फीफा जैसे बड़े खेल आयोजन जलवायु परिवर्तन की समस्या को विकराल करते हैं, खिलाड़ियों पर भी पड़ता है असर

इस वर्ष फीफा वर्ल्ड कप के दौरान जितना ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ है वह पिछले तीन वर्ल्ड कप के दौरान औसत उत्सर्जन से दोगुने से भी अधिक है। इस बार के आयोजन से वायुमंडल में 90.2 लाख टन कार्बन डाईआक्साइड समतुल्य गैसों के उत्सर्जन का अनुमान है।

फीफा जैसे बड़े खेल आयोजन जलवायु परिवर्तन की समस्या को विकराल करते हैं, खिलाड़ियों पर भी पड़ता है असर
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पृथ्वी का बढ़ता तापमान हरेक मानव-गतिविधि को प्रभावित करने लगा है। इससे केवल श्रमिकों की क्षमता ही कम नहीं हो रही, या केवल आर्थिक नुकसान नहीं हो रहा- बल्कि यह अब खेल आयोजनों और खिलाड़ियों को भी प्रभावित करने लगा है। शीत ओलंपिक स्थलों से प्राकृतिक बर्फ गायब होने लगी है, क्रिकेट के अधिकतर मैच अब दिन-रात में आयोजित किए जाने लगे हैं, टेनिस में विम्बलडन और फ्रेंच ओपन जैसे आयोजनों में खिलाड़ियों की क्षमता चरम तापमान से प्रभावित होने लगी है और हाल में ही संपन्न फीफा वर्ल्ड कप, जिसे फूटबाल का महाकुंभ कहा जाता है, में लगभग 20 प्रतिशत मैच ऐसे तापमान में आयोजित किए गए जो खिलाड़ियों के लिए सुरक्षित नहीं था।

भव्य खेल आयोजन समस्या को और विकराल करते हैं

फीफा वर्ल्ड कप जैसे भव्य खेल आयोजन पूरी दुनिया में फुटबॉल के प्रति आकर्षण और रोमांच पैदा करने के साथ ही कम समय में भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर उत्सर्जन कर तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन की समस्या को भी विकराल करते हैं। दूसरी तरफ, तापमान वृद्धि के कारण उत्पन्न होता असहनीय और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक तापमान खिलाड़ियों और दर्शकों को भी प्रभावित करता है। हरेक नया ऐसा खेल आयोजन अब तापमान वृद्धि के प्रति पहले से अधिक सजग होने का दावा करता है, पर ऐसे आयोजनों के बाद वैज्ञानिकों के विश्लेषण दावों के ठीक विपरीत तथ्यों को सामने रखते हैं।

ग्रीनहाउस गैसों का रिकॉर्डतोड़ उत्सर्जन हुआ

इस वर्ष के फीफा वर्ल्ड कप के आयोजन से ठीक पहले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के खूब दावे किए गए थे, कहा गया था कि इस बार का आयोजन सबसे अधिक पर्यावरण अनुकूल रहेगा। हाल में ही साइंटिस्ट्स फॉर ग्लोबल रीस्पान्सिबलिटी नामक संस्था ने वर्ल्ड कप का आकलन कर बताया है कि इस वर्ष के वर्ल्ड कप के आयोजन के दौरान जितना ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन हुआ है वह पिछले तीन वर्ल्ड कप के दौरान औसत उत्सर्जन से दोगुने से भी अधिक है। इस बार के आयोजन से वायुमंडल में 90.2 लाख टन कार्बन डाईआक्साइड समतुल्य गैसों का उत्सर्जन का अनुमान है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा की बढ़ती खपत के साथ ही, ऐसे आयोजनों के लिए नए स्टेडियम का निर्माण और आयोजक शहरों के बीच बढ़ती दूरी के कारण इनके बीच बड़ी आबादी के आवागमन के साधनों, जिसमें वायुयान भी शामिल हैं, ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ाते हैं। इस बार के विश्व कप में परंपरागत 32 टीमों के बदले 48 टीमों के बीच मुकाबले और मैचों की संख्या 64 से बढ़ाकर 104 करना भी रिकार्ड-तोड़ उत्सर्जन का एक बड़ा कारण रहा।


