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तमिलनाडु मुद्दे पर बदनीयती से प्रेरित था राज्यपाल का रवैया, कोर्ट के फैसले से संविधान की हुई जीत: राकेश द्विवेदी

अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने आगे कहा कि उसी समय तमिलनाडु का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। जब इस पर सुनवाई शुरू हुई, तो अटॉर्नी जनरल ने सुझाव दिया कि इस मामले को बातचीत के जरिए राज्यपाल से सुलझाने की कोशिश की जाए।

फोटो: IANS
फोटो: IANS 

तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल आरएन रवि के बीच लंबे समय से चल रहे विधेयक विवाद का सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार पटाक्षेप कर दिया है। कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद वे 10 विधेयक, जिन्हें राज्यपाल ने वर्ष 2020 से रोक रखा था, अब स्वतः कानून बन गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल के व्यवहार को संविधान के विरुद्ध और अनुच्छेद 200 का उल्लंघन करार दिया। इस मामले में तमिलनाडु सरकार की ओर से पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने आईएएनएस से विशेष बातचीत में इस पूरे घटनाक्रम और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर विस्तार से जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि यह फैसला तमिलनाडु की विशेष परिस्थितियों में दिया गया है। परिस्थिति यह थी कि 10 विधेयक तमिलनाडु की विधानसभा ने पारित करके राज्यपाल को उनकी स्वीकृति के लिए भेजे थे, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें एक साल से भी अधिक समय तक दबाकर रखा और कोई निर्णय नहीं लिया। इसी दौरान पंजाब से जुड़ा एक मामला सुप्रीम कोर्ट में आया और कोर्ट ने अनुच्छेद 200 पर स्पष्ट निर्णय दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई विधेयक राज्यपाल के पास आता है और वह उसे स्वीकृति नहीं देना चाहते हैं, तो उन्हें पहले विधायिका को वापस भेजना चाहिए, पुनर्विचार के लिए एक संदेश के साथ। अगर विधायिका उस विधेयक को दोबारा पास करके भेजती है, तो फिर राज्यपाल को उस पर स्वीकृति देना अनिवार्य होगा। वहां उनके विवेक की कोई भूमिका नहीं रह जाती, यह निर्णय हुआ था।

अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने आगे कहा कि उसी समय तमिलनाडु का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित था। जब इस पर सुनवाई शुरू हुई, तो अटॉर्नी जनरल ने सुझाव दिया कि इस मामले को बातचीत के जरिए राज्यपाल से सुलझाने की कोशिश की जाए। लेकिन, राज्यपाल ने उस समय न तो मंजूरी दी, न राष्ट्रपति को भेजा, बल्कि सभी विधेयकों को “मैं अपनी सहमति नहीं देता” लिखकर लौटा दिया। इसके बाद तमिलनाडु विधानसभा ने उन्हें पुनः पारित कर के फिर से राज्यपाल को भेजा, तब उन्होंने उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया।

राकेश द्विवेदी ने कहा, "इससे यह प्रतीत हुआ कि राज्यपाल की मंशा ठीक नहीं थी। एक वर्ष तक फाइलों को दबाकर रखना, फिर पंजाब मामले के फैसले की अनदेखी करना, और बिना किसी मंतव्य के सभी विधेयकों को रोकना, ये सब दिखाता है कि वे बदनीयती से कार्य कर रहे थे। जब विधानसभा ने दोबारा विधेयक भेजे, तो उन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया गया। लेकिन यह संविधान सम्मत प्रक्रिया नहीं थी। क्योंकि अनुच्छेद 200 के तहत, जब विधेयक दोबारा पास होकर आता है, तो राज्यपाल को उसे स्वीकृति देनी ही होती है।"

 एडवोकेट द्विवेदी ने कहा कि राज्यपाल यह नहीं कह सकते कि मैं फिर से रोकूंगा या राष्ट्रपति को भेज दूंगा। उन्हें स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि किस बिंदु पर पुनर्विचार चाहते हैं, और जब विधायिका उसे फिर से पारित करे, तो स्वीकृति देना ही उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी बनती है। अनुच्छेद 200 में “स्वीकृति देने से इंकार नहीं किया जाएगा” यह शब्दावली है। यानी दोबारा पारित विधेयकों को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल की कार्रवाई को अनुच्छेद 200 का उल्लंघन माना और उसे रद्द कर दिया। जब मूल निर्णय ही रद्द हो गया, तो राष्ट्रपति को भेजी गई फाइल की वैधता भी समाप्त हो गई। क्योंकि जब बुनियाद ही गिर गई, तो उस पर खड़ी बाकी संरचना अपने आप अवैध हो जाती है।

बता दें कि तमिलनाडु सरकार ने विधानसभा में कुल 10 विधेयक पारित किए थे, जिनमें से कुछ पहले की एआईडीएमके सरकार के कार्यकाल में पारित हुए थे, जबकि बाकी मौजूदा डीएमके सरकार के दौरान पास किए गए। लेकिन राज्यपाल आरएन रवि ने इन विधेयकों को मंजूरी नहीं दी और लंबे समय तक बिना किसी निर्णय के रोके रखा। इसके बाद मौजूदा सरकार ने इन सभी विधेयकों को फिर से विधानसभा में पारित कर राज्यपाल के पास भेजा, लेकिन उन्होंने इस बार भी सहमति नहीं दी और उन्हें राष्ट्रपति के पास विचारार्थ भेज दिया। सरकार ने इस प्रक्रिया को अनुचित और असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल का ऐसा व्यवहार संविधान के अनुच्छेद 200 के विपरीत है और विधायिका की स्वीकृति प्राप्त विधेयकों को रोकना या टालना गवर्नर की भूमिका के अनुरूप नहीं है।

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