देश

बिहार में श्रमिकों के रजिस्ट्रेशन में भी कहीं न हो जाए वैक्सिनेशन-जैसा खेल

इन दिनों बिहार में फर्जी वैक्सिनेशन रिकॉर्ड की चर्चा खूब है। बिना वैक्सीन लिए सर्टिफिकेट मिलने, मर गए लोगों के नाम पर भी वैक्सिनेशन प्रमाणपत्र जारी करने की खबरें तो थीं ही, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, ऐश्वर्या राय-जैसों को भी यहां वैक्सीन लगाने वालों की लिस्ट में शामिल कर लिया गया।

सोशल मीडिया
सोशल मीडिया 

इन दिनों बिहार में फर्जी वैक्सिनेशन रिकॉर्ड की चर्चा खूब है। बिना वैक्सीन लिए सर्टिफिकेट मिलने, मर गए लोगों के नाम पर भी वैक्सिनेशन प्रमाणपत्र जारी करने की खबरें तो थीं ही, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, ऐश्वर्या राय-जैसों को भी यहां वैक्सीन लगाने वालों की लिस्ट में शामिल कर लिया गया। अब श्रमिकों के निबंधन की केन्द्र सरकार की योजना जिस तरह बिहार में चल रही है, उसमें भी यही सब हो जाए, तो आश्चर्य नहीं।

पूरे दो महीने में ई-कार्ड के लिए बिहार में महज 1.13 करोड़ श्रमिकों का निबंधन किया गया है। इसके बनाने की अंतिम तिथि है 31 दिसंबर। इसे 3.49 करोड़ का लक्ष्य हासिल करना है, मतलब रोजाना 10 लाख से ज्यादा ही। अंगुलियों पर जोड़ते रहिए कि कितने दिन बचे हैं और बनेगा, तो कैसे। कोई भी इसे संभव नहीं मान रहा। लेकिन सरकारी अफसर से लेकर श्रम मंत्री तक दिन-रात लगकर लक्ष्य हासिल करने का दावा कर रहे हैं। दावों से अलग हकीकत यह भी है कि अब भी इसके लिए चिट्ठी- चिट्ठी का ही दौर चल रहा है।

असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के निबंधन का कथित महाअभियान उस बिहार में औपचारिक तौर पर 6 अक्टूबर से शुरू हुआ जहां से लाखों लोग पलायन कर देश के लगभग हर राज्य में दशकों से जा रहे हैं। कोरोना के लॉकडाउन में यह मुद्दा भी बना। लेकिन उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश सरकार की वापसी के साथ ही मामला ठंडे बस्ते में चला गया। श्रमिकों के निबंधन के महाअभियान में 6 दिसंबर तक 1.13 करोड़ ही श्रमिक निबंधित हो सके। अभियान को जमीनी तौर पर सफल बनाने के लिए गांव-गांव तक बने वसुधा केन्द्र- कॉमन सर्विस सेंटर को अग्रणी भूमिका निभानी थी। 16 से 59 साल के वे सभी लोग ई-श्रम कार्ड के लिए निबंधन करा सकते हैं जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं, यानी न तो उनका पीएफ-ईएसआई अंशदान जमा होता है और न वे इनकम टैक्स जमा करने वाले हों। ई-श्रम कार्ड बनवाने वाले श्रमिकों का रिकॉर्ड पोर्टल पर रहेगा जिससे देशभर में कहीं भी उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। करोड़ों नहीं, तो लाखों लोग खुद आकर अपने नाम दर्ज कराते अगर उन्हें इस तरह की स्पष्ट जानकारी के साथ यह भी पता होता कि इसमें 2 लाख रुपये का दुर्घटना बीमा भी है। लेकिन राज्य सरकार ने इसका समुचित प्रचार ही नहीं किया, तो लोग रजिस्ट्रेशन के लिए आगे आएं भी तो कैसे?

लोगों को इस बारे में जानकारी ही नहीं है, उसके कुछ उदाहरण। बालिग होने के पहले से ही फरीदाबाद की एक ऑटोमोबाइल पार्ट्स फैक्टरी में काम कर रहे मनटुन यादव छठ पर्व की छुट्टी मनाने बिहार आए थे। करीब 20 दिनों घर पर ही रहे। वह पटना जंक्शन से नई दिल्ली की ट्रेन पकड़ने पहुंचे थे। उनसे जब पूछा कि क्या उन्होंने ई-श्रम कार्ड बनवाया लिया है, उन्होंने कहा, ‘नहीं तो भइया जी... ई क्या होता है?’ पुरानी दिल्ली के यमुना विहार में 20 साल से रहकर ट्रक ड्राइविंग का काम करने वाले खगड़िया के ललन ने भी सवाल के जवाब में इसी तरह का सवाल पूछा। वर्षों पहले पलायन कर चुके श्रमिक ही नहीं, मुंबई के दादर स्टेशन पर वाटरप्रूफ घड़ी का धंधा कर रहे श्याम या लुधियाना की फैक्टरी में अब पूरे परिवार को काम पर लगा चुके रामप्यारे साह भी बिहार आने पर न तो कोई संभावना देखते हैं और न ऐसी किसी योजना की जानकारी स्वीकार करते हैं।

हां, सरकार में बैठकों और चिट्ठियों का दौर जरूर जारी है। पिछले दिनों ई-श्रम कार्ड के निबंधन की गति बढ़ाने के लिए मुख्य सचिव त्रिपुरारी शरण की अध्यक्षता में राज्यस्तरीय समिति की बैठक हुई और उसके बाद सचिवालय से जिलाधिकारियों को चिट्ठी गई। कई जिलाधिकारियों ने भी इसी तरह किसी बैठक में इसकी चर्चा की और मातहत को निर्देश जारी कर दिया। यह लक्ष्य हासिल करना और किसी के हित में नहीं क्योंकि इसमें लाभ पाने वाला सीधे-सीधे श्रमिक होगा। बीच में किसी का कोई काम नहीं बनेगा।

ऐसे में, यह डर गैरवाजिब नहीं है कि बिहार में फर्जी तरीके से डाटा फीडिंग का यह खेल कहीं ई-श्रम कार्ड बनाने में भी न हो जाए। इस तरह की फीडिंग हो गई तो हो सकता है, पैसा कमाने का कोई नया रास्ता भी निकल आए।

प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए