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पीएम केयर्स में जमा 8.45 हजार करोड़ रुपए, लेकिन 6 साल में खर्च सिर्फ 0.01 फीसदी

इस फंड के बारे में जब भी 'सूचना का अधिकार' (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगी गई, हर बार इससे इनकार कर दिया गया और जल्द ही दावा किया गया कि यह एक प्राइवेट फंड है, इसलिए यह आरटीआई एक्ट के दायरे में नहीं आता है। इसी आधार पर इसने ऑडिट कराने से भी इनकार कर दिया।

पीएम केयर्स में जमा 8.45 हजार करोड़ रुपए, लेकिन 6 साल में खर्च सिर्फ 0.01 फीसदी
पीएम केयर्स में जमा 8.45 हजार करोड़ रुपए, लेकिन 6 साल में खर्च सिर्फ 0.01 फीसदी फाइल फोटो

प्राइम मिनिस्टर्स सिटिजन असिस्टेंस एंड रिलीफ इन इमरजेंसी सिचुएशंस (पीएम केयर्स) फंड ने आखिरकार अपनी आमदनी और खर्च का हिसाब-किताब सार्वजनिक किया है। यह पहला मौका है जब 2022-23 के बाद पीएम केयर्स फंड ने अपना ऑडिटेड खाता सामने रखा है। सिर्फ एक पन्ने पर अंकित इस हिसाब-किताब को फंड की वेबसाइट पर साझा किया गया है। लेकिन अभी भी 2025-26 का हिसाब-किताब सार्वजनिक नहीं किया गया है।

प्रधानमंत्री कार्यालय से संचालित इस ‘प्राइवेट’ फंड ने दावा किया कि मार्च 2025 तक फंड बढ़कर ₹8,452 करोड़ हो गया था। इसमें से 80 प्रतिशत यानी ₹6,641 करोड़ बैंकों में फिक्स्ड डिपॉजिट के तौर पर रखे गए हैं, जिससे ‘ट्रस्ट’ को ₹450 करोड़ का ब्याज मिला है। वित्त वर्ष 2024-25 के स्टेटमेंट से पता चलता है कि फंड को साल के दौरान दान और डिपॉजिट पर ब्याज से ₹1,200 करोड़ से ज़्यादा मिले। 31 मार्च 2025 को खत्म हुए साल के लिए खर्च के तौर पर ₹87 लाख दर्ज किए गए हैं। इसके खाते में 31 मार्च को कुल बैलेंस ₹8,452 करोड़ दिखाया गया है।

फंड का सिर्फ़ 0.01 प्रतिशत ही इस्तेमाल

वकील और आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज का कहना है कि खाते के लेखा-जोखा से पता चलता है कि उपलब्ध फंड का सिर्फ़ 0.01 प्रतिशत ही इस्तेमाल किया गया। उनका सवाल है कि इतनी बड़ी रकम बेकार क्यों पड़ी है। उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में यह भी कहा कि इस फंड क लागू करने वाली एजेंसियों से 324 करोड़ रुपये रिफंड के तौर पर दिखाए गए हैं, लेकिन इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है कि ये पैसे किसलिए थे और इन्हें रिफंड क्यों किया गया। उन्होंने पूछा, "क्या खराब उपकरणों के लिए जवाबदेही से बचने के लिए ये रिफंड किए गए थे?"

प्रधानमंत्री पीएम केयर्स फंड के पदेन अध्यक्ष

pmcares.gov.in वेबसाइट के अनुसार, प्रधानमंत्री पीएम केयर्स फंड के पदेन अध्यक्ष हैं और भारत सरकार के रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री इसके पदेन ट्रस्टी होते हैं। प्रधानमंत्री ने बोर्ड में दो ट्रस्टियों को नामित किया है, और वे हैं जस्टिस के टी थॉमस (रिटायर्ड) और करिया मुंडा। वेबसाइट पर 2024-25 तक के ऑडिट किए गए खाते भी उपलब्ध हैं।

बता दें कि 'प्रधानमंत्री राष्ट्रीय आपदा राहत कोष' के होते हुए भी, मार्च 2020 में कोविड महामारी से निपटने के कथित मकसद से बिना पारदर्शिता वाले पीएम केयर्स फंड बनाया गया था। शुरू में दावा किया गया था कि इसे सरकार बना रही है, इसलिए सरकारी कंपनियों और सरकारी कर्मचारियों को इसमें खुलकर दान देने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस फंड में पहले पांच दिनों में ही 3,000 करोड़ रुपये जमा हुए थे। यहां तक ​​कि कंपनियों के मुनाफे से बने सीएसआर (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) फंड को भी पीएम केयर्स में ट्रांसफर कर दिया गया।

