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क्या सच में मिली 70 लाख लोगों को पिछले साल नौकरी? यह रही पीएम के दावे की हकीकत...

प्रधानमंत्री ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में ईपीएफ के जिन आंकड़ों का जिक्र किया था<b>,</b> वह किसी सर्वे नहीं बल्कि ईपीएफओ की एक योजना के आंकड़े थे, जिसमें किसी को नई नौकरी नहीं मिली है<b></b>

फोटो : सोशल मीडिया
फोटो : सोशल मीडिया दिल्ली स्थित कर्मचारी भविष्य निधि संगठन का कार्यालय

“भ्रामक प्रचार के झांसे में न आओ: वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान औपचारिक क्षेत्र में करीब 6 लाख नौकरियां हर महीनें सृजित हुई हैं, ये आंकड़े आए हैं ईपीएफओ और एनपीएस पर आधारित एक संस्थागत अध्य्यन से।“ बीजेपी सांसद और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भूपेंद्र यादव ने 18 जनवरी को यह बात अपने ट्वीट में कही।

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इस ट्वीट के अगले ही दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन्हीं आंकड़ों और अध्य्यन का हवाला दिया। जिस अध्य्यन की बात की जा रही है वह स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष और आईआईएम, बेंग्लुरु में प्रोफेसर पुलक घोष ने किया है। इन दोनों अर्थशास्त्रियों ने ईपीएफओ यानी कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, ईएसआईसी यानी कर्मचारी राज्य बीमा निगम, जनरल प्रॉविंडेंट फंड और नेशनल पेंशन स्कीम यानी एनपीएस के आंकड़ों की गणना कर यह अनुमान लगाया है।

प्रधानमंत्री मोदी और भूपेंद्र यादव दोनों ने ही यह आभास देने की कोशिश की कि औपचारिक क्षेत्र में पिछले एक साल के दौरान देश में 80 लाख से एक करोड़ के करीब नई नौकरियां पैदा हुईं। इन आंकड़ों को प्रधानमंत्री और भूपेंद्र यादव दोनों ने ही उन दावों को खारिज करने के लिए इस्तेमाल किया जिसमें कहा जा रहा है कि बिना रोजगार और नौकरी वाले विकास और वृद्धि की बात की जा रही है और जीएसटी और नोटबंदी ने बेरोजगारी को बढ़ाया है।

लेकिन, जैसा कि इस सरकार के हर दावे में होता है, इस आंकड़े की भी सच्चाई कुछ और है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ईपीएफओ में 2017 के दौरान 90 लाख से एक करोड़ के बीच नए सदस्य जुड़े हैं। लेकिन ये नई नौकरियां नहीं हैं। हकीकत यह है कि यह सदस्य वह हैं, जिनके नियोक्ताओं ने अपने मौजूदा कर्मचारियों को पीएफ के लाभ और सामाजिक सुरक्षा के दायरे से बाहर रखा था।

कहानी दरअसल यह है कि ईपीएफओ ने उन नियोक्ताओं के लिए एक क्षमा योजना शुरु की थी, जो किसी न किसी कारण से अपने कर्मचारियों का ईपीएफओ में नामांकन नहीं कर पाए थे या जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहे थे। हालांकि ईपीएफ कानून में स्पष्ट है कि अगर किसी भी नियोक्ता ने अपने कर्मचारी का पीएफ अंशदान नहीं जमा कराया है तो उसे आर्थिक दंड के साथ सजा भी हो सकती है। लेकिन इस योजना के तहत ऐसे सभी नियोक्ताओं को राहत देते हुए पेशकश की गई थी कि वे मात्र एक रुपए प्रति वर्ष के सांकेतिक दंड का भुगतान कर अपने कर्मचारियों को ईपीएफ का सदस्य बना सकते हैं।

ईपीएफओ का नीचे दिया गया सर्कुलर इस बात को स्पष्ट कहता है। लेकिन इसमें यह साफ नहीं है कि एक रुपए प्रति वर्ष का दंड प्रति नियोक्ता है या प्रति कर्मचारी

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फोटो : सौजन्य ईपीएफओ वेबसाइट

कुछ दिन पहले बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार में छपी खबर में केंद्रीय पीएफ कमिश्नर वी पी जॉय के हवाले से कहा गया था कि, ईपीएफओ में सदस्यों की बढ़ी संख्या सिर्फ इस बात का संकेत है कि कर्मचारियों का सिर्फ नियमितीकरण हुआ, न कि यह नए कर्मचारी हैं। यह वे कर्मचारी हैं जिन्हें इस लाभ से वंचित रखा गया था। यह नई नौकरियां नहीं हैं।

ईपीएफओ की यह योजना जनवरी 2017 में तीन महीने के लिए शुरु की गई थी और मार्च 2017 तक खत्म हो जानी थी, लेकिन बाद में इसे तीन महीने और बढ़ाकर जून 2017 तक कर दिया गया। इस तरह ईपीएफओ सदस्यों की संख्या तो निश्चित रूप से बढ़ी। इसमें भी ज्यादातर संख्या मुंबई, दिल्ली और बेंग्लुरु से थी। इसमें भी अकेले मुंबई से ही 12,87,500 सदस्य थे।

इस योजना से नियोक्ताओं को तो राहत मिल गई, लेकिन वे नए सदस्यों का अंशदान कब तक जारी रखेंगे, यह वक्त ही बताएगा और यह भी बाद में ही पता चलेगा कि आखिर इनमें से कितने कर्मचारी काम पर बरकरार रहते हैं। लेकिन एक बात जो स्पष्ट हो गई, वह यह कि देश में रोजगार सृजन कितना हुआ और कितने लोगों को नौकरी मिली, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। साथ ही यह सवाल भी कि आखिर ऐसे आंकड़े का प्रधानमंत्री ने क्यों हवाला दिया?

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