मृणाल पाण्डे का लेख: निशाने पर सरकारी नीतियों के आलोचक, संगीन आरोप लगा कर किया रहा जा गिरफ्तार

भारत का गणतंत्र अगर पिछले सात दशकों से कायम है तो इसलिए कि उसके कायम रहने में आज भी बहुसंख्यकों ही नहीं, अल्पसंख्यकों और हाशिये के अनेक समुदायों को भी अपनी निजी आकांक्षाओं और हित स्वार्थों के पूरे होने की संभावना नजर आती है।

फोटो: Getty Images
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मृणाल पाण्डे

भारत का गणतंत्र अगर पिछले सात दशकों से कायम है तो इसलिए कि उसके कायम रहने में आज भी बहुसंख्यकों ही नहीं, अल्पसंख्यकों और हाशिये के अनेक समुदायों को भी अपनी निजी आकांक्षाओं और हित स्वार्थों के पूरे होने की संभावना नजर आती है। हालिया पांच विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों की जीत से यह सचाई एक बार फिर पानी में तेल की तरह सतह पर तैरती नजर आई। अब साल के भीतर ही दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनाव दहलीज पर हैं। संभवत: इसी कारण हाल में संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने सार्वजनिक तौर से कहा कि भारत में रहने वाले सभी समुदायों का डीएनए एक ही है, इसलिए वे सब विशुद्ध भारतीय ठहरते हैं। गोहत्या के नाम पर मॉब लिंचिंग की भी उन्होंने कड़ी निंदा की।

पर मीडिया जब तक संघ के कई वरिष्ठ लोगों के कथनों से उलट उनके इस वक्तव्य का असली मोल या वजह गिन पाता, एक दु:खद खबर आई है। आठ महीने से जेल में बंद सांघातिक पारकिंसन और कई रोगों से पीड़ित 84 बरस के जेसुइट पादरी स्टेन स्वामी का एक हस्पताल में देहांत हो गया। जब उनकी जमानत की अर्जी बार-बार खारिज की जा रही थी, उनके कांपते हाथों को पानी के गिलास से पानी पी सकने के लिए प्लास्टिक की नली देने की भी मनाही हो गई थी, तभी उन्होंने आशंका जता दी थी कि उनका अंत बंदी के रूप में और जल्द ही होने जा रहा है। स्टेन को 16 अन्य लोगों के साथ यूएपीए कानून के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी द्वारा नक्सली दस्तों से मिलकर बड़े नेतृत्व के खिलाफ साजिश करने का संगीन आरोप लगा कर गिरफ्तार किया गया था। जिस देश में वामपंथ के लोक निर्वाचित प्रतिनिधियों और अल्पसंख्य समुदायों के जनता के बीच जाने और घुलने-मिलने को शक की नजर से देखा जाता हो, वहां देसी नक्सलवाद के खिलाफ मुहिम युद्ध की तरह चलाई जाती है। भीमा कोरेगांव की घटना के संदर्भ में गिरफ्तार सभी जनसेवी तब से बिना जमानत पाए जेल में बंद हैं। जब भी उनकी जमानत की सुनवाई हो, सुरक्षा संस्थाएं उसे रुकवा देती हैं। गौरतलब है कि इस दौरान जेल के बाहर भी आम जनता कोविड की मार से बुरी तरह त्रस्त है। पर इसका प्रमाण नहीं है कि ठसाठस भरी जेलों में बंदियों के लिए सोशल दूरी, हाथ धोना या चिकित्सा उपकरण तुरत प्रबंध मुहैया कराए गए। पारकिंसन रोग से बेहद अशक्त डॉ. स्टेन स्वामी की मौत की यह उपेक्षा भी वजह बनी। जब तक अदालती आदेश के तहत उनको निजी हस्पताल में भर्ती कराया गया, उनकी हालत बेहद बिगड़ चुकी थी। अलबत्ता अदालत में 5 हजार पन्नों की एक याचिका दाखिल कर उनकी गिरफ्तारी को जायज ठहराया गया। आज जब देश का मुख्य धारा का मीडिया बड़ी हद तक इन बातों पर खामोश है, विदेशी मीडिया और सोशल मीडिया में स्टेन स्वामी की मौत पर धाराप्रवाह चर्चा हो रही है। इस क्रम में अमेरिका तथा यूरोप का मुख्य धारा मीडिया आगे है जो राफेल मामले में फ्रांसीसी अदालत की भारतीय तथा तत्कालीन फ्रांसीसी नेतृत्व की मिलीभगत के आरोपों की सुनवाई कवर कर रहा है और ब्राजील की अदालत द्वारा बोल्सानेरो सरकार तथा भारत सरकार के बीच वैक्सीन की खरीद-फरोख्त पर सख्त टिप्पणियां भी। और ग्लोबल संस्था रिपोर्ट र्ससां (विदाउट) बॉर्डर्स ने तो सीधे भारत के शीर्ष नेता पर दुर्भावना वश मुख्यधारा मीडिया में सरकारी नीतियों के आलोचकों को निशाना बनाने का आरोप लगा रखा है।


