विचार

ट्रंप का अमेरिका क्यों बना अलग-थलग पड़ा सुपरपावर?

इजरायल के इशारे पर नाच रहे ट्रंप ने अमेरिका की साख मिट्टी में मिला दी और सहयोगी देशों ने भी किनारा कर लिया है।

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Getty Images Anna Moneymaker

बड़ी ताकतें कभी-कभी अपनी हद को लांघकर खुद को अलग-थलग कर लेती हैं। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका की अभी ऐसी ही स्थिति है। फिलिस्तीन से लेकर लेबनान और ईरान तक- लगभग हर मामले में बेन्यामिन नेतन्याहू के साथ बिना सोचे-समझे खड़े होकर, ट्रंप ने विश्व मामलों में अमेरिका की सर्वोच्च प्रतिष्ठा को सचमुच नुकसान पहुंचाया है। एक ढलते सुपरपावर के तौर पर, ट्रंप का अमेरिका अब भी अपनी ताकत दिखाने की काबिलियत रखता है, लेकिन अब उसे वह सम्मान नहीं मिलता; वह आम सहमति नहीं बना पाता और संभवतः ईरान मामले में हाथ आई नाकामी के बाद, अब वह लोगों में वैसा खौफ भी पैदा नहीं कर सकेगा जैसा कभी किया करता था।

फारस की खाड़ी के हालिया घटनाक्रम इस बदलाव को साफ तरीके से दिखाते हैं। इस्लामाबाद में बातचीत नाकाम होने के बाद, वॉशिंगटन ने ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे दुनिया के सबसे अहम तेल, गैस और नाइट्रोजन कॉरिडोर में रुकावट आने और संघर्ष के मौजूदा सीमाओं से कहीं आगे बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। दुनिया के लिए संदेश एकदम साफ है: अमेरिका अकेले कार्रवाई करने को तैयार है, भले इसके नतीजे पूरी दुनिया पर पड़ें और इसका बड़े पैमाने पर विरोध हो।

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ज्यादा बुनियादी चिंता कोई एक फैसला नहीं, बल्कि अमेरिकी नीति की आम दिशा है। ट्रंप की मध्य-पूर्व नीति ने अमेरिकी फैसले लेने की प्रक्रिया को इजरायल के युद्ध लक्ष्यों के साथ इस अभूतपूर्व स्तर तक जोड़ दिया है, कि स्वतंत्र फैसले लेने की गुंजाइश बहुत कम रह गई है। इजरायल से यही जुड़ाव वॉशिंगटन को दुनिया से अलग-थलग कर रहा है।

यह नुकसान ईरान युद्ध के पहले ही साफ दिखने लगा था जब अमेरिका ने गाजा में इसराइल के नरसंहार और जातीय सफाए का खुले तौर पर समर्थन किया। ईरान के साथ युद्ध ने यूरोप, एशिया और मध्य-पूर्व में बने गठबंधनों को और कमजोर कर दिया है; इसने उन साझेदारियों को कमजोर किया है, जिन्हें बनाने में दशकों लगे थे और साथ ही चीन और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वियों को प्रभाव बढ़ाने का मौका दे दिया। जैसे-जैसे वॉशिंगटन सैन्य समाधानों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहा है, वह उन्हीं नेटवर्कों को कमजोर कर रहा है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से उसके प्रभाव को बढ़ाया।

खाड़ी क्षेत्र में यह सबसे ज्यादा साफ दिखता है। सालों तक, खाड़ी देशों ने अपनी सुरक्षा की गारंटी के तौर पर अमेरिका पर भरोसा किया, भले ही वे उसकी नीतियों से सहमत न हों। वह रिश्ता अब कमजोर पड़ रहा है। युद्ध ने उन्हें बेनकाब कर दिया है, वे आर्थिक रूप से कमजोर हो गए हैं और रणनीतिक रूप से अनिश्चित स्थिति में हैं। इस क्षेत्र को स्थिर करने के बजाय, अमेरिका के कदमों ने उनमें असुरक्षा की भावना को बढ़ा दिया है।

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भले ट्रंप सफलता का दावा कर रहे हों, लेकिन ईरान और भी ज्यादा ताकतवर बनकर उभरा है; स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसका काफी दबदबा है- यह वह अहम समुद्री रास्ता है जो दुनिया के कच्चे तेल और एलएनजी के कम-से-कम 20 फीसदी व्यापार को नियंत्रित करता है, और साथ ही उर्वरकों और प्रमुख कच्चे माल के वैश्विक समुद्री व्यापार के लगभग एक-तिहाई हिस्से को भी नियंत्रित करता है।

ऐसा लगता है कि वॉशिंगटन अपने सहयोगियों की चिंताओं पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। खाड़ी देश इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उन्हें एक ऐसे टकराव में बुरी तरह घसीट लिया गया जिसे न तो उन्होंने शुरू किया, न ही वे उसे नियंत्रित कर सकते हैं, और जिससे उन्हें कोई फायदा भी नहीं होने जा रहा। यह धारणा कि नेतन्याहू, ट्रंप को अपनी उंगलियों पर नचा रहे हैं- कि अमेरिकी नीति मुख्य रूप से क्षेत्रीय स्थिरता की चिंता के बजाय इसराइली प्राथमिकताओं और नेतन्याहू के जुनून से प्रेरित है- ने इस बेचैनी को और गहरा कर दिया है। किसी सहयोगी का समर्थन करना एक बात है, लेकिन उसके एजेंडे का बंधक बन जाना बिल्कुल दूसरी बात है।

