसमी औसत से नहीं, बारिश के बंटवारे से लगाते हैं। मसलन- क्या बुआई के लिए पहली बारिश समय पर हुई? मिट्टी में फसल के लिए पर्याप्त नमी थी? उसके तुरंत बाद लंबे समय तक सूखा रहा? अत्यधिक बारिश से पौधे बह गए? यह सवाल और उनके जवाब तय करते हैं कि फसल कैसी रही, न कि मौसमी औसत।

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भारत की नीतिगत प्रतिक्रिया अपर्याप्त है क्योंकि उपलब्ध दीर्घकालिक रुझान एक नई रणनीति की जरूरत बताते हैं। उदाहरण के लिए हरित क्रांति के दौर (1960 के दशक के मध्य से 1970 के दशक के आखिर तक) में बने हमारे कृषि संस्थान आज भी ऐसे काम कर रहे हैं जैसे मौसम अब भी 20वीं सदी वाला हो।

फसल कैलेंडर यह मानकर चलता है कि जून में बुवाई पक्के तौर पर शुरू हो जाएगी। खरीद तंत्र अब भी ज्यादा पानी लेने वाले अनाज और नकदी फसलों को बढ़ावा देता है। ग्रामीण ऋण चक्र और सिंचाई योजनाएं इस भरोसे पर टिकी हैं कि मानसून का अंदाजा सही-सही लगाया जा सकता है, जबकि मानसून का मिजाज अनिश्चित होता गया है, और अजीब बात यह कि ऐसा तब हो रहा है जब मॉनसून के पूर्वानुमान और भविष्यवाणी की तकनीक बेहतर हो रही है।

संभव है मानसून फिर से पटरी पर आ जाए। संभव है जलाशय लबालब भर जाएं, बुवाई में तेजी आए और इस साल की चिंताएं दूर हो जाएं। लेकिन क्या हमें हालात के सुधरने की ‘संभावना’ पर ही निर्भर रहना चाहिए? क्या हमें इस अनिश्चितता के लिए तैयारी नहीं करनी चाहिए?

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