आकार पटेल / यह कैसा 'वसुधैव कुटुम्बकम्'

फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ नरसंहार और रंगभेद के बावजूद, सिर्फ़ एक देश ने अपनी मर्ज़ी और पूरे जोश के साथ इज़राइल का साथ दिया है, और वह देश भारत है।

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'लोकतंत्र की जननी' (भारत) संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक अस्थायी चुनी हुई सीट के लिए दावेदारी कर रही है। इसे 'अस्थायी' इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका कार्यकाल सिर्फ दो साल का होता है, और 'चुनी हुई' इसलिए क्योंकि पांच स्थायी सदस्यों के साथ बैठने की इच्छा रखने वाले 188 सदस्य देशों के बीच 10 सीटें बांटी जाती हैं। इन 10 सीटों के साथ कोई वीटो पावर नहीं मिलती है; इसलिए, अगर चीन, अमेरिका, फ्रांस, रूस या यूके में से कोई भी देश किसी प्रस्ताव के खिलाफ हो, तो बाकी 14 देशों के वोट चाहे जो भी हों, वह प्रस्ताव खारिज हो जाता है।

लोकतंत्र की जननी पहले भी आठ बार चुनी जा चुकी है और पिछली बार 2021-22 में चुनी गई थीं। मुझे याद नहीं कि तब हमने क्या हासिल किया था और पक्का नहीं पता कि हम फिर से क्यों चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन तारीख से एक संकेत मिलता है। यह कार्यकाल 2028 और 2029 के लिए है, जिसका मतलब है कि अगले आम चुनाव के ठीक बीच में हमें होर्डिंग लगाने और यह दिखाने का मौका मिलेगा कि हम दुनिया के लिए कितने अहम हैं। कुछ साल पहले की जी-20 शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता याद है न?

अगले साल जून में संयुक्त राष्ट्र में चुनाव होने हैं और एशिया-पैसिफिक ग्रुप (एशिया-प्रशांत समूह) में एक और उम्मीदवार है जिसे हमें हराना है (या जिससे नाम वापस करवाना है), और वह है ताजिकिस्तान। उसे 'ऑर्गनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस' (ओआईसी) के 56 वोटिंग सदस्यों का समर्थन हासिल है और एक ऐसे देश के तौर पर उसे सहानुभूति वाले वोट भी मिल सकते हैं जो अब तक एक बार भी नहीं चुना गया है।

चुनाव जीतने के लिए उम्मीदवार देश को कुल 193 सदस्य देशों में से दो तिहाई देशों का समर्थन चाहिए, यानी अगर सभी देश मौजूद हों और वोट दें, तो 129 वोटों की ज़रूरत होगी। गणित देखें तो ओआईसी के 56 वोटों में से एक भी वोट न मिलने पर भी हम जीत सकते हैं, लेकिन कहना मुश्किल है। हमें ताजिकिस्तान को पीछे हटने के लिए मनाने या अपने प्लैटफ़ॉर्म की अपील से मुस्लिम गुट को तोड़ने के लिए कोई न कोई जुगाड़ करना होगा।

तो हमारा मंच क्या है? जयशंकर के एक भाषण के जरिए इसकी घोषणा की गई। नए भारत में अधिकांश चीजों की तरह, संक्षिप्त नाम सबसे महत्वपूर्ण है। इस बार हमने  ‘शांति’ (SHANTI) नाम दिया है, जिसका विस्तार सिक्यूरिंग एडवांसमेंट थ्रू नॉर्मस यानी 'मानदंडों, विश्वास और सत्यनिष्ठा के माध्यम से समग्र उन्नति सुनिश्चित करना' है। सुनने में यह बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे हमारा चुनाव आयोग या दिल्ली पुलिस कुछ कहती है।

शांति (SHANTI) के छह तत्व हैं। पहला यह दावा है कि भारत 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ है। कैसे? कहां? यह तो नहीं बताया गया, लेकिन मान लेते हैं कि यह सच है। दूसरा है 'सुधारे गए मल्टीलेटरलिज़्म' (बहुपक्षवाद) की बात, जो असल में यह कहने का एक फैंसी तरीका है कि हमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट दी जाए।


तीसरा है शांति बनाए रखने का काम (पीसकीपिंग)। शायद पाठकों को पता न हो कि संयुक्त राष्ट्र की पीसकीपिंग फ़ोर्स में कुछ ही देशों का दबदबा है। इसमें सबसे बड़ा योगदान नेपाल का है, और उसके बाद भारत, बांग्लादेश, रवांडा और पाकिस्तान का नंबर आता है। लेकिन जैसाकि जयशंकर कहते हैं कि भारत पीसकीपिंग को 'भविष्य के लिए तैयार' बनाएगा।

"इसका मतलब है बेहतर ढंग से तैयार होना, टेक्नोलॉजी से लैस होना, असल में ज़रूरी काम सौंपे जाना और मुख्य लक्ष्यों पर ध्यान देना।" शायद इसका मतलब यह है कि हम आधार कार्ड जारी करेंगे।

