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राफेल मामले में बड़ा खुलासा, मोदी सरकार ने सौदे में शामिल कठोर शर्तों को हटाकर दसॉल्ट को दी बड़ी राहत 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने राफेल के ऑफसेट सौदे में शामिल कठोर शर्तों को हटाकर दसॉ एविएशन और दूसरी कंपनी एमबीडीए को असाधारण और अभूतपूर्व राहत दी थी।

फोटो: सोशल मीडिया
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नवजीवन डेस्क

राफेल मामले पर एक और नया खुलासा हुआ है। द हिन्‍दू में छपी वरिष्‍ठ पत्रकार एन राम की रिपोर्ट के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने राफेल के ऑफसेट सौदे में शामिल कठोर शर्तों को हटाकर दसॉल्ट एविएशन और दूसरी कंपनी एमबीडीए को असाधारण और अभूतपूर्व राहत दी थी।

खबर के अनुसार, इन दोनों कंपनियों ने 7.87 अरब डॉलर के राफेल सौदे के तहत ही 23 सितंबर, 2016 को भारत सरकार के साथ ऑफसेट समझौते पर दस्तखत किये थे। ऑफसेट समझौते से पहले 24 अगस्त, 2016 को राजनीतिक निर्णय लेने वाली उच्चस्तरीय समिति ने दसॉल्ट को यह राहत दी थी। इतना ही नहीं दोनों कंपनियों को रक्षा सौदे की प्रक्रिया (डीपीपी-2013) के स्टैंडर्ड कॉन्ट्रैक्ट दस्तावेज के कई प्रावधानों के अनुपालन से छूट भी दी गई। ये कंपनियां आर्ब‍िट्रेशन के लिए ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट में तय प्रावधान (अनुच्छेद 9) और इंडस्ट्र‍ियल सप्लायर्स (अनुच्छेद 12) के बही-खातों तक पहुंच के खिलाफ थीं।

खबर में दावा किया गया है कि रक्षा मंत्री खुद इसे अपने स्तर पर मंजूरी देने में काफी असहजता महसूस कर रहे थे, क्योंकि यह रक्षा खरीद प्रक्रिया से काफी हटकर कुछ करने की बात थी। जिसके बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की अध्यक्षता वाली रक्षा खरीद परिषद (डीएसी) ने 'अंतिम समीक्षा और मंजूरी' के लिए पीएम मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की मंत्रीमंडलिय समिति के पास भेजा था।

इतना ही नहीं डीएसी द्वारा चुपके से दो और महत्वपूर्ण अनिवार्य शर्त हटा दिए गए। डीपीपी 2013 में इस बात का सख्त प्रावधान था कि कॉन्ट्रैक्ट में किसी तरह के 'अनुचित प्रभाव का इस्तेमाल' नहीं होगा और 'एजेंट या एजेंसी को कमीशन' नहीं दिया जा सकता। इसमें इस बात का भी ख्याल रखा गया था कि अगर कोई निजी इंडस्ट्र‍ियल सप्लायर इसका उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की हो। लेकिन डीएसी ने इन शर्तों को चुपचाप हटा दिया। यहां तक की इसे हटाने के लिए सीसीएस से मंजूरी भी नहीं ली गई।

और तो और सरकार ने इन महत्वपूर्ण तथ्यों को सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी जानकारी में नहीं बताया। अगस्त 2015 में ऑफसेट पॉलिसी में ये बड़े बदलाव किए गए और इसे 21 जुलाई, 2016 के भारतीय निगोशिएशन टीम (आईएनटी) की फाइनल रिपोर्ट में शामिल किया गया।

राफेल सौदे के मुताबिक दसॉल्ट एविएशन (साथ में उसके 21 सब-वेंडर) के द्वारा एमबीडीए (साथ में 12 सब-वेंडर) के साथ मिलकर कुल कॉन्ट्रैक्ट वैल्यू के 50 फीसदी तक ऑफसेट सौदा भारत में दिया जाएगा। यह करीब 30 हजार करोड़ रुपये का होता है और सौदे के चौथे साल (अक्टूबर 2019) से आगे सातवें साल तक यानी कुल तीन साल में पूरा किया जाएगा। यानी इसमें पहले तीन साल में शून्य देनदारी होगी, जबकि सातवें साल में 57 फीसदी जवाबदेही का पूरा करना होगा। जबकि यूपीए द्वारा किए जाने वाले सौदे में देनदारी 88 फीसदी तक तय की गई थी। मेक इंडिया के तहत राफेल के निर्माण के दावे को भी इस रिपोर्ट में नकारा गया है। कम से कम पहले तीन साल में दोनों फ्रांसीसी कंपनियों का मेक इन इंडिया में कोई योगदान नहीं होगा।

आईएनटी की फाइनल रिपोर्ट से पता चलता है कि दसॉल्ट एविएशन और एमबीडीए का शुरुआती ऑफसेट प्रस्ताव कुछ और था, लेकिन रक्षा मंत्रालय की 4 जनवरी, 2016 की बैठक में निर्णय लिया गया कि फ्रांसीसी कंपनियों को तत्काल नया ऑफसेट प्रस्ताव जमा करने को कहा जाए।

कांग्रेस ने सरकार के खिलाफ राफेल डील को लेकर मोर्चा खोला रखा है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद इस मुद्दे पर कांग्रेस एक बार फिर पीएम मोदी पर हमलावर हो गई है। कांग्रेस ने यूपीए के समय में राफेल सौदे के शर्तों को भी याद दिलाया है।

Published: 9 Apr 2019, 6:57 PM
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