पुणे से स्त्रीगामी प्रतिरोध का आगाज सुखद, यह स्त्रीवादिता का शंखनाद

मोबाईल पर सीधा प्रसारण सुनती गांव की भाभी-बहन-बेटी ने कहा कि जो हम अपने मायके में भी बोलते वक्त हिचकिचाते हैं, वह पुणे में बोला जा रहा है। हम अब जानते हैं कि कोई हमें सुनेगा।

पुणे से स्त्रीगामी प्रतिरोध का आगाज सुखद, यह स्त्रीवादिता का शंखनाद
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पुणे में स्त्रीगामी प्रतिरोध का आगाज हुआ। उन छात्राओं की अनुगूंज अब भी वातावरण में छाई हुई है। इस सुखद शुरुआत ने बहुत सारे ख्यालों को पुनर्जीवित किया।

पुणे वह भूमि है जहां स्त्री मुक्ति का पहला बिगुल बजा। सावित्री बाई फुले और फातिमा बीबी ने महात्मा ज्योतिबा फुले की प्रेरणा से स्त्री शिक्षा की नींव रखी। हम अक्सर रानी लक्ष्मीबाई को याद करते हैं। पर उनसे काफी पहले शिक्षा स्वराज के लिए सावित्री बाई और फातिमा बीबी ने कमर कसी। अलबत्ता, तलवार सत्तावन में चमकी। कलम उसके बहुत पहले चमकने लगी। उसी पुणे में इन कलम स्वराजियों पर गोबर फेंका गया था। छात्राओं की गूंज के नेपथ्य में मुस्कुराती सावित्री और फातिमा की खनक सुनाई पड़ रही है। वे जरूर तृप्त होंगी कि उनकी लड़ाई एक महत्वपूर्ण पड़ाव तक पहुंची है।

यह भी छोटी बात नहीं कि इस देश के दो पुरुष जिन्हें महात्मा कहकर नवाजा गया, स्त्रीगामी थे। वह स्त्रीगामिता उनकी राजनीति थी। केवल वैयक्तिक अभ्यास नहीं। उन्होंने यह तय किया कि राजनीति में आने वाली स्त्री को मर्द नहीं होना पड़ेगा। राजनीति को चाहिए कि वह स्त्रीगामी बनाई जाए, क्योंकि हर निजता राजनीतिक है।

सामंतशाही में स्त्री सत्ता में केवल तब प्रवेश पाती थी जब दरबारी राजनीति उन्हें इसकी इजाजत देती थी। वह भी पितृसत्ता के वाहक के बतौर। हम आज भी देखते हैं कि स्त्री को अपनी क्षमता साबित करनी पड़ती है। उसे जबरदस्ती सुपर वुमन होना पड़ता है। राजनीति ही नहीं, हर कार्यक्षेत्र का स्वरूप इतना मर्दाना होता है कि वे कृतिम मर्दपन ओढ़ने को मजबूर हैं।

उसके लिए मानदंड भी पुरुष प्रधान समाज बनाता है। “अच्छी” स्त्री कहलाने के लिए पुरुषों की तुलना में कुछ अधिक करना पड़ता है। वह गलती नहीं कर सकती। गलती को उसकी कमजोरी के रूप में आंका जाता है।

ऐसे में महात्मा ज्योतिबा फुले ने स्त्री शिक्षा की मुखर पहल से समाज की रचना को बदला। बापू ने पूरी राजनीति को स्त्रीगामी किया। कपड़ा बुनना, सीना, पिरोना, कातना महिला का काम माना जाता था। हर काम पर लैंगिक पहचान चस्पा किया गया है। ऐसे में चरखे ने सूत कताई को प्रतिरोध का अभ्यास बनाया। यह सिर्फ अंग्रेजी अधिनायकत्व को चुनौती नहीं थी। पितृसत्ता को भी चुनौती थी।


बापू ने अपने जीवन को स्त्रीवादी ढंग से जिया। वर्णाधारित संरचना में स्त्री कभी द्विज नहीं होती। वह अपने बच्चों का मैला साफ करती है। साबरमती और सेवाग्राम में यह सबको करना अनिवार्य किया गया। स्वयं भेद सहन करता वर्ग भी दूसरों के प्रति होते भेद को देखने से चूक जाता है। प्रभुत्व संपन्न वर्ग की महिलाएं मैला साफ करते समुदाय को हेय मानती हैं। यह भेद पितृसत्ता से विलग नहीं है। बा को इसका एहसास बापू ने कराया। मगर बा ने ही उनको सत्याग्रह का सबक सिखाया। नियंत्रण या कंट्रोल से कभी बदलाव नहीं हो सकता। वह जुड़ाव से होता है। बापू के भीतर छुपे पुरुषोचित कहे जाते अहम, पितृसत्ता को बा ने ही नेस्तनाबूद किया। बापू खुद मानते थे कि कस्तूरबा ने उनको सत्याग्रह की राह दिखाई। सत्याग्रह में नियंत्रण के लिए कोई जगह नहीं होती।