चौथा है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), जहां हमारी भूमिका साफ़ नहीं है क्योंकि एआई क्षमताएं सिर्फ़ अमेरिका और चीन के पास ही हैं। जयशंकर बताते हैं कि यहां एआई या आई का तात्पर्य एक और एक्रोनिम (संक्षिप्त नाम) है। वे कहते हैं, "भारत ने एआई का एक ऐसा विज़न पेश किया है जो इंसानों पर केंद्रित है और जो अपनी क्षमताओं के साथ-साथ भारत की परंपराओं पर भी आधारित है। इसके लिए हमारा शब्द है 'MANAV' (मानव), यानी मॉरल एंड एथिकल सिस्टम्स, अकाउंटेबिल गवर्नेंस, नेशनल सोवरीनिटी, एक्सेसेबिल एंड इन्क्लूसिव यानी जो इन चीज़ों का एक्रोनिम है: नैतिक और सदाचारी सिस्टम, जवाबदेह गवर्नेंस, राष्ट्रीय संप्रभुता, सुलभ और समावेशी, और वैध और जायज़ सिस्टम।"

पांचवीं बात समुद्री व्यवस्था की है, यानी ईरान को होर्मुज की नाकेबंदी बंद कर देनी चाहिए। छठी बात आतंकवाद की है, जो हमारा सबसे पसंदीदा विषय है। जयशंकर कहते हैं, "हमारा संकल्प आतंकवाद को मिलने वाली फंडिंग को रोकने पर ध्यान केंद्रित करना है।" यह सच नहीं है। भारत पर अपनी सितंबर 2024 की 'म्यूचुअल इवैल्यूएशन रिपोर्ट' में, फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने भारत को केवल "आंशिक रूप से अनुपालन करने वाला" माना, क्योंकि सरकार को एनजीओ पसंद नहीं हैं—जिसके बारे में मैंने पहले भी यहां लिखा है।

हमारा प्लेटफ़ॉर्म इन छह चीज़ों पर आधारित है। हो सकता है कि दुनिया हमारे इस शानदार घोषणापत्र को हमें वोट देने के लिए पर्याप्त माने। लेकिन हमें अपने समय के दो बड़े, आपस में जुड़े हुए और वैश्विक मुद्दों पर भी ध्यान देना होगा: ईरान में चल रहा गैर-कानूनी युद्ध, जिसका असर सब पर पड़ रहा है, और फ़िलिस्तीन में हो रहा नरसंहार।

पहली बात पर हमारे पास कहने के लिए कुछ नहीं है क्योंकि हम ट्रंप के खिलाफ़ बोलने से डरते हैं और हमने युद्ध शुरू होने से कुछ घंटे पहले ही इज़राइल से एक मेडल स्वीकार किया था। दूसरी बात पर, यह ज़रूरी समझते हुए कि इसका ज़िक्र किया जाए, जयशंकर ने अपने भाषण में कहा: "हमने कल ही ब्रुसेल्स में फ़िलिस्तीन डोनर ग्रुप की बैठक में फ़िलिस्तीन के लिए एक स्पेशलिटी हॉस्पिटल, कृत्रिम अंग लगाने का केंद्र और एक वोकेशनल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट बनाने का अतिरिक्त वादा किया है।"


लेकिन निस्संदेह, फ़िलिस्तीन के मामले में हमारा असली रिकॉर्ड किसी से छिपा नहीं हैं।

गाज़ा पर इज़राइल की बमबारी रोकने की मांग करने वाली वोटिंग में भारत शामिल नहीं हुआ। फ़िलिस्तीनियों के ख़िलाफ़ नरसंहार और रंगभेद के बावजूद, सिर्फ़ एक देश ने अपनी मर्ज़ी और पूरे जोश के साथ इज़राइल का साथ दिया है, और वह देश भारत है। जर्मनी ऐसा ऐतिहासिक अपराध-बोध के कारण करता है, और अमेरिका इज़राइल लॉबी की वजह से। सिर्फ़ भारत ने ही यह तय किया है कि वह फ़िलिस्तीनियों से इतनी नफ़रत करता है कि इज़राइल से प्यार करने लगा है।

जैसा कि मेरे संगठन 'एमनेस्टी इंटरनेशनल' ने पिछले हफ़्ते बताया, भारत इज़राइल को हथियार भेज रहा है, जिनमें वॉरहेड और दूसरे ऐसे हथियार शामिल हैं जिनका इस्तेमाल फ़िलिस्तीनी बच्चों के ख़िलाफ़ किया जाता है। 'लोकतंत्र की जननी' ने इज़राइल को वे बम बेचे जिनसे गाज़ा के बच्चे-बच्चियों के हाथ-पैर कट गए, और अब वही 'जननी' भविष्य में उन्हें कृत्रिम अंग देने का वादा कर रही है।

एमनेस्टी की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए सरकार ने कहा: "भारत के पास रणनीतिक व्यापार नियंत्रण के लिए एक मज़बूत कानूनी और नियामक ढांचा है और वह दोहरे इस्तेमाल वाली वस्तुओं और तकनीकों का निर्यात विभिन्न देशों को अपने राष्ट्रीय कानूनों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप करता है।" इसका मतलब है कि हम बम भेजना जारी रखेंगे।

इसलिए, दुनिया के सभी देशों से गुज़ारिश है कि वे 'लोकतंत्र की जननी' के लिए वोट करें, क्योंकि जैसा कि जयशंकर ने अपने संबोधन में कहा, "भारत 'वसुधैव कुटुंबकम' की सोच को अपनाता है; हम सिर्फ़ उपदेश नहीं देते, बल्कि इसे अमल में भी लाते हैं।"

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