
देश नया-नया आज़ाद हुआ था और हिंदी सिनेमा में ऐसे एक्टर ने जन्म लिया, जो आम आदमी के दर्द, उसकी परेशानियों को ना सिर्फ स्क्रीन पर निभाए बल्कि अपने संवाद से लोगों को रोने पर मजबूर कर दें। हम बात कर रहे हैं बलराज साहनी की, जिन्होंने एक तरफ समाज की ऊंच-नीच की व्यवस्था पर फिल्में बनाई तो दूसरी तरफ कर्मिशल अभिनेता बनकर उभरे। आज 1 अप्रैल को बलराज साहनी की जयंती है।
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बलराज साहनी के लिए फिल्मों के साथ-साथ असल जिंदगी में भी नैतिकता और सामाजिक सरोकार जीवन का अहम हिस्सा थे। उन्होंने पर्दे पर 'धरती के लाल', 'दो बीघा ज़मीन', 'काबुलीवाला' और 'गर्म हवा' जैसी सामाजिक फिल्में की लेकिन दूसरी तरफ 'अनुराधा', 'वक़्त', 'संघर्ष' और 'एक फूल दो माली' जैसी कर्मिशल फिल्में भी की।
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बलराज साहनी की गिनती ऐसे अभिनेताओं में होती थी, जो अपने किरदार को महसूस करने और समझने के लिए हर हद पार कर देते थे लेकिन एक समय ऐसा आया, जब सूट-बूट की वजह से उनके हाथ से फिल्म निकलने की नौबत आ गई है। ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज ने शंभू महतो नाम के शख्स का किरदार निभाया था, जो एक गरीब रिक्शावाला है। फिल्म की कास्टिंग के दौरान इस किरदार के लिए निर्देशक बिमल रॉय अच्छे अभिनेता की तलाश में थे, जो एक गरीब की व्यथा और मजबूरी को पर्दे पर उतार सके।
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पहले रोल अशोक कुमार, त्रिलोक कपूर और नाजिर हुसैन को ऑफर हुए लेकिन फिर बिमल रॉय ने बलराज साहनी की फिल्म ‘हम लोग’ में उनके द्वारा निभाए गए रोल को देखा और वे उनसे काफी हद तक प्रभावित हुए। उन्हें किरदार इतना अच्छा लगा कि उन्होंने अभिनेता को मिलने का बुलावा भिजवा दिया। फिर क्या बलराज साहनी काले सूट-बूट में निर्देशक से मिलने के लिए पहुंच गए। सूट-बूट में बलराज को देखकर निर्देशक ने सिर पकड़ लिया क्योंकि वे बहुत ज्यादा हैंडसम लग रहे थे और उन्हें देखकर नहीं लग रहा था कि वह गरीब रिक्शेवाला का किरदार निभा सकते हैं।
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उन्होंने बलराज साहनी से कहा कि जिस किरदार के लिए आपको चुना गया है, उसमें आप फिट नहीं बैठते। इस पर बलराज साहनी ने निर्देशक से फिल्म ‘धरती के लाल’ देखने के लिए कहा, जिसमें उन्होंने 'निरंजन' नामक एक दुखी और बेबस बड़े बेटे का रोल प्ले किया था। फिर क्या, फिल्म देखते ही ‘दो बीघा जमीन’ अभिनेता की झोली में आ गिरी।
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