विडंबना देखिए कि जब इतने शेर गरज रहे हैं, भारत सरकार के भक्त मीडिया का एक हिंदी उत्पाद मेमने की मासूमियत से कहता है कि भारत सरकार की बेवजह निंदा कर रहे औपनिवेशी मानसिकता वाले विदेशी मीडिया को धंधई उसूलों और निष्पक्ष रिपोर्टिंग सीखनी होगी। अगर माहौल इतना दु:खद न होता तो इस पर शायद हंसा जा सकता था।

इस बीच दलों के भीतरी झगड़े, शासकीय घोटाले और संदिग्ध लोगों से सत्ता के गोपनीय संबंधों की सप्रमाण जानकारी देने वाले मीडिया की भी कानूनी फजीहत जारी है। इस बाबत खबरें देने वाले पत्रकारों की साख और भरोसेमंदी पर भी समाज सेवियों की ही तरह नए कानूनों के तहत लगातार गिरफ्तारी का साया पड़ रहा है। मीडिया का बस वही अंश सुखी है जो लगातार ठकुर सुहाती करे, और कभी- कभार फेक खबरें तकनीकी कौशल से दूर-दूर तक फैलाने में खुफिया संस्थाओं की मदद भी। जो पत्रकार सूचनाधिकार या जनहित याचिका डालकर घोटालों की तफतीश करते हैं, उनपर जटिल नौकरशाही नियामित कानूनों का शिकंजा कस जाता है। और जब मामला अदालती बन गया तो सीधा मतलब है उस विषय पर लिखने-बोलने पर फैसला आने तक पूर्ण रोक। स्टेन स्वामी की गंभीर बीमारी के मद्देनजर बार-बार उनकी जमानत की अर्जी दी गई। पर सरकारी सुरक्षा एजेंसियों ने विरोध कर उसे तब तक रुकवाया जब तक उनकी अंतिम पेशी में उनके वकील ने आकर माननीय अदालत को खबर न दे दी, कि इंसानी अदालत का फैसला अब बेमानी है। आरोपी को मौत ने सदा के लिए मुक्त कर दिया है। इसीलिए मीडिया की सुरक्षा के लिहाज से भारत पिछले वर्षों में कई सीढ़ी नीचे लुढ़क कर 180 देशों की सूची में आज 142वीं पायदान पर है। सेंसरशिप बढ़ी है, इससे भी कोई इनकार नहीं करेगा। यहां तक कि फिल्म सर्टिफिकेशन बोर्ड भी सरकारी अंकुश लगा कर अंतिम फैसले का हक नौकरशाही को दे दिया गया है। इससे कई अन्य राष्ट्रीय नियामक संस्थाओं की तरह काफी सूझ- बूझ और जमीनी सचाई को समझ कर बनी यह संस्थाभी लगभग निष्प्रभावी बन गई है। डिजिटल मीडिया का हाल यह, कि भारत उन देशों में शामिल किया गया है जहां सबसे ज्यादा बार इंटरनेट सेवा रोकी गई और छोटे ब्लॉग्स का लोकप्रिय मंच बनकर उभरे ट्विटर की भी सरकार मुश्कें बांधने को तत्पर दिख रही है।

