स्वतंत्रता दिवस विशेषः गांधी की दृष्टि ने उम्मीद को जिंदा रखा है

हमारा संविधान और लोकतंत्र कोई ब्रितानियों का तोहफा नहीं था। हमने इसके लिए कदम-कदम पर युद्ध किया। आज इसी संविधान पर हमले हो रहे हैं। सबसे बड़ा हमला लोकतांत्रिक आदर्शों, संवाद, विवाद, सर्वानमति के जरिए शासन के तरीकों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर किया जा रहा है।

फोटोः सोशल मीडिया
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मृदुला मुखर्जी

  • अपने लक्ष्य की ओर आगे की कोई भी तरक्की करने से पहले हमें बोलने की आजादी (फ्री स्पीच) और एक-दूसरे से जुड़ने की आजादी (फ्री एसोसिएशन) के अधिकार को बेहतर बनाना चाहिए। हमें अपने जीवन में इन मूलभूत अधिकारों की हर हाल में रक्षा करनी चाहिए।’
  • ‘बोलने की आजादी का अर्थ है कि उसे तब भी न काटा जाए जब उससे (स्पीच) तकलीफ हो। प्रेस की स्वतंत्रता को सही मायने में तब सम्मान मिल सकता है जब वह कड़वे शब्दों में अपनी बात कह सके और यहां तक कि गलत तरीके से प्रस्तुत किए गए किसी मामले में सख्त टिप्पणी कर सके।’
  • ‘फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन की सच में इज्जत तब होती है जब संगठित लोग क्रांतिकारी योजनाओं और परियोजनाओं पर खुलकर बहस कर सकें।’
  • ‘नागरिक स्वतंत्रता के साथ-साथ जब अहिंसा का हर कदम पर लगातार पालन होता है, तो वह स्वराज की तरफ प्रथम कदम होता है। यह राजनीतिक और सामाजिक जिंदगी की सांस है और आजादी की नींव है। यहां मिलावट और समझौतों के लिए कोई जगह नहीं है, यह जीवन के लिए पानी की तरह है।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उपरोक्त शब्द, जो उन्होंने आजादी की ऐतिहासिक लड़ाई के दौरान लिखे थे, आज भी मेरे दिमाग में लगातार गूंज रहे हैं, जब मैं आजादी के 72 वर्षों को पुनःस्मरण कर लिखने की जद्दोजहद कर रही हूं। उस विरासत का क्या हुआ जो हमें हमारे स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा सौंपी गई थी, कि आज की सरकार पूरी इच्छा से एक राज्य के सभी लोगों को उनकी मौलिक आजादी से वंचित कर सकती है?

इस पंद्रह अगस्त पर हम क्या जश्न मनाएंगे, जब हमारे अपने ही नागरिक जम्मू-कश्मीर में ताला बंद होंगे, जब ऐसे कानून जिनके अनुसार हममें से किसी को भी कभी भी आतंकवादी घोषित किया जा सकता है, बिना किसी इम्प्यूनिटी के साथ पास किए जाते हैं, जिन अधिकारों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी गई, जैसे कि सूचना का अधिकार, उन्हें खतरनाक तरीके से ध्वस्त कर दिया गया है और बेहतरीन शिक्षण संस्थानों और उनके छात्रों तथा अध्यापकों को जानबूझ कर निशाना बनाया जा रहा है?

स्वतंत्रता के संघर्ष की विरासत तो बहुत बड़ी है, लेकिन इसके सबसे महत्वपूर्ण तत्व हैं धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबद्धता, जिसमें नागरिक स्वतंत्रता को लोकतंत्र के अभिन्न अंग के रूप में देखा जाता है। हमारी विरासत में एक समतावादी समाज और आर्थिक व्यवस्था या फिर गरीब समर्थक उन्मुखीकरण और संप्रभुता के साथ स्वतंत्रता शामिल है।

हमारा संविधान कोई ब्रितानियों का तोहफा नहीं था और न ही हमारा लोकतंत्र। हमने इसके लिए कदम-कदम पर युद्ध किया है। आज इसी संविधान पर आक्रमण हो रहे हैं। सबसे बड़ा ताकतवर हमला लोकतांत्रिक आदर्शों और संवाद, विवाद, परामर्श, सर्वानुमति के जरिए शासन के तरीकों और नागरिक स्वतंत्रताओं पर किया जा रहा है।

और मेरे पास मार्गदर्शन और प्रेरणा के लिए हमारी आजादी के आंदोलन की समृद्ध विरासत की तरफ वापस मुड़ने के सिवाय उम्मीद को जिंदा रखने का कोई और तरीका नजर नहीं आता है। क्योंकि जब हमारे पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, तो वो हमारे समय से भी ज्यादा अंधकारमय समय था, तब नागरिक स्वतंत्रताओं पर कड़ा प्रतिबंध था और एक नस्लवादी, कब्जा करने वाली विदेशी ताकत लंबे समय के कारावास, देश निकाला, काला पानी या अंडमान में निर्वासन, मृत्युदंड को खुलेआम दमन के औजार के रूप में इस्तेमाल करती थी।

उस समय ब्रिटिश शासकों ने साम्राज्यवाद विरोधी क्रांतिकारी आंदोलनों के खिलाफ ढाल के रूप में सांप्रदायिक या धार्मिक/संप्रदायवादी, राजनीतिक संगठनों को उभरने और बढ़ने को प्रोत्साहित किया। जो बात देखने लायक है वह यह है कि इतने मुश्किल दौर में भी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने एक ऐसे स्वतंत्र उदात्त राष्ट्र की धारणा बनाई और उसी धारणा को अपने राजनीतिक व्यवहार और आंदोलन में समाहित किया।

वास्तव में वो हमारे राष्ट्रवादी नेताओं की पहली पीढ़ी थी जिन्होंने नागरिक स्वतंत्रताओं और उनके बढ़ावे के निर्वाह को राष्ट्रीय आंदोलन का अभिन्न अंग बना दिया। उन्होंने प्रेस और भाषण की आजादी के विरुद्ध हर तरह के अतिक्रमण के खिलाफ लड़ाई लड़ी। प्रेस ने सरकार के खिलाफ एक संस्थानिक किरदार निभाया, लोकतंत्र की गैरमौजूदगी में वह भारतीय प्रेस ही थी जिसने आजादी के लिए हर रोज लड़ाई लड़ी। सरकार के हर कृत्य की तीखी आलोचना की जाती थी।

मार्च 1886 में, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को वजूद में आए मुश्किल से तीन माह हुए थे तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड डफरिन ने कहा था, “दिन-प्रतिदिन सैकड़ों तेज बुद्धि बाबू अपने अंग्रेज उत्पीड़कों के खिलाफ अपने क्रोध और क्षोभ को बहुत ही प्रभावशाली तीक्ष्ण आक्षेप के माध्यम से सामने रखते हैं।” क्या यह आज हमारी प्रेस के बारे में कोई कह सकता है? इसी रौ में उन्होंने दो माह के बाद कहा, “इसमें कोई शक नहीं हो सकता कि जो इन अखबारों को पढ़ते हैं उनके दिमाग में यह विचार पूरे विश्वास के साथ घर कर गया होगा कि हम सब (ब्रितानवी) मानव जाति के शत्रु हैं और विशेष रूप से भारत के।”

इस 9 अगस्त को भारत छोड़ो आंदोलन की सालगिरह थी। उस संदर्भ में हृदय को छू जाने वाला लोकतंत्र के व्यवहार का उदाहरण देती हूं, जो न केवल मतभेद को सहन करने, उसको अपनाने बल्कि वास्तव में उसे बढ़ावा देने और जब आवश्यकता पड़े तो उनको बचाने का उदाहरण है, जो तुमसे मतभेद रखते हैं। गांधीजी स्वयं इस परंपरा के जीवंत उदाहरण थे।

भारत छोड़ो आंदोलन के शुरू होने के एक दिन पहले बॉम्बे के मध्य में गोवलिया टैंक के खुले मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक बुलाई गई थी। यह दूसरे विश्व युद्ध का समय था, जब कठोर सैनिक शासन लागू था और किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि, जिसमें सार्वजनिक सभाएं भी शामिल थीं, पर प्रतिबंध था। इसके बावजूद कांग्रेस ने अपने सत्र में भारत छोड़ो आंदोलन पर फैसला इसी खुले मैदान में लिया।

