सरकार ही लेकर आई ये आर्थिक मंदी, कॉरपोरेट पर रहम, गांवों पर सितम का है नतीजा

सरकार समझ नहीं पा रही कि कॉरपोरेट टैक्स में कमी करने से अर्थव्यवस्था की सेहत नहीं सुधरने जा रही। मांग बढ़ाने के लिए सरकारी निवेश बढ़ाना होगा। यूपीए सरकार की तरह गांव के लोगों के हाथ में ज्यादा पैसे देने की जरूरत है, तभी मरणासन्न मांग में जान फूंकी जा सकेगी।

फोटोः सोशल मीडिया
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तथागत भट्टाचार्य

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में दावा किया कि 2025 तक देश की अर्थव्यवस्था को 5 खरब डॉलर के स्तर तक ले जाने के लिहाज से सब कुछ दुरुस्त है। उन्होंने कहा कि हमारी अर्थव्यवस्था थोड़ी सुस्त जरूर हो गई है, लेकिनअब भी अनुमान है कि इस साल इसकी विकास दर जी-20 देशों में सबसे ज्यादा रहेगी। अफसोस, वित्त मंत्री के दावे सच्चाई से कोसों दूर हैं। जमीनी हकीकत साफ कह रहे हैं कि हमारी अर्थव्यवस्था सुस्त नहीं पड़ी है, बल्कि यह मंदी की चपेट में है और इसकी जड़ में है सरकार की गलत नीतियां।

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इकोनॉमिक स्टडीज एंड प्लानिंग (सीईएसपी) के रिटायर्ड प्रोफेसर अरुण कुमार कहते हैं, “अगर आप अन्य देशों से मुकाबला करें तो मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही के दौरान 5 फीसदी की विकास दर वाकई संतोषजनक है, लेकिन इसके साथ ही हमें निवेश, खपत और मांग की भी बात करनी होगी। चिंता की बात यह है कि इन सारे मोर्चों के आंकड़े नकारात्मक हैं। बेरोजगारी रिकॉर्ड उच्च स्तर पर है। क्षमता उपयोगिता लगातार घट रही है। कारोबारी भरोसा चिंताजनक स्तर तक नीचे आ चुका है और यह निवेश के आंकड़ों में भी झलक रहा है। ऐसे में जीडीपी में कम से कम एक प्रतिशत अंक की गिरावट तो आ ही गई होगी।”

अरुण कुमार जो बातें कह रहे हैं, उसकी तस्दीक गांव और शहर, दोनों ही कर रहे हैं। खास तौर पर असंगठित क्षेत्र की हालत खस्ता है, जिसकी जीडीपी में भागीदारी लगभग 47 फीसदी है और देश के लगभग 93 फीसदी कामगार इसी क्षेत्र में आते हैं।

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के समय में शुरू मनरेगा का उद्देश्य देश के गांवों में रह रहे लोगों को एक सुरक्षा कवच देने का था। लेकिन मोदी सरकार के दौरान सब गड़बड़ है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अप्रकाशित आंकड़ों से हकीकत का अंदाजा होता है। बिजनेस स्टैंडर्ड ने जुलाई 2017 से जून 2018 के लिए एनएसओ द्वारा एकत्रित आंकड़ों पर एक खबर की है, जिसके मुताबिक इस दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोक्ता वस्तुओं पर खर्च में 8.8 फीसदी की गिरावट आई और शहरी खपत में महज 2 फीसदी का इजाफा हुआ।

एनएसओ की रिपोर्टों की ही बात करें तो पिछली बार वास्तविक खपत में गिरावट 1972-73 में दर्ज की गई थी जब दुनिया तेल के संकट से दो-चार हो रही थी। साल 2011-12 में भारतीयों का औसत खर्च 1,501 रुपये महीना था जबकि 2017-18 में यह गिरकर 1,446 रह गया। इससे एकदम साफ हो जाता है कि देश के लोगों, खास तौर पर गांवों में रहने वालों के पास खर्चने के लिए पहले जितने भी पैसे नहीं रहे। गांवों में रहने वाले लोग इसलिए भी मुश्किल हालात का सामना कर रहे हैं कि उन्हें मनरेगा के अंतर्गत न्यूनतम काम भी नहीं मिल पा रहा।

सीईएसपी में सहायक प्रोफेसर सुरजीत दास कहते हैं, “अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि पिछले वित्त वर्ष के दौरान औसतन एक ग्रामीण को 179 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से 51 दिन का ही काम मिला। हमें यह भीनहीं भूलना चाहिए कि मजदूरी की बाजार दर मनरेगा के अंतर्गत मिलने वाली मजदूरी से दोगुनी होती है। काबिले गौर है कि काम के अधिकार के तहत एक ग्रामीण को साल में कम से कम 100 दिन का काम मिलना चाहिए, यानी पिछले वित्त वर्ष के दौरान उन्हें 49 दिन काम नहीं मिला।”

