
डॉ. मोहम्मद आलमगीर अंसारी, जो आलमगीर साहिल के नाम से प्रसिद्ध हैं, झारखंड की प्रसिद्ध ‘बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय’ में 10 मार्च 2022 से अध्यापन का दायित्व निभा रहे हैं। उन्होंने उर्दू विभाग में छात्र-छात्राओं के बीच एक सुखद वातावरण तैयार किया है ताकि उनमें साहित्य के प्रति रुचि पैदा हो और ऐसा आलोचनात्मक बोध जागृत किया जा सके जिससे वे साहित्य को जीवन के बदलते परिप्रेक्ष्य में समझ सकें। शायरी, साहित्यिक पत्रकारिता तथा शोध व आलोचना आलमगीर साहिल के प्रिय कार्यक्षेत्र हैं, इसलिए वे अध्यापन का दायित्व निभाने के साथ-साथ साहित्यिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहते हैं। उनकी महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों में ‘निदा फ़ाज़ली की शायरी में हिंदुस्तानी कल्चर की अक्कासी’ (आलोचना), ‘निदा के चार रंग’ (आलोचना), ‘मुतालआत’ (आलोचनात्मक लेखों का संग्रह), ‘शोबा उर्दू रांची यूनिवर्सिटी के मारूफ़ क़लमकार’ (संपादन), ‘धूप की मुसाफ़त’ (काव्य संग्रह) आदि शामिल हैं। साहित्यिक पत्रकारिता की बात करें तो वे त्रैमासिक ‘अहदनामा’ (सहायक संपादक), पाक्षिक ‘कहाँ हम लोग’ (सहायक संपादक), त्रैमासिक ‘मौज-ए-अदब’ (स्वामी एवं प्रधान संपादक के रूप में, जिसके 2 अंक प्रकाशित हुए), त्रैमासिक ‘उम्मीद-ए-सहर’ (स्वामी एवं प्रधान संपादक के रूप में, जिसके 26 अंक प्रकाशित हो चुके हैं) आदि से जुड़े रहे हैं। उनके साहित्यिक योगदानों को ध्यान में रखते हुए जनवरी 2026 में उन्हें ‘डॉ. हैरत फर्रुख़ाबादी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया।
20 मार्च 1984 को रांची स्थित बरियातू के सितार कॉलोनी में जन्मे आलमगीर साहिल की शैक्षिक यात्रा में उर्दू को विशेष स्थान प्राप्त रहा है। उन्हें उर्दू और अरबी की प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही मिली, और फिर जिला स्कूल बरियातू से मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद इंटरमीडिएट के लिए उन्होंने रांची कॉलेज का रुख किया और वहीं से बीए (उर्दू) तक की शिक्षा पूरी की। उर्दू से अत्यधिक प्रेम करने वाले आलमगीर साहिल ने आगे की शिक्षा के लिए उर्दू विभाग, रांची विश्वविद्यालय का चयन किया। यहां से एमए और पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर वे पूरी तरह उर्दू के प्रचार-प्रसार में सक्रिय हो गए।
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बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय के इतिहास पर संक्षेप में प्रकाश डालें, यह विश्वविद्यालय किन अर्थों में महत्व रखता है?
बिनोद बिहारी महतो कोयलांचल विश्वविद्यालय, धनबाद की स्थापना 13 नवंबर 2017 को हुई, जो इस क्षेत्र की जनता के दीर्घकालीन संघर्ष का परिणाम है। इस विश्वविद्यालय का नाम झारखंड के महान जननेता और शिक्षा आंदोलन के अग्रदूत बिनोद बिहारी महतो के नाम पर रखा गया है, जिनका प्रसिद्ध नारा ‘पढ़ो और लड़ो’ आज भी यहां के छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत है। यह विश्वविद्यालय मूलतः विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हज़ारीबाग से अलग होकर अस्तित्व में आया ताकि धनबाद और बोकारो जैसे औद्योगिक एवं खनिज संसाधनों से समृद्ध जिलों के छात्रों को उनके द्वार पर उच्च शिक्षा की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र ‘कोयलांचल’ अर्थात ‘कोयले की धरती’ के रूप में जाना जाता है, जहां श्रमिक वर्ग और आदिवासी आबादी बड़ी संख्या में निवास करती है। ऐसे वातावरण में एक स्वतंत्र और पूर्ण विश्वविद्यालय की स्थापना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यहां के प्रतिभाशाली छात्रों को दूर-दराज़ के बड़े शहरों में जाने के बजाय अपने ही क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर की शिक्षा उपलब्ध हो सके।
यह विश्वविद्यालय केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं है, बल्कि कोयलांचल के पिछड़े और संसाधनों से वंचित वर्गों के लिए सामाजिक और आर्थिक विकास का एक उज्ज्वल स्तंभ है। इसकी महत्ता इसलिए भी बढ़ जाती है कि यह क्षेत्र बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक पहचान रखता है। यहाँ उर्दू, हिंदी, बंगाली और विभिन्न स्थानीय भाषाएं बोलने वाले एक ही छत के नीचे शिक्षा ग्रहण करते हैं। विश्वविद्यालय इन सभी भाषाई इकाइयों के बीच वैचारिक संबंध स्थापित करने का कार्य कर रहा है। विशेष रूप से उर्दू भाषा और साहित्य के संदर्भ में यह संस्थान एक केंद्र की भूमिका निभा रहा है क्योंकि धनबाद और आसपास के क्षेत्रों में उर्दू बोलने और समझने वालों की एक बड़ी बौद्धिक और साहित्यिक परंपरा रही है। यहां की शैक्षिक व्यवस्था में आधुनिकता और परंपरा का सुंदर समन्वय दिखाई देता है, जो छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के क्षेत्र में अपनी जगह बनाने योग्य बनाता है।
उर्दू विभाग में अध्यापन के दौरान आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, और आप उनका समाधान किस प्रकार निकालते हैं?