हालांकि यह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक थी, लेकिन ब्रिटिश शासन के खिलाफ गुस्से में भरे हुए असंख्य लोग इसमें शामिल हो गए। और यह सब इस आंदोलन के सभी नेताओं को पकड़कर जेल में डाल देने के एक दिन पहले हुआ था। मुख्य प्रस्ताव अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन को शुरू करने के पक्ष में था। यह वह दिन था जब गांधीजी ने प्रसिद्ध ‘करो या मरो’ का नारा दिया था।

हालांकि इस प्रस्ताव से सारा माहौल ऊर्जावान हो गया था, फिर भी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में 13 कम्युनिस्ट सदस्य इस प्रस्ताव के विरोध में थे। यह उनके जनयुद्ध (पीपुल्स वार) की तर्ज पर था। उनका मानना था कि यह युद्ध फासीवाद के खिलाफ है। सोवियत संघ गठबंधन की तरफ था जिसमें ब्रिटेन भी शामिल था। उनका मानना था कि हमें युद्ध में उनका समर्थन करना चाहिए। इसलिए इन 13 कम्युनिस्ट सदस्यों ने प्रस्ताव में परिवर्तन करने पर जोर दिया, बल्कि वास्तव में मत विभाजन का दबाव डाला और भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव के खिलाफ वोट दिया।

अब ये जानना आंखें खोलने वाला होगा कि उनके द्वारा प्रस्ताव का विरोध करने पर गांधीजी ने क्या किया? उन्होंने कहा, “मैं सभी 13 मित्रों को प्रस्ताव के खिलाफ वोट डालने के लिए बधाई देता हूं और ऐसा करने पर उन्हें शर्मिंदा नहीं होना चाहिए। पिछले 20 वर्षों में हमने यह सीखने की कोशिश की है कि हम अगर निराशाजनक माइनॉरिटी में भी हों और हमारा मजाक भी उड़ाया जा रहा हो, तो भी हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। हमने अपने विश्वास को इस आत्मविश्वास की डोर से पकड़ना सीखा है कि हम सही हैं। साहस की इस धारणा को सींचने से हम योग्य बनते हैं, क्योंकि यह एक मानव के रूप में हमें और हमारे सैंद्धातिक कद को उठाती है। इसलिए मैं प्रसन्न हुआ जब मेरे इन मित्रों ने उस सिद्धांत का अनुसरण किया जिसका मैं पिछले पंद्रह वर्षों से भी अधिक समय से अनुसरण करने का प्रयास कर रहा हूं।”

इस वाक्य के जरिए गांधीजी क्या कर रहे हैं? वह न केवल असहमति के अधिकार को स्थापित कर रहे हैं, अपितु वह भारत छोड़ो आन्दोलन के लिए उमड़े जनावेश की परिस्थिति में भी असहमति रखने वालों को एक सुरक्षा कवच भी दे रहे हैं। दरअसल इस तरह से हमारे बेहतरीन राष्ट्र नेताओं और स्वयं गांधीजी ने भारत के लोगों के भीतर लोकतंत्र के मानक डाले। यह केवल सरकार की संसदीय व्यवस्था की बात नहीं है और न ही यह केवल चुनावों की बात है। लोकतंत्र मतदान, चुनावों या सरकार के एक राजनीतिक स्वरूप से कहीं ज्यादा गहरा है। जैसा कि नेहरू ने कहा था, “परम विश्लेषण में यह तुम्हारे पड़ोसी, तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी और तुम्हारे विरोधी के प्रति विचार का तरीका, कार्य का तरीका, व्यवहार का तरीका है।”

इस स्वतंत्रता दिवस पर हमें इन आदर्शों को याद करने की जरूरत है जिनके लिए हमारे लाखों लोगों ने कठिन संघर्ष किया और यह प्रण लेने की आवश्यकता है कि उन्हें समझ कर उनकी इस धारणा को जीवित रखेंगे क्योंकि इस पर हमारा वर्तमान और हमारे बच्चों का भविष्य निर्भर करता है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं। लेखिका जेएनयू में इतिहास की प्रोफेसर और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी की निदेशक रही हैं)

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