रिकार्डतोड़ गर्मी में हुआ फीफा वर्ल्ड कप

वर्ष 2030 में अगले वर्ल्ड कप का आयोजन भी तीन देशों में होगा। इसमें प्रमुख देश इस वर्ष की वर्ल्ड कप विजेता देश स्पेन है, साथ ही कुछ आयोजन मोरक्को और पुर्तगाल में भी होंगें। जाहिर है, अगले वर्ल्ड कप में भी एक शहर से दूसरे शहर तक दर्शकों का भारी संख्या में आवागमन होगा और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता रहेगा।

एक दूसरे अध्ययन के अनुसार वर्ल्ड कप 2026 के दौरान आयोजित कुल मैचों में से 19 प्रतिशत मैच ऐसे तापमान में आयोजित किए गए जो स्वास्थ्य को प्रभावित करने में सक्षम थे। जून-जुलाई के महीनों में मैच आयोजित किए जा रहे थे और दूसरी तरफ अमेरिका और कनाडा के अधिकतर शहर रिकार्डतोड़ गर्मी से बेहाल थे। इसी दौरान कनाडा और अमेरिका के अनेक क्षेत्रों में जंगलों की आग ने पूरे क्षेत्र की वायु गुणवत्ता को बुरी तरह प्रभावित किया था। वर्ल्ड कप के फाइनल मैच के दौरान हवा में इतना प्रदूषण था जितना 10 सिगरेटों से उत्पन्न होता है।

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डेल्लास में तापमान 50 डिग्री तक पहुंच गया था

अमेरिका के डेल्लास, ह्यूस्टन और मियामी शहरों में जीतने भी मुकाबले हुए, सभी में तापमान सामान्य से अधिक रहा। डेल्लास में 22 जून को ऑस्ट्रीया और अर्जेन्टीना के बीच जब मुकाबला चल रहा था तब स्टेडियम के बाहर का तापमान लगभग 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था। पर, इस स्टेडियम में वातानुकूलन संयंत्र लगे हैं इसलिए खिलाड़ियों और दर्शकों को कुछ राहत थी। फ्रांस और परागुए के बीच 4 जुलाई को खेले गए मैच के दौरान स्टेडियम के अंदर का तापमान 38 डिग्री सेल्सियस से अधिक था। इस वर्ल्ड कप के दौरान 23 मैच ऐसे थे, जिसमें स्टेडियम के भीतर सामान्य तापमान बनाए रखने के लिए वातानुकूलन का सहारा लेना पड़ा। यह तरीका खिलाड़ियों और दर्शकों को राहत तो देता है, पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ाता है।

इस वर्ल्ड कप के हरेक मैच से पहले संबंधित स्टेडियम के भीतर के तापमान और नमी को माप कर महसूस करने वाले तापमान का आकलन किया गया, और जहां तक संभव हो इसके प्रभाव को कम करने का प्रयास किया गया। अगले वर्ल्ड कप के आयोजक देशों, स्पेन और पुर्तगाल में भी हरेक वर्ष तापमान के रिकार्ड टूट रहे हैं, जाहिर है अगले वर्ल्ड कप में भी तापमान की समस्या बरकरार रहेगी। वर्ष 2034 का वर्ल्ड कप सऊदी अरब में आयोजित किया जाएगा, पर यह आयोजन सर्दियों के मौसम में होगा।

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राजनैतिक और आर्थिक लाभ ही लक्ष्य

दरअसल बड़े खेल आयोजनों का लक्ष्य खिलाड़ियों का हित नहीं बल्कि अधिक से अधिक मुनाफा कमाना है। अब तो इन आयोजनों का विशुद्ध राजनैतिक इस्तेमाल भी किया जाने लगा है। ऐसे में इन आयोजनों से ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन और खिलाड़ियों पर तापमान के प्रभाव जैसे विषय नेपथ्य में चले गए हैं। इनके राजनैतिक और आर्थिक लाभ ही सबसे महत्वपूर्ण विषय रह गए हैं। तापमान वृद्धि ने दुनिया में बहुत कुछ बदल दिया है, अब खेल आयोजनों में भी बदलाव करने की जरूरत है– पर पूंजीवादी व्यवस्था में ऐसे आसार नहीं हैं।

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