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'मनरेगा को खत्म करने के बाद, क्या अब आरटीआई की बारी है?' कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे का सरकार से सवाल

संसद में बृहस्पतिवार को प्रस्तुत वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में लगभग दो दशक पुराने आरटीआई कानून का फिर से अध्ययन करने की वकालत की गई है, ताकि गोपनीय रिपोर्ट और मसौदों को सार्वजनिक किए जाने से छूट प्राप्त हो।

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (फोटो : Getty Images)
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे (फोटो : Getty Images) 

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आर्थिक समीक्षा में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम का फिर से अध्ययन करने की पैरवी किए जाने का हवाला देते हुए शुक्रवार को कहा कि क्या सरकार मनरेगा के बाद अब इस कानून को खत्म करना चाहती है?

संसद में बृहस्पतिवार को प्रस्तुत वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में लगभग दो दशक पुराने आरटीआई कानून का फिर से अध्ययन करने की वकालत की गई है, ताकि गोपनीय रिपोर्ट और मसौदों को सार्वजनिक किए जाने से छूट प्राप्त हो।

आर्थिक समीक्षा में यह भी कहा गया कि आरटीआई अधिनियम 2005 का मकसद कभी भी इसे व्यर्थ की जिज्ञासा का जरिया बनाने का नहीं था, न ही इसका मकसद बाहर से बैठकर सरकार के हर छोटे-छोटे काम में दखल देना या उसे नियंत्रित करना था।

खड़गे ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘‘आर्थिक समीक्षा ने सूचना का अधिकार अधिनियम की फिर से अध्ययन करने की पैरवी की है। यह सूचना को रोकने के लिए संभावित “मंत्री स्तरीय वीटो” का सुझाव भी देती है और यह देखने की बात करती है कि क्या नौकरशाहों की सार्वजनिक सेवा से जुड़े रिकॉर्ड, तबादले और स्टाफ रिपोर्ट्स को सार्वजनिक निगरानी से बाहर रखा जा सकता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मोदी सरकार ने व्यवस्थित रूप से आरटीआई अधिनियम को कमजोर किया है। 2025 तक 26,000 से ज़्यादा मामले लंबित हैं। 2019 में मोदी सरकार ने आरटीआई अधिनियम में कटौती करते हुए सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन पर नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया, जिससे स्वतंत्र निगरानी संस्थाओं को आज्ञाकारी अफ़सरों में बदल दिया गया।’’

खड़गे ने आरोप लगाया कि डिजिटल डेटा सुरक्षा अधिनियम, 2023 की आड़ में “जनहित” वाले प्रावधान को खोखला कर दिया गया तथा निजता को हथियार बनाकर भ्रष्टाचार को ढकने और जांच-पड़ताल रोकने का रास्ता खोल दिया गया।

उन्होंने कहा, ‘‘ दिसंबर, 2025 तक केंद्रीय सूचना आयोग बिना मुख्य सूचना आयुक्त के काम कर रहा था, 11 साल में सातवीं बार इस अहम पद को जानबूझकर खाली रखा गया। 2014 से अब तक 100 से ज़्यादा आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है, जिससे सच बोलने वालों को दंडित करने और असहमति की आवाज़ दबाने का माहौल बना है।’’

खड़गे ने सवाल किया, ‘‘मनरेगा को खत्म करने के बाद, क्या अब आरटीआई की बारी है?’’

पीटीआई के इनपुट के साथ

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