बापू की इसी स्त्रीगामी पहल ने लाखों महिलाओं को सत्याग्रह से जुड़ने का मौका दिया। जब हर घर में इस्तेमाल होते नमक से साम्राज्यवादी सत्ता की चूलें हिलीं, तब वह स्त्रीवादिता का शंखनाद भी था।

लगभग आधी शताब्दी के बाद बीते सप्ताह पुणे में एक मुख्यधारा के राजनीतिज्ञ ने पुनः राजनीति के स्त्रीकरण का उद्घोष किया। वैसे भारत जोड़ो यात्रा में जिस तरह स्त्रियों के प्रति सम्मान-संवेदना दिखाई दी, वह विरले ही किसी राजनेता में दिखाई पड़ती है। वरना किस राजनीतिज्ञ के पास स्त्री की वेदना को साझा करने के लिए कांधा है। छप्पन इंच के सीने में इतनी जगह नहीं कि वह सुध ले सके।

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भारतीय राजनीति में स्त्रीगामी व्यक्तित्व का आगमन सुखद है। विगत में भी महिला सशक्तिकरण के कई प्रयास हुए हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री ने परंपरागत सोच को खुली चुनौती दी और अनेक पुरुष प्रधान संस्थाओं को लैंगिक भेद से मुक्त किया। पूरी जिम्मेदारी से कहा जा सकता है कि स्त्रियां उनके इर्दगिर्द काम करते हुए, संवाद करते हुए बेहद सुरक्षित महसूस करती होंगी।

बीमार मानसिकता, कुंठित सोच इसका जो मतलब निकाले। देश के पहले प्रधानमंत्री का अपनी बेटी के साथ किया गया ममतामय पत्राचार सार्वजनिक है। उन्हीं के कार्यकाल में स्त्री को संपत्ति का हक, हिन्दू स्त्री को तलाक और पुनर्विवाह के हक को परिभाषित करता हिन्दू कोड बिल पारित हुआ, जो संविधान निर्माता बाबा साहेब की देन थी। वह स्त्री नेतृत्व ही था जो महिला न्याय का गौरवशाली दशक साबित हुआ। उसी दशक में अनेक स्त्रीगामी आंदोलन तैयार हुए। यह इसलिए भी संभव हुआ कि व्यवस्था उसके अनुकूल थी।

मथुरा नाम की नाबालिग आदिवासी लड़की के साथ पुलिस द्वारा यौन शोषण के बाद उठाई गई आवाज के परिणामस्वरूप बलात्कार कानून का पुनः संशोधन हुआ। दहेज विरोधी कानून, समान काम पर समान वेतन आदि अनेक विधायी अधिकार स्थापित हुए। स्थानीय निकाय में एक तिहाई महिलाओं को मौका देने की पेशकश भी संवेदनशील राजनीति की देन थी। राजनीति के स्त्रीकरण का पुख्ता सबूत।

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नब्बे के दशक में ही कार्यस्थल पर महिला सुरक्षा की लड़ाई शुरू हुई। भंवरी देवी के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद विशाखा नाम की संस्था द्वारा लड़ी गई लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह मुनासिब हुआ। भंवरी देवी राजस्थान सरकार की बाल विवाह उन्मूलन कार्यक्रम से जुड़ी थीं और दबंग समाज ने बदले की कार्रवाई में उनका बलात्कार किया था। गोयाकि उस वक्त आज केन्द्र में सत्तारूढ़ दल के प्रादेशिक नेता बलात्कारियों का मंच लगाकर स्वागत कर रहे थे।

स्त्रीगामी राजनीति ने ही बाद में महिला स्वावलंबन को स्व-सहायता समूह के रूप में संस्थागत किया। महात्मा गांधी नरेगा महिला को गांव ही में रोजगार देने के बड़े उद्देश्य से जुड़ा। घरेलू हिंसा को पारिवारिक मामले के दायरे से बाहर निकाला गया। यह राजनीतिक कदम था। स्त्री पिट नहीं सकती। पिटे तो समाज और कानून आंखें नहीं फेर सकते।

यह विरासत पुणे में परिपूर्ण हुई। जब एक नेता ने अपने व्यक्तित्व और आभामंडल से स्त्री को मायके सा महसूस कराया। बेशक, वहां आधुनिक छात्राएं थीं। निडर, बेबाक आज़ाद अभिव्यक्ति थी। पर उस दिन घर में मोबाईल पर कार्यक्रम का सीधा प्रसारण सुनती गांव की भाभी-बहन-बेटी ने नम आंखों से कहा कि जो हम अपने मायके में भी बोलते वक्त हिचकिचाते हैं, वह सब यहां बोला जा रहा है। हम अब जानते हैं कि कोई हमें सुनेगा। बिना किसी पूर्वधारणा के तसल्ली देगा। उसके पास सुरक्षित छांव होगी।

प्रतिरोध में स्त्रीवादिता के कदमों की आहट पायल की खनखनाहट सी मधुर है। वह और पल्लवित होगी।

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