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कैस्पियन सागर तक पहुंची मिडिल ईस्ट की जंग, रूस-ईरान सप्लाई लाइन पर सीधा वार, इजरायल का बड़ा दावा

कैस्पियन सागर में हमले को लेकर इजरायल का दावा है कि उसने रूस-ईरान की हथियार सप्लाई लाइन को निशाना बनाया है। इससे जंग का दायरा बढ़ने और सैन्य, आर्थिक असर की आशंका जताई जा रही है।

फोटो: AI Generated
फोटो: AI Generated 

मिडिल ईस्ट की जंग अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है, जहां इसकी भौगोलिक सीमाएं तेजी से टूटती दिख रही हैं। इजरायल ने दावा किया है कि उसने पहली बार कैस्पियन सागर में हमला कर रूस और ईरान के बीच चल रही एक अहम हथियार सप्लाई लाइन को निशाना बनाया है। इस कार्रवाई को सिर्फ सैन्य ऑपरेशन नहीं, बल्कि एक बड़ा रणनीतिक संदेश माना जा रहा है कि जंग अब पारंपरिक सीमाओं से बाहर निकल चुकी है।

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सुरक्षित माने जाने वाले कॉरिडोर पर हमला

कैस्पियन सागर, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा इनलैंड वाटर बॉडी माना जाता है, लंबे समय से रूस और ईरान के बीच एक सुरक्षित कॉरिडोर के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। यह इलाका अमेरिकी नौसेना की पहुंच से बाहर माना जाता था, जिससे दोनों देशों को बिना बड़े खतरे के हथियारों और जरूरी सामान की सप्लाई करने की सुविधा मिलती थी। दावा है कि इसी मार्ग के जरिए ड्रोन, आर्टिलरी शेल्स और लाखों राउंड गोला-बारूद भेजे जा रहे थे। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस रास्ते से 3 लाख से अधिक आर्टिलरी शेल्स और करीब 10 लाख राउंड ट्रांसफर किए गए।

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सप्लाई नेटवर्क तोड़ने की कोशिश

इस सप्लाई चेन में ईरान के "शाहेद ड्रोन" सबसे अहम कड़ी बन चुके थे। रूस इन ड्रोन का इस्तेमाल यूक्रेन के शहरों पर हमलों में कर रहा है, जबकि ईरान इन्हें खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर निशाना बनाने में इस्तेमाल करता रहा है। इसी नेटवर्क को तोड़ने के लिए इजरायल ने ईरान के कैस्पियन तट पर स्थित बंदरगाह बंदर अंजली पर हमला किया। इस स्ट्राइक में वॉरशिप, नेवल कमांड सेंटर, शिपयार्ड और रिपेयर फैसिलिटीज समेत कई सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। विजुअल सबूतों में जहाजों के तबाह होने और भारी नुकसान के संकेत मिले हैं।

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सैन्य से लेकर आर्थिक असर तक

इस घटनाक्रम ने रूस और ईरान के बढ़ते सैन्य गठजोड़ को भी उजागर कर दिया है। जंग के दौरान रूस ने ईरान को सैटेलाइट इंटेलिजेंस और एडवांस ड्रोन टेक्नोलॉजी दी, जिससे हमलों की सटीकता बढ़ी। विशेषज्ञों का मानना है कि इस हमले का मकसद केवल सप्लाई रोकना नहीं, बल्कि ईरान की समुद्री सुरक्षा की कमजोरियों को सामने लाना भी था। इसका असर सिर्फ सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रह सकता, क्योंकि यही रूट गेहूं और अन्य जरूरी सामान के व्यापार से भी जुड़ा था, जिससे फूड सिक्योरिटी पर भी असर पड़ने की आशंका है।

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बढ़ सकता है टकराव

रूस ने इस हमले की कड़ी निंदा करते हुए इसे सिविलियन ट्रेड हब पर हमला बताया है और चेतावनी दी है कि इससे जंग और फैल सकती है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह असर स्थायी नहीं होगा, क्योंकि रूस और ईरान वैकल्पिक रास्ते तलाश सकते हैं। फिर भी यह साफ हो गया है कि इजरायल अब दूर और अप्रत्याशित इलाकों में भी हमला करने की क्षमता दिखा चुका है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह सिर्फ एक चेतावनी थी या आने वाले समय में ऐसे और हमले देखने को मिलेंगे।  

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