उर्दू विभाग में अध्यापन का दायित्व निभाना जहां एक सम्मान है, वहीं यह अनेक शैक्षिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियों से भी भरा हुआ है। सबसे बड़ी चुनौती छात्रों की भाषाई आधारशिला का कमजोर होना है। कोयलांचल के इस औद्योगिक क्षेत्र में अधिकांश छात्र ऐसी पृष्ठभूमि से आते हैं जहाँ उर्दू उनकी मातृभाषा तो है, लेकिन साहित्यिक भाषा की विशेषताओं, भाषिक शुद्धता और व्याकरण की जटिलताओं से वे पूरी तरह परिचित नहीं होते। विशेष रूप से क्लासिकी शायरी की व्याख्या प्रारंभ में काफी कठिन और नीरस सिद्ध होती है। इसके अतिरिक्त आधुनिक युग में डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के कारण छात्रों में गंभीर अध्ययन की परंपरा कमजोर पड़ रही है, जिससे उनके शब्द भंडार में कमी और वैचारिक गहराई का अभाव दिखाई देता है।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए मैंने बहुआयामी और व्यावहारिक रणनीति अपनाई है। भाषाई दक्षता में सुधार के लिए हम कक्षाओं में केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रहते, बल्कि नियमित रूप से वर्तनी, उच्चारण और शब्दकोश के सही प्रयोग का अभ्यास भी कराते हैं। जहाँ तक छंदशास्त्र और काव्य तथा कलात्मक विमर्श का संबंध है, मैंने उसे सरल बनाने के लिए ‘बज़्म-ए-अदब’ नाम से मासिक गोष्ठी की शुरुआत की है। दूसरा महत्वपूर्ण समाधान तकनीक का साहित्यिक उपयोग है। हम छात्रों को आधुनिक शोध वेबसाइट्स और ऑनलाइन पुस्तकालयों से परिचित कराते हैं ताकि वे पुस्तकों की उपलब्धता की समस्याओं से ऊपर उठकर नवीनतम शोध लेखों तक पहुंच प्राप्त कर सकें। मेरा उद्देश्य केवल उपाधि दिलाना नहीं, बल्कि छात्रों में ऐसा आलोचनात्मक बोध जागृत करना है कि वे साहित्य को जीवन के बदलते परिप्रेक्ष्य में समझ सकें।
छात्रों में उर्दू भाषा और साहित्य के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए आप कौन-सी अध्यापन रणनीति अपनाते हैं?
छात्रों में उर्दू भाषा और साहित्य के प्रति वास्तविक लगाव पैदा करना और उसे बनाए रखना वर्तमान समय में एक बड़ी चुनौती है, जिसे मैं केवल पारंपरिक व्याख्यान के बजाय रचनात्मक और व्यावहारिक रणनीति से हल करने का प्रयास करता हूँ। मेरी पहली प्राथमिकता यह होती है कि उर्दू साहित्य को अतीत की कहानी समझने के बजाय उसे वर्तमान जीवन और समकालीन समस्याओं से जोड़कर प्रस्तुत किया जाए। जब मैं मीर, ग़ालिब, फ़ैज़ या इक़बाल की शायरी पढ़ाता हूँ तो उसकी व्याख्या केवल शब्दार्थ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मैं उनके शेरों को आज के मनोवैज्ञानिक और वैचारिक परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट करता हूँ ताकि छात्र को महसूस हो कि यह काव्य उनकी अपनी ज़िंदगी की अभिव्यक्ति कर रहा है। उर्दू विभाग में हम नियमित रूप से साहित्यिक संगोष्ठी, साहित्यिक प्रश्नोत्तरी, कहानी पाठ आदि का आयोजन करते हैं, जिनसे शुष्क पाठ्यक्रम में जीवन का संचार हो जाता है। इसके अतिरिक्त मैं तकनीक और डिजिटल माध्यमों का भरपूर उपयोग करता हूं। रेख्ता जैसी वेबसाइट्स, ई-पुस्तकालयों और वृत्तचित्रों के माध्यम से छात्रों को उर्दू की व्यापकता का अनुभव कराया जाता है। मेरा उद्देश्य यह है कि छात्र उर्दू को केवल एक वैकल्पिक विषय के रूप में न पढ़े, बल्कि उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान और अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ माध्यम समझकर उससे प्रेम करने लगे।
क्या अध्यापन के दौरान आप पुरुष छात्र और महिला छात्र में किसी प्रकार का अंतर महसूस करते हैं?
