
कांग्रेस के राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने शुक्रवार को सदन में किसानों की फसल बीमा योजना से जुड़ा विषय उठाया। उन्होंने कहा कि बीमा कंपनियां किसानों को सही तरीके से और पूरा मुआवजा नहीं दे रही हैं। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है, जो देश के करोड़ों किसानों से जुड़ा है।
उन्होंने कहा कि कई राज्यों से जो उदाहरण सामने आए हैं, वे इस योजना की गंभीर खामियों को उजागर करते हैं। महाराष्ट्र में किसानों की फसल खराब हुई और जब मुआवजा आया तो किसी के खाते में 21 रुपये, किसी के खाते में 8 रुपये और कुछ किसानों के खाते में तो केवल 3 रुपये ही आए।
Published: undefined
उन्होंने राज्यसभा में कहा कि वह यह पूछना चाहते हैं कि 3 रुपये से किसान क्या करेगा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का नाम तो हम सबने सुना है। इसे बड़े उद्देश्य के साथ शुरू किया गया था। कहा गया था कि किसान कम प्रीमियम देकर सूखा, बाढ़, ओला-बारिश, कीट-रोग जैसी प्राकृतिक आपदाओं से अपनी फसल को सुरक्षित कर सकेंगे। संकट की घड़ी में उन्हें आर्थिक सहारा मिलेगा और उनकी आय स्थिर रहेगी।
सांसद ने कहा कि इसी तरह उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में आई बाढ़ में धान की फसल डूब गई। किसानों ने बीमा का दावा किया, लेकिन मुआवजे के नाम पर किसी के खाते में 3 रुपए 76 पैसे और किसी के खाते में 2 रुपए 62 पैसे आए।
Published: undefined
उन्होंने कहा कि वह सरकार से पूछना चाहते हैं कि क्या किसान 5 रुपए में नई फसल बो पाएगा। क्या 3 रुपए में डीजल आएगा। क्या पौने 3 रुपए में कीटनाशक मिलेगा। या फिर किसान उन पैसों को फ्रेम करवाकर रख ले कि यह उसका बीमा सुरक्षा कवच है। राजीव शुक्ला ने कहा कि बीमा का अर्थ होता है संकट के समय सहारा। लेकिन यहां स्थिति ऐसी है कि किसान सोचता होगा कि इतने पैसों में तो मोबाइल रिचार्ज भी नहीं होता, फसल कैसे होगी।
उन्होंने यह भी कहा कि समस्या केवल रकम की नहीं है। कई जगह फसल का फिजिकल वेरिफिकेशन भी समय पर नहीं होता। अधिकारी खेतों में तब पहुंचते हैं जब फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी होती है और दोबारा बुआई का समय आ जाता है। कई बार पोर्टल बंद हो जाता है, सर्वर डाउन हो जाता है और किसान चक्कर लगाते-लगाते चप्पल घिस देता है, लेकिन उतना मुआवजा भी उसे नहीं मिलता। ऊपर से एरिया एप्रोच के नाम पर औसत निकाल दिया जाता है। अगर पूरे क्षेत्र का औसत ठीक बता दिया गया, तो जिस किसान की फसल पूरी तरह चौपट हो गई, उसे भी कह दिया जाता है कि आपके इलाके में तो सब सामान्य है।
Published: undefined
उन्होंने कहा कि एक और बात ध्यान देने वाली है। किसान डेढ़ से दो प्रतिशत प्रीमियम देता है और बाकी पैसा सरकार देती है, यानी जनता का पैसा। इस तरह बीमा कंपनियों को हजारों करोड़ रुपए का प्रीमियम मिलता है। जो साल सामान्य होता है तब दावे भी कम आते हैं और कंपनियों का लाभ बढ़ता रहता है। लेकिन जब किसान की बारी आती है, तो उसके हिस्से में 3 रुपये, 5 रुपये जैसे मुआवजे आते हैं। कभी-कभी तो किसानों के खातों से बिना स्पष्ट जानकारी के प्रीमियम भी कट जाता है। यानी जोखिम किसान और सरकार उठाएं लेकिन लाभ कोई और ले जाए, यह व्यवस्था न्यायसंगत नहीं है।
उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि बीमा दावों के निपटान और भुगतान की स्पष्ट समयसीमा तय की जाए। फसल नुकसान का समय पर और पारदर्शी सर्वेक्षण सुनिश्चित किया जाए। एरिया एप्रोच के बजाय वास्तविक खेत स्तर पर मूल्यांकन की व्यवस्था की जाए। और बीमा कंपनियों की जवाबदेही तय की जाए, ताकि किसानों को सम्मानजनक और वास्तविक मुआवजा मिल सके।
Published: undefined
आईएएनएस के इनपुट के साथ
Published: undefined
Google न्यूज़, नवजीवन फेसबुक पेज और नवजीवन ट्विटर हैंडल पर जुड़ें
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए, यहां क्लिक करें @navjivanindia
Published: undefined