
कावेरी जल विवाद में अपने पिछले आदेश के अनुसार जल बंटवारे का मसौदा तैयार नहीं करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। 3 मई को शीर्ष अदालत में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की तीन सदस्यीय पीठ को अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बताया कि पीएम मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी इस समय कर्नाटक विधानसभा चुनाव के प्रचार में व्यस्त हैं, इसलिए कावेरी प्रबंधन बोर्ड से संबंधित योजना का मसौदा मंत्रिमंडल के सामने नहीं रखा जा सका है।
इस पर तमिलनाडु की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफडे ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि केंद्र सरकार का यह व्यवहार तमिलनाडु के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के प्रति इस तरह का व्यवहार संघीय राजनीति में शोभा नहीं देता है। उन्होंने कहा कि कोर्ट द्वारा पानी के बंटवारे को लेकर एक योजना बनाने का आदेश देने के 2 महीने बाद भी कुछ नहीं हुआ। उन्होंने भीषण गर्मी और पहले से तमिलनाडु में जारी जल संकट की ओर भी न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया।
इस पर सीजेआई दीपक मिश्रा की पीठ ने कर्नाटक सरकार को आदेश जारी करते हुए कहा कि वह फौरन तमिलनाडु के लिए 4 टीएमसी (हजार क्यूबिक) पानी जारी करे। कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर कर्नाटक ऐसा नहीं करता है तो उसे गंभीर अंजाम भुगतने पड़ेंगे। कोर्ट ने केंद्र सरकार को भी निर्देश दिया कि वह मंगलवार तक एक हलफनामा दाखिल करके बताए कि उसने कावेरी विवाद को निपटाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए हैं।
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सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने पीठ से कहा कि कावेरी नदी के जल बंटवारे से संबंधित विधेयक कैबिनेट के समक्ष रखा जा चुका है। चूंकि पीएम मोदी विदेश यात्रा के बाद फिलहाल कर्नाटक के चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं, इसलिए अब तक इस विधेयक को मंजूरी नहीं मिल पाई है। अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि वह इस मामले की सुनवाई 12 मई तक के लिए टाल दें क्योंकि उस दिन कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसपर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कर्नाटक चुनाव से हमारा कोई लेना-देना नहीं है और न ही यह हमारी चिंता है। कर्नाटक सरकार को तुरंत तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ना होगा।
इसी साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को कावेरी नदी के पानी के बंटवारे के लिए एक मैनेजमेंट बोर्ड का गठन करने का आदेश दिया था। अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने कहा था कि नदी के पानी पर किसी भी राज्य का मालिकाना हक नहीं होता है। कोर्ट ने कावेरी जल विवाद ट्रिब्यूनल के फैसले के तहत तमिलनाडु को मिलने वाले पानी में कटौती करते हुए कर्नाटक को मिलने वाले पानी की मात्रा में इजाफा किया था।
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