
आज कल देश भर में 'बुलडोजर न्याय' का क्रेज सिर चढ़कर बोल रहा है। किसी भी विवाद या अतिक्रमण की शिकायत पर तुरंत बुलडोजर मंगवाकर इमारतें जमींदोज़ कर दी जा रही हैं। लेकिन इस बार कानून के हाथ इतने सख्त हुए हैं कि मनमानी करने वाले अधिकारियों को दिन में ही तारे नजर आने लगे हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक बुलडोजर कार्रवाई पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।
प्रशासन को शिकायत मिली थी कि कुछ लोगों ने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा (अतिक्रमण) कर रखा है। इस कथित कब्जे को हटाने के लिए अधिकारी पूरी तैयारी और बुलडोजर के साथ मौके पर पहुंच गए। बिना किसी ठोस कानूनी प्रक्रिया या पूरी जांच के, प्रशासन ने वहां बनी एक दो मंजिला कमर्शियल (व्यावसायिक) इमारत को ढहा दिया। पीड़ित पक्ष इस एकतरफा और तानाशाही कार्रवाