विचार

जिस भी नदी को सुंदर किया, वह तड़प रही !

साबरमती, गंगा के बाद अब मूसी नदी रिवर फ्रंट के जरिये सौंदर्यीकरण की भेंट चढ़ जाने वाली है।

फोटो: सोशल मीडिया
फोटो: सोशल मीडिया 

विकास के कुछ वाहय मानदंड समाज के कुलीन वर्ग और राज्य ने तय कर लिए हैं। विकास आधारभूत निर्माण तक आकर सिमट गया है। इस नए विकास में वह नितांत कृत्रिम सौंदर्यीकरण के इर्द-गिर्द घूमता है। इस नवसौंदर्य बोध में नैसर्गिक विविध वनसंपदा को नष्ट कर एक से पेड़ लगाए जाते हैं। कभी तो कृत्रिम ताड़ हर चौक पर मुंह चिढ़ाते हैं, सोंधी महक देती मिट्टी की जगह तापमान बढाते सीमेंटेड रोड या पेवर ब्लॉक लगते हैं। दावा है कि जल-अवशोषित करने वाले पेवर ब्लॉक गर्मी के दिनों में पानी सोखते हैं और वाष्पीकरण के माध्यम से सतह का तापमान लगभग 2-10 डिग्री तक कम कर सकते हैं। इसी तरह, जरूरत हो न हो, मेट्रो लाइन बिछाई जाती है। यह कुलीन वर्ग को बहुत भाता है।

अब यह सौंदर्यीकरण नदी के मुहाने तक भी पहुंच गया है। एक के बाद एक नदी इस सौंदर्यीकरण की भेंट चढ़ रही है। बाजार के युग में हर उत्पाद की मार्केटिंग, सौंदर्य के पैमाने तय करती है। सो नस्लीय भेद को धता बताते त्वचा को श्वेत करने का अवैज्ञानिक दावा करते उत्पाद सौंदर्य को परिभाषित करते हैं। यह स्त्री के सौंदर्य बोध तक सीमित नहीं। यह कृतिमता नदी, सरोवर, जल स्रोत, पहाड़ सब पर लागू होती जा रही है। आखिर स्त्री, नदी में फर्क भी कितना है!

जैसे इस कृतिम स्त्री सौंदर्य से उसका वस्तुकरण होता हैं, वैसे ही नदी मुहाने का वस्तुकरण बड़ा व्यावसायिक मुनाफा देता है। भू-माफिया कमाते हैं, उच्च कुलीन के प्राधान्य को तुष्ट किया जाता है। शान की बात होती है। मगर इसमें नदी की अस्मिता, उसका जीवन कोई मायने नहीं रखता।

हाल ही में हैदराबाद की मूसी नदी के मुहाने को सौंदर्यीकृत करने की ठानी गई है। जैसे इसके पहले कुछ और राज्यो ने किया। गुजरात सरकार ने साबरमती को सुंदर बनाने की पहल की और रिवर फ्रंट बना। पटना में गंगा को सुंदर किया गया। आज दोनों तड़प रही हैं।

यह हम भूल बैठे हैं कि नदी, पहाड़, झील-झरने वन-वनस्पति हमसे बहुत पुराने हैं। इस धरती के मूल वासी। इन्हीं की बदौलत हम हैं। हम और प्रकृति अलग-अलग खानों में बंट नहीं सकते क्योंकि हम उसी वृहद निसर्ग का एक लघु हिस्सा हैं, उसके मालिक नहीं। हम कौन होते हैं उनको सहेजने वाले। हमारी इतनी औकात नहीं है। सदियों से उन्होंने हमें सहेजा है। अपने हाल पर छोड़ दें तो वे अपने को संवार लेंगी। मगर हम खुद की गरज से उनको सहेजना चाहते हैं ताकि अंधी दौड़ के चलते जो दोहन किया है, उसकी परिणति आगामी पीढ़ी को न भुगतनी पड़े। वे कहीं नदी से हाथ ही न धो बैठें।

नदियों के सौंदर्य पर जितना कहें, कम ही होगा। वे बहती हैं, असंख्य लोककथाओं को हर लहर में सिमटा कर बढ़ती हैं। आसपास आम समाज को छांव देती हैं, धरती से जुड़ा काम भी देती हैं, पालती हैं, प्यास बुझती हैं। हमारी हर जरूरत को पूरा कर सकती हैं, पर लालच को नहीं। वे इतनी सौंदर्यमयी हैं कि उसको हमारे ब्यूटी ट्रीटमेंट की आवश्यकता नहीं।

रिवर फ्रंट ने साबरमती के बहते जल को जमा कर दिया। वह ठिठक गई है, सहम गई है। पूरा औद्योगिक घरेलू अपशिष्ट उसपर बिना ठीक से गंदगी मुक्त हुए थोप दिया जाता है। अब उसकी सड़ांध स्वयं वह नहीं झेल पाती। वह नदी जिसके किनारे सत्य के प्रयोगधर्मी ने अपना अभ्यास शुरू किया, आज आंसू बहाती है। केवल विशिष्ट प्रदर्शन के मौकों पर साफ पानी उंड़ेला जाता है। फ्रंट के कारण इतनी दूर तक व्यावसायिक निर्माण हुआ है कि नदी को बहने की जगह नहीं बची। वह तन्वंगी हुई जा रही है। उसका सौंदर्यीकरण नही, असल में यह उसका चीर हरण है। उसकी गरिमा के साथ छेड़छाड़।

यही हाल मां गंगा का है। पटना के फ्रंट ने नदी को और उत्तर की तरफ धकेला है। वहां दूर तक नदी नहीं, रेत बहती है। नदी की गरिमा चूकती जा रही है।

नदी और हमारे बीच कोई लक्ष्मण रेखा तो नहीं खींच सकते। हमारे और उनके बीच प्रणय, विनय, गरिमा और करुणा के परस्पर आदान-प्रदान का संबंध है।

मूसी ऐसी ही सौंदर्य की नदी है। विकाराबाद की पहाड़ियों से निकलती है। कामगारी समूह को पालती है। उसको पुनर्जीवित होने का हक है। बशर्ते पुनर्जीवन व्यावसायिक लाभ का पर्याय न होने पाए। यह सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है।

निसर्ग के प्रति दो विचार व्यवस्था है। एक वस्तुकरण की ओर ले जाती है। पर्यावरणीय क्षति पहुंचाती है, गरीब का विस्थापन कराती है, जन मत को नियंत्रित करने के लिए पुलिस बल अख्तियार करती है।

मगर 2004 से 2014 की सरकार ने सौहार्द का सुंदर मार्ग प्रस्तुत किया। जहां पर्यावरणीय प्रभाव आकलन, सामाजिक प्रभाव आकलन को हर विकास की नींव का पत्थर बनाया। उन विचारों का अक्स हैदराबाद की मूसी में दिखाई दे सकता है। नदी को जीवंत मानकर, उसकी गरिमा को बरकरार रख कर नया मार्ग बन सकता है। दुनिया और भारत के सामने एक वैकल्पिक विकास की इबारत लिखी जा सकती है। ऐसा विकास जिसके केन्द्र में प्रकृति और इंसान दो खाको में न बंटे हो। जहां दोनों का सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व हो। जहां कम-से-कम विस्थापन हो। एक ऐसे सौंदर्यबोध का विकल्प जो हमारी मिट्टी में रचा बसा हो। हमारी नदी तहजीब से लैस हो। आखिर हमारी तहजीब भी तो गंगा जमनी है। तपस्या और कर्म, भक्ति ज्ञान सूफी का बेजोड़ संगम। नदी के पुनर्जीवन में उसका दर्शन क्यों नहीं हो सकता जहां नदी की श्वसन प्रणाली को मुक्त किया जाए? पर वह कोई सौदेबाजी, मुनाफाखोरी का माध्यम न बन जाए।

इस राज्य से अब भी उम्मीद है क्योंकि यहां लोकचैतन्य अब भी जिंदा है, जो कुछ वर्ष पूर्व तक संघर्ष करता रहा है। राज्य ने सामाजिक न्याय हेतु वैज्ञानिक तरीके से जाति जनगणना की है। सो विकास को पुनर्परिभाषित कर दिखाने का भी माद्दा रखती है। तंत्र के नियंत्रणवादी लिबास से इतर भी कोई तरीका हो सकता है। जहां राज्य लोक चेतना को कुचले बिना जन को यह मौका प्रदान करे कि वह राज्य गत अधिकार के दुरुपयोग का प्रतिरोध कर सके। वह नदी के मुहाने का वस्तुकरण न करके उसकी गरिमा लौटा सके। यह संभन है, राजनीतिक है और बेहद व्यावहारिक है। आखिर प्रकृति के नाश से ज्यादा अव्यवहारिक और क्या होगा!

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