यहां पर एक बार हमारे मीडिया की मालिकी पर भी कहना जरूरी है। हमारे अखबार, खासकर भाषाई अखबार कमल पुष्प की तरह ताल में स्वत: नहीं फूलते। मालिक तथा जनता के बीच निरंतर ठोका पीटी और मालिकों के औद्योगिक हित स्वार्थों एवं रुचियों के दबाव से ही अपना आकार पाते और पनपते आए हैं। इसमें सोशल मीडिया का दुतरफा नक्कारखाना भी एक बड़ा कारक तत्व बन गया है। बेशक यह मीडिया मूलत: मूर्ति भंजक है और इसका इस्तेमाल करने वाला अक्सर युवा होता है जो बड़े-से-बड़े गुब्बारे को भी पिन चुभो कर फिस्स करते हुए खुद को महत्वपूर्ण समझता है। संपादकीय कर्मियों पर एक तरफ तो दबाव है कि वे मालिकान के हितों की सरकारी हिफाजती बनाए रखने के पक्ष में चौकस रहें, दूसरी तरफ कम उम्र में बनते जा रहे नए नकोर पाठकों के लिए हाजिर जवाब, शाब्दिक चौके-छक्के लगाने, और अहेतुक हठीली स्थापनाओं की सुर्खियां भी दें। इसमें आज के व्यवस्था के कर्णधारों का सेंस ऑफ ह्यूमर, यानी परिहास रसिकता में हाथ तनिक तंग होना आड़े आता है। एक जमाना था जब नेहरू कार्टूनिस्ट शंकर को लिखते थे, तुम किसी को न बख्शना, मुझको भी नहीं। आज कुछ कार्टूनिस्टों पर देशद्रोह की धारा तक के अंतर्गत चार्ज तय हो रहे हैं।


शक के इस माहौल में हमको बहुत पहले पढ़ी एक रूसी नीतिकथा याद आ रही है। ठिठुरनभरी शाम को घर लौट रहे एक दयालु किसान ने देखा कि पाले से अकड़ा एक कबूतर जमीन पर तड़प रहा है। किसान ने उसे उठा कर कोट में लपेटा, सहला कर उसकी रुकती सांसों को लौटाया। कबूतर ने आंखें खोल दीं| तभी वहां से गायों का एक रेवड़ गुजरा जिसमें से एक गाय ने तनिक रुक कर किसान के आगे गोबर का बड़ा ढेर गिरा दिया। किसान ने कबूतर को गर्मागर्म गोबर की ढेरी में रोप कर राहत की सांस ली कि अब सुबह धूप निकलने तक बेचारा पक्षी बचा रहेगा। किसान तो चला गया, पर गोबर की गर्मी से त्राण महसूस करते कबूतर ने ज़ोरों से खूब गुटर गूं करनी शुरू कर दी। उसकी जोरदार चहक सुनकर पास से गुजरता दूसरा किसान रुका और कबूतर को खाने के लिए उठा ले गया।

कहानी तीन नसीहतें देती है। एक, तुमको गोबर में डालने वाला हर जीव तुम्हारा दुश्मन नहीं होता। दो, गोबर से बाहर निकालने वाला हर जीव तुम्हारा दोस्त भी नहीं होता। और तीन, गोबर में आकंठ डूबा बंदा भी ज्यादा चहकने से बाज आए।

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Published: 11 Jul 2021, 8:09 PM