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ईरान के साथ युद्ध ने इस धारणा को और पुख्ता किया है। ये हमले असफल कूटनीति के बाद नहीं हुए; बल्कि ये चल रही बातचीत के बीच हुए, जिससे दुनिया भर में लंबे समय से चली आ रही उस आशंका को बल मिला है कि अमेरिका कूटनीति को एक प्रतिबद्धता के बजाय एक चाल के रूप में देखता है। यह बात मायने रखती है। जब सैन्य कार्रवाई से बातचीत प्रक्रिया को बार-बार कमजोर किया जाता है, तो विश्वास टूट जाता है। और बुनियादी स्तर के विश्वास के बिना, कूटनीति असंभव हो जाती है।

वैश्विक दक्षिण में, ईरान के साथ युद्ध को ‘चुनावी युद्ध’ के रूप में देखा जाता है; कुछ पर्यवेक्षकों ने तो इसे ‘मनमाना युद्ध’ तक कह दिया है, यानी एक सैन्य महाशक्ति द्वारा एक कमजोर प्रतिद्वंद्वी को धमकाने का प्रयास। यह इस व्यापक धारणा को बल देता है कि तथाकथित नियम-आधारित व्यवस्था चयनात्मक और स्वार्थपरक है। जब वाशिंगटन अपने विरोधियों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानून या परमाणु अप्रसार का हवाला देता है, लेकिन सुविधा के अनुसार इसकी अनदेखी करता है, तो उसकी कोई नैतिक वैधता नहीं रह जाती।

वैश्विक गठबंधनों में इस नैतिक वैधता की कमी का असर पहले से ही दिखने लगा है। जो देश कभी अमेरिका को एक स्थिर शक्ति के रूप में देखते थे, वे अब सतर्क रुख अपना रहे हैं। कुछ देश चीन के करीब जा रहे हैं, जो खुद को एक अधिक विश्वसनीय सहयोगी के रूप में प्रस्तुत करता है। दूसरे देश बस पीछे हट रहे हैं, और किसी भी बड़ी ताकत के साथ ज्यादा जुड़ने से कतरा रहे हैं। यहां तक कि यूके, फ्रांस, जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे करीबी सहयोगी भी संयुक्त राष्ट्र में अपने वोट देने के तरीकों में अमेरिका से लगातार अलग होते जा रहे हैं।

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ट्रंप के समर्थक तर्क देते हैं कि ताकत ही मायने रखती है, आम सहमति नहीं। लेकिन यह तर्क जोर-जबरदस्ती करने वाली ताकत को आभास देता है कि इसका असर दीर्घकालिक है जबकि यह होता अल्पकालिक है। सैन्य ताकत से कुछ लड़ाइयां तो जीती जा सकती हैं, लेकिन इससे कोई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था या महाशक्ति का दर्जा कायम नहीं रखा जा सकता। इसके लिए वैधता, सहयोग और नियमों-कायदों के आदर की इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।

अमेरिका की नीति में जो विरोधाभास हैं, उन्हें अब नजरअंदाज करना नामुमकिन है। ऐसा लगता है कि वॉशिंगटन ने कूटनीति की भाषा अभी पूरी तरह नहीं छोड़ी है। वह अब भी बातचीत, युद्धविराम और ऐसी ही दूसरी बातों की अपील करता है, लेकिन उसके काम इसके ठीक उलटी दिशा में जाते हैं।

इसके कुछ नतीजे निकलते हैं। अमेरिका के लिए किसी भी विवाद में एक निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाना, या साझा लक्ष्यों के लिए अपने सहयोगियों को एकजुट करना, या यह दिखाना कि अमेरिकी नेतृत्व संकीर्ण और तात्कालिक स्वार्थों से परे भी सोच सकता है, और भी मुश्किल हो जाता है।

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पश्चिम में भी दरारें चौड़ी होती जा रही हैं। नाटो समेत यूरोपीय सरकारों ने भले वाशिंगटन से खुलकर नाता न तोड़ा हो, लेकिन संयम बरतने और नए सिरे से कूटनीति अपनाने की उनकी मांगों से उनकी बेचैनी साफ जाहिर होती है। ट्रंप ने तो पोप से भी झगड़ा मोल लिया है, जिससे उनके अपने देश में ईसाई समर्थकों के एक तबके के उनसे नाराज हो जाने की संभावना है। भले सीनेट में उनके पक्ष में वोट पड़ा हो, लेकिन मध्य-पूर्व में एक लंबे युद्ध के लिए आम लोगों का समर्थन बहुत कम है। इस युद्ध से वे निर्णायक नतीजे नहीं मिले, जिनका ट्रंप ने वादा किया था। ईरान का शासन अब भी कायम है, और शायद युद्ध से पहले की तुलना में कहीं मजबूत है। उसका क्षेत्रीय प्रभाव जरा भी कम नहीं हुआ, और उसने समुद्री व्यापार के एक अहम रणनीतिक नाके पर सफलतापूर्वक अपना दबदबा बनाया है।

सहयोगियों के साथ तालमेल बैठाने और ईरान के साथ कूटनीति का रास्ता आजमाने के बजाय ट्रंप ने ‘अधिकतम दबाव’ का रास्ता चुना, और बिना कोई सवाल किए मनमानी करने वाले एक निरंकुश क्षेत्रीय ताकत का साथ दिया। नतीजा यह हुआ कि एक महाशक्ति के पास अब न कोई दोस्त बचा और न कोई सच्चा सहयोगी। ट्रंप का अमेरिका बेशक एक सैन्य महाशक्ति है, लेकिन उसकी कूटनीतिक साख लगभग पूरी तरह खत्म हो चुकी है।

अशोक स्वैन स्वीडन की उप्सला यूनिवर्सिटी में पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च के प्रोफेसर हैं

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