सिनेमा

सआदत हसन मंटो की याद को फिर से जिंदा करने के लिए बनाई ‘मंटो’: नंदिता दास 

फिल्मकार नंदिता दास ने कहा कि घुमक्कड़ लेखक सआदत हसन मंटो के विचार 70 साल बाद आज भी प्रसांगिक हैं। वास्तव में सादत हसन मंटो अगर यूरोप में पैदा हुए होते, तो अब तक उन पर कई फिल्में बन चुकीं होतीं।

फोटो: सोशल मीडिया 
फोटो: सोशल मीडिया  फिल्मकार नंदिता दास

घुमक्कड़ लेखक और रचनात्मक बागी सआदत हसन मंटो के जीवन पर भारतीय फिल्मकार नंदिता दास द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अवधारणा के आधार पर बनाई गई फिल्म ‘मंटो’ ने मौजूदा समय के हिसाब से जैकपॉट मारा है। इसमें ऐसे ज्वलंत मुद्दे को उठाया गया है जो न सिर्फ भारत बल्कि विश्व भर में प्रसांगिक है।

नंदिता दास का कहना है कि फिल्म बनाने का लक्ष्य हर व्यक्ति में मंटो को पुनर्जीवित कर उसे सच्चा और साहसी बनाना है। मंटो ने उनकी साहित्यिक रचनाओं में अश्लीलता होने के बचाव में कई अदालतों में यह कहा था, “ये जरूरी है कि जमाने की करवटों के साथ, अदब भी करवट बदले।”

‘टोबाटेक सिंह’, ‘खोल दो’, ‘ठंडा गोश्त’ जैसी लघुकथाओं में उपमहाद्वीप के इतिहास के इस अशांत समय की क्रूर और असहनीय सच्चाइयों को पाठकों के चेहरे पर तमाचे की तरह पेश किया गया है। मंटो के काम को आज तक समय की सच्चाई बयां करने वाला बताया गया है। उनके काम में कथा, फिल्मी पटकथा, निबंध और रेडियो नाटक शामिल हैं।

नंदिता दास की फिल्म ‘मंटो’ को हालिया सप्ताहों में ‘कान’ में और ‘सिडनी’ में शानदार प्रतिक्रिया मिली है। फिल्म सितंबर में भारत में रिलीज होने से पहले फिल्मोत्सव का परिक्रमा कर रही है।

उन्होंने कहा, “मैं अपने आस-पास हो रही घटनाओं पर प्रतिक्रिया देना चाहती थी इसीलिए मैंने यह फिल्म बनाई। यह सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। वर्तमान में हमें वर्ग, धर्म, त्वचा का रंग, लिंग और भाषा के नाम पर बांटने के लिए राजनीति खेली जा रही है। मंटो का मानववाद उस सबसे आगे है।”

सिडनी फिल्मोत्सव से इतर उन्होंने कहा, “इसी लिए मंटो के विचार 70 साल बाद आज भी प्रसांगिक हैं। वास्तव में सआदत हसन मंटो अगर यूरोप में पैदा हुए होते, तो अब तक उन पर कई फिल्में बन चुकीं होतीं। आप यह भी कह सकते हैं कि हम सब में मंटो को जगाने के उद्देश्य से फिल्म बनाई गई है।”

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मंटो का कथन जो नंदिता दास के पसंदीदा कथनों में से एक है, “मैं उस समाज की चोला क्या उतारूंगा जो पहले से ही नंगी है। उसे कपड़े पहनाना मेरा काम नहीं। मेरा काम है कि एक सफेद चाक से काली तख्त पे लिखूं ताकि कालापन और भी नुमायां हो जाए।”

फिल्म महोत्सवों में अच्छी शुरुआत मिलने के बाद फिल्म की यात्रा टोरंटो, बुसान और संभवत: मेलबर्न में भी जारी रहेगी।

नंदिता दास ने कहा, “फिल्म की पृष्ठभूमि भारत और पाकिस्तान पर आधारित है लेकिन कहानी वैश्विक है। यद्यपि एक पीरियड फिल्म होने के बावजूद यह एक आधुनिक कहानी है।”

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