जावेद अख्तर और अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंगमैन’ दौर तो याद ही होगा। फिर हमारे पास स्लम ‘डॉग मिलियनेयर’ भी है जिसमें धारावी का एक लड़का करोड़ों रुपये जीत जाता है। एंग्री यंग मैन के दौर में जहां गरीबी और उत्पीड़न की फ्रस्ट्रेशन नौजवान नायक को एक अपराधी बना देती है, वहीं ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ में यही गरीब और असहाय नौजवान अपने अनुभव और व्यवहारिकता को सफलता की कुंजी की तरह इस्तेमाल करता है।
लेकिन ‘गली बॉय’ का मुराद आज का युवा है, जो अपनी मुश्किलों, गरीबी और संघर्ष के बीच अपने ख्वाबों की राह चुनता है और सफल होता है। इसी मायने में यह फिल्म प्रभावित करती है। जोया इस तरह के विषय चुनती रही हैं जिसमें एक शख्स अपनी जिंदगी में क्या करना चाहता है, उसके क्या ख्वाब हैं- इनका जिक्र होता है और इन्ही पर फोकस भी।
फिल्म ‘गली बॉय’ एक गरीब नौजवान की कहानी है, जो अपने हालात, माता-पिता की छोटी-छोटी इच्छाओं से ऊपर उठकर कुछ अलग करने और हासिल करने का ख्वाब देखता है। धीरे-धीरे वह एक अलग तरह की कविता और संगीत में अपने दिल की बात कहने की अपनी काबिलियत को एक्सप्लोर करता है और तमाम लोगों के हतोत्साहित करने के बावजूद सफलता हासिल करता है।
अच्छी बात ये है कि फिल्म में सिर्फ हीरो पर ही नहीं अन्य किरदारों पर भी फोकस किया गया है, मसलन मुराद की गर्लफ्रेंड (आलिया भट्ट), मुराद का मेंटर और गाइड (सिद्धांत चतुर्वेदी) अपने आप में दमदार किरदार हैं और अपनी अलग छाप छोड़ जाते हैं।
हिंदी फिल्म जगत में गरीब और हाशिये पर खड़े नायकों पर केंद्रित कई फिल्में आई हैं। एंग्री यंग मैन की इमेज लिए 70 और 80 के दशक के हीरो तो सभी समाज के ‘अंडरडॉग’ को ही प्रतिबिंबित करते थे, लेकिन वे सभी हीरो ज्यादातर समाज से बदला लेने के जज्बे से प्रेरित हो अपराध से जुड़ते थे। समाज में सफलता, ताकत और पैसा पाने का यही आसान तरीका था।
उसके बाद संगीत और डांस को केंद्र में रख कर ‘आशिकी’ ‘एबीसीडी’ जैसी फिल्में भी आईं, जो सफल तो हुईं, लेकिन जिस तरह के किरदार और संवाद जोया अख्तर की ‘गलीबॉय’ पेश करती है वे इन फिल्मों से कहीं बेहतर हैं।
ये फिल्म हमारे समाज के वंचित और ‘अंडर डॉग’ की एक अलग और पॉजिटिव छवि पेश करती है। अच्छी बात ये भी है कि इसकी कहानी असल रैप आर्टिस्ट ‘डीवाइन’ और ‘नेजी’ की जिंदगी से प्रेरित है। इसलिए फिल्म यथार्थ और वास्तविकता का फिल्मी और सपनीली दुनिया के साथ एक खूबसूरत संतुलन बैठाती है।
‘गलीबॉय’ के रैप तो पहले ही काफी लोकप्रिय हो चुके हैं और ये एक मिसाल है कि किस तरह लैटेस्ट और फैशनेबल संगीत में भी अच्छे गीत लिखे जा सकते हैं। उम्मीद है कि ‘दिल चाहता है’ की तरह ही ‘गली बॉय’ आज के युवाओं की प्रिय फिल्म होगी और इसके गाने तो नौजवानों का नया ‘एंथम’ होने की तरफ बढ़ ही रहे हैं। कुल मिलाकर ‘गलीबॉय’ एक अच्छी उम्मीद भरी फिल्म है।
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