आरटीआई एक्ट के दायरे में नहीं आता

इस फंड के बारे में जब भी 'सूचना का अधिकार' (आरटीआई) के तहत जानकारी मांगी गई, हर बार इससे इनकार कर दिया गया और जल्द ही दावा किया गया कि यह एक प्राइवेट फंड है, इसलिए यह आरटीआई एक्ट के दायरे में नहीं आता है। इसी आधार पर इसने भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएंडएजी से ऑडिट कराने से भी इनकार कर दिया। इस फंड के ट्रस्टियों का कहना था कि ऑडिटिंग ट्रस्टियों द्वारा चुने गए 'स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट्स' से कराई जा रही थी।

धुंधली जानकारियों के कारण फंड पर कई गंभीर सवाल

फंड का दावा है कि इसका कॉर्पस (यानी कुल जमा पैसा) 2020 के बाद से सबसे ऊंचे स्तर पर है और इसे कोविड जैसी भविष्य की आपात स्थितियों से निपटने के लिए बनाया जा रहा है। फंड के तहत किन आपात स्थितियों को कवर किया जाएगा, इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। साथ ही, यह भी साफ़ नहीं है कि 2025 में 87 लाख रुपये किस तरह की आपात स्थिति पर खर्च किए गए थे?

इन सारी धुंधली जानकारियों के चलते बीते छह सालों में पीएम केयर्स फंड पर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बाबत दायर उस पीआईएल (जनहित याचिका) को खारिज कर दिया था, जिसमें इस फंड के गठन पर सवाल उठाया गया था। याचिका में कहा गया था कि "यह ट्रस्ट न तो संसद या राज्य विधानसभा द्वारा बनाया गया है और न ही इसे भारत के राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली है; साथ ही, इस बारे में कोई अध्यादेश या सरकारी अधिसूचना (गज़ट नोटिफिकेशन) भी जारी नहीं की गई है।"

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विपक्ष की पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग

विपक्ष का लगातार आरोप रहा है कि  कि पीएम केयर्स फंड को गुप्त रखा गया है। उसका सवाल है कि इसमें पारदर्शिता और जवाबदेही का कोई सिस्टम क्यों नहीं है, और इसका ऑडिट क्यों नहीं किया जाता या इसे 'सूचना का अधिकार' (आरटीआई) कानून के दायरे में क्यों नहीं लाया गया, जबकि इसका 60 फीसदी फंड सरकारी कंपनियों से आता है।

कांग्रेस नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अभिषेक सिंघवी ने तब कहा था कि जिस पब्लिक फंड में 5,000 करोड़ रुपये तक का डोनेशन आता है, उसे आरटीआई के दायरे में आना चाहिए और जवाबदेही दिखानी चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया था कि पीएम केयर्स फंड में कुल चंदे का 60 प्रतिशत हिस्सा सरकारी कंपनियों और सरकार के मालिकाना हक वाली फर्मों से आया था, जिनमें ओनजीसी, एनटीपीसी, और इंडियन ऑयल कार्पोरेशन जैसी कंपनियां शामिल हैं। उन्होंने कहा था, "पीएम केयर्स में 'C' का मतलब ज़बरदस्ती (coercion), अव्यवस्था (chaos), भ्रम (confusion) और भ्रष्टाचार (corruption) है।"

उन्होंने सवाल किया था कि इसे जवाबदेही के दायरे से बाहर रखने की एक वजह यह भी थी कि इसे सरकार से कोई बजट सहायता नहीं मिलती थी, फिर सरकार के मालिकाना हक या नियंत्रण वाली नवरत्न और मिनी रत्न पीएसयू ही मुख्य दानदाता कैसे थीं। इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि योगदान देने वाले और दानदाता अब अलग हैं या नहीं, और वे कौन हैं।

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जब पीएम केयर्स फंड को विदेशी चंदे को रेगुलेट करने वाले कानूनों के सभी प्रावधानों से छूट मिली, तो भी सवाल उठे थे। ऐसा इसलिए क्योंकि यह फंड सरकार द्वारा स्थापित और उसके मालिकाना हक वाली संस्था होने की उस शर्त को पूरा करता नहीं दिखता, जिसके तहत खातों का ऑडिट भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएंडएजी) द्वारा किया जाता है। सूचना का अधिकार कानून के तहत पूछे गए एक सवाल के जवाब में गृह मंत्रालय ने कहा था कि जानकारी देने से पहले उसे पीएम केयर्स की "सहमति लेनी होगी", क्योंकि आरटीआई कानून के तहत इसे "तीसरी पार्टी" माना जाएगा। मंत्रालय ने उस नियम का भी हवाला दिया जिसके तहत जानकारी देने से इनकार किया जा सकता है, अगर वह जानकारी किसी भरोसे वाले रिश्ते के तहत रखी गई हो।

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