
कांग्रेस ने सरकार की ओर से किए गए उस नीतिगत बदलाव की बृहस्पतिवार को कड़ी आलोचना की, जिसके तहत गैर-कोयला खनन परियोजना विकासकर्ताओं को पर्यावरणीय मंजूरी के लिए भूमि अधिग्रहण का प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं होगा। कांग्रेस ने कहा कि यह जिम्मेदार पर्यावरणीय शासन पर ‘‘मोदी सरकार का एक और प्रहार’’ है।
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पर्यावरण मंत्रालय के हालिया ज्ञापन के अनुसार, गैर-कोयला खनन परियोजना विकासकर्ताओं को अब पर्यावरणीय मंजूरी के लिए भूमि अधिग्रहण का प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य नहीं होगा।
अब तक, मंत्रालय को भूमि अधिग्रहण का प्रमाण देना आवश्यक होता था।
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कांग्रेस महासचिव और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कहा, "गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए नीति यह रही है कि पहले कानून के अनुसार भूमि अधिग्रहण पूरा किया जाए और उसके बाद ही पर्यावरण संबंधी मंजूरी मांगी जा सकती है। हालांकि, 18 दिसंबर 2025 को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस नीति में बदलाव किया और अब गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से पहले पर्यावरण संबंधी मंजूरी मांगी जा सकती है।"
उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि यह समझ से परे है कि गैर-कोयला खनन परियोजना के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र की पूरी जानकारी के बिना सार्थक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन कैसे किया जा सकता है।
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रमेश ने कहा, ‘‘यह नीतिगत बदलाव देश में जिम्मेदार और जवाबदेह पर्यावरणीय शासन के लिए मोदी सरकार का एक और झटका है।’’
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पूर्व के नियम पर इसलिए पुनर्विचार किया गया क्योंकि यह अनुरोध किया गया था कि गैर-कोयला खनन परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) प्रदान करते समय भूस्वामियों की सहमति पर जोर नहीं दिया जाना चाहिए और भूमि अधिग्रहण की स्थिति को मंजूरी प्रदान करने से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
पीटीआई के इनपुट के साथ
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