वर्षों के अध्यापन अनुभव और कक्षा संबंधी अवलोकनों के आधार पर पुरुष और महिला छात्रों के बीच कुछ व्यवहारों और शैक्षिक गतिविधियों का अंतर मैंने स्पष्ट रूप से महसूस किया है। यदि हम कक्षा में सहभागिता और उपस्थिति की बात करें तो सामान्यतः यह देखा गया है कि छात्राएँ अधिक गंभीर और समयनिष्ठ दिखाई देती हैं। उर्दू भाषा और साहित्य के प्रति उनका लगाव बौद्धिक और रचनात्मक स्तर पर अधिक गहरा होता है। वे व्याख्यानों को ध्यानपूर्वक सुनने, महत्वपूर्ण बिंदुओं को लिखने और शैक्षिक अनुशासन बनाए रखने में अधिक तत्पर होती हैं, जबकि लड़कों में कभी-कभी लापरवाही या उपस्थिति के मामले में कुछ उपेक्षा देखने को मिलती है।
जहां तक प्रोजेक्ट वर्क और शोध असाइनमेंट का संबंध है, छात्राओं का कार्य अधिक सुव्यवस्थित और सौंदर्यात्मक गुणों से युक्त होता है। वे सूक्ष्मताओं पर ध्यान देती हैं और दिए गए कार्य को निर्धारित समय पर पूरा करती हैं। इसके विपरीत पुरुष छात्रों में यद्यपि वैचारिक निर्भीकता और मौखिक वाद-विवाद की क्षमता अधिक होती है, लेकिन लिखित कार्य में वे प्रायः संक्षिप्तता या जल्दबाज़ी से काम लेते हैं। कक्षा में होने वाली बौद्धिक चर्चाओं में पुरुष छात्र सामान्यतः अधिक सक्रिय रहते हैं और प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करते, जबकि छात्राएं प्रारंभ में अपेक्षाकृत कम बोलती हैं, लेकिन जब वे अपने विचार व्यक्त करती हैं तो उनके तर्कों में पाठ का गहरा अध्ययन और गंभीरता झलकती है।
कोयलांचल विश्वविद्यालय का समग्र शैक्षिक वातावरण उर्दू भाषा और साहित्य की प्रगति में कितना सहायक सिद्ध हो रहा है?
हमारे यहां उर्दू विभाग केवल एक पारंपरिक पाठ्यक्रमीय आवश्यकता नहीं, बल्कि एक सक्रिय साहित्यिक इकाई बन चुका है, जहां छात्रों को अपनी रचनात्मक क्षमताओं के प्रदर्शन के भरपूर अवसर उपलब्ध हैं। महाविद्यालय का वातावरण बहुभाषी होने के बावजूद उर्दू के लिए विशेष आकर्षण रखता है। नई शिक्षा नीति और आधुनिक पाठ्यक्रम लागू होने के बाद अन्य विषयों के छात्रों द्वारा ओपन इलेक्टिव (Open Elective) के रूप में उर्दू का चयन करना इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यहाँ का बौद्धिक वातावरण उर्दू की सुगंध से भरा हुआ है। प्रशासन की ओर से साहित्यिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों और मुशायरों के आयोजन के लिए मिलने वाला भरपूर सहयोग इस प्रचारात्मक प्रक्रिया को और गति प्रदान करता है।
इस औद्योगिक क्षेत्र में, जहां सामान्यतः तकनीकी और व्यावसायिक प्रवृत्तियों का प्रभुत्व रहता है, हमारा संस्थान मानवीय मूल्यों और साहित्यिक सौंदर्य का संरक्षण कर रहा है। विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में उर्दू की उत्कृष्ट पुस्तकों और समकालीन पत्रिकाओं की उपलब्धता छात्रों में अध्ययन रुचि को विकसित करने में केंद्रीय भूमिका निभा रही है। शिक्षकों और छात्रों के बीच होने वाली अनौपचारिक साहित्यिक बैठकों और बौद्धिक संवादों से उर्दू भाषा की समझ केवल परीक्षा की आवश्यकता तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वैचारिक गहराई तक पहुंचती है। धनबाद जैसे क्षेत्र में, जहां उर्दू को अनेक सामाजिक और भाषाई चुनौतियों का सामना रहा है, विश्वविद्यालय की यह बौद्धिक गरिमा और साहित्यिक गतिविधियां उर्दू के अस्तित्व और प्रगति में एक मील का पत्थर सिद्ध हो रही हैं।
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