यूपीए के समय में गांव हमारी अर्थव्यवस्था के धुरी रहे और आज जब यही क्षेत्र संकट में आ गया है तो इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर दिख रहा है। जेएनयू के सीईएसपी में सहायक प्रोफेसर हिमांशु कहते हैं, “जब तक सरकार हस्तेक्षप करके ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मोटी धनराशि खर्च नहीं करती, हालत बद से बदतर ही होती जाएगी। ऐसा नहीं कि ऐसा करना संभव नहीं, बात बस प्राथमिकता की है। कॉरपोरेट को 1.45 लाख करोड़ की कर रियायत देने की जगह अगर इसी पैसे को ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लगाया जाता तो इससे ग्रामीण मांग में इजाफा हो जाता और समूची अर्थव्यवस्था में जान आ जाती। अर्थव्यवस्था के धीमा पड़ने पर सबसे पहले कॉरपोरेट सेक्टर को पुचकारने का यह नजरिया बदलना होगा।”

वैसे भी यह एक स्थापित तथ्य है कि गांव के लोग अपनी आय के अनुपात में शहरी लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा खर्च करते हैं। इसलिए कॉरपोरेट सेक्टर के मुनाफे को बढ़ाकर घरेलू बाजार में जान नहीं फूंकी जा सकती। यह तो केवल और केवल खपत को बढ़ाकर ही किया जा सकता है और वह भी खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में।

नोटबंदी और जीएसटी के बाद एफएमसीजी और ऑटो क्षेत्रों में बिक्री में आई जबर्दस्त गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किलें खड़ी कर रही है। एमएसएमई इकाइयां मुख्यतः नकदी में लेन-देन करती हैं जिसके लिए वे टैक्स क्रेडिट नहीं ले सकतीं। इस तरह उन्हें कच्चे माल और अन्य आपूर्तियों के लिए कहीं ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। हिमांशु एक और चिंताजनक तथ्य की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, ‘शहरी मध्य वर्ग छंटनी, वेतन कटौती आदि के कारण जबर्दस्त दबाव महसूस कर रहा है। कुछ वर्ष पहले तक जहां उसकी बचत दर 22-23 फीसदी सालाना रहती थी, अब घटकर 15-16 फीसदी के स्तर तक आ चुकी है। साफ है, लोगों की बचत चुक रही है।’

जहां तक इस दलील कि बात है कि वित्तीय घाटे के संकट ने ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर और निवेश वाली परियोजनाओं पर खर्च करने से सरकार के हाथ बांध रखे हैं, यह बात भी हजम नहीं होती। आखिर वित्तीय घाटा होता क्या है? यह खर्च और राजस्व के अंतर को जीडीपी से भाग देने से निकलता है। और अध्ययन से यह बात साफ हो चुकी है कि सरकार अगर 1 रुपये का पूंजीगत व्यय करती है तो इससे कर राजस्व में 1.22 रुपये अतिरिक्त आते हैं। इसलिए व्यवहार की बात करें तो सरकार ग्रामीण बुनियादी ढांचे या पूंजीगत खर्चे पर जितना ज्यादा निवेश करेगी, इससे न केवल राजस्व में इजाफा होगा बल्कि जीडीपी भी बढ़ेगा और अंततः वित्तीय घाटा कम ही होगा।

अरुण कुमार कहते हैं, “असल में सरकार अपनी बातों पर अमल नहीं कर रही। इसने घोषणा की थी कि पांच साल में 100 लाख करोड़ पूंजीगत व्यय पर खर्च करेगी, यानी एक साल में 20 लाख करोड़। लेकिन इस साल इस मद में केवल 8.5 लाख करोड़ का आवंटन किया गया, यानी आधे से भी कम। जाहिर है कि 100 लाख करोड़ निवेश की बातें हवा-हवाई ही हैं। ठीक वैसी ही है जैसे किसानों की आय को 2022 तक दोगुना करने और 2024-25 तक देश की अर्थव्यवस्था को 5 खरब डॉलर के स्तर तक ले जाने की बात थी। इनमें से कोई भी वादा सच नहीं होने जा रहा और मुझे तो लगता है कि हालत और खराब ही होने जा रही है।”

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर मैत्रीश घटक कहते हैं, “सरकारी निवेश बढ़ता है तो इससे लोगों के हाथ में पैसे बढ़ेंगे और इसके कारण मांग बढ़ेगी। इन्फ्रास्ट्रक्चर में निवेश बढ़ाकर, मनरेगा का आवंटन बढ़ाकर और प्रधानमंत्री किसान योजना के दायरे का विस्तार कर इसमें गैर-किसानों को भी शामिल करके यह काम किया जा सकता है।”

इसी के साथ सुरजीत दास का मानना है कि मनरेगा का दायरा बढ़ाकर इसमें शहरी गरीबों को भी शामिल किया जाना चाहिए। वहीं, हिमांशु का मानना है कि मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी की दर को दूना बढ़ाकर 360 रुपया कर बाजार दर के बराबर कर दिया जाना चाहिए। वहीं, सुरजीत दास का कहना है कि हमें यह भी समझना चाहिए कि यह बाजार मजदूरी भी तो पांच साल पहले तय की गई थी, लिहाजा इसकी भी समीक्षा होनी चाहिए।

बहरहाल, सभी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मरणासन्न पड़ी मांग में जान फूंकने के लिए लोगों को न्यूनतम 100 दिन का काम सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लेकिन दिकक्त यह है कि सरकार की समझ में ही गड़बड़ी है। वह जिस तरह अर्थव्यवस्था की गड़बड़ी से निपट रही है, उससे ऐसा लगता है कि वह टूटी हड्डी का इलाज बुखार की गोलियों से करना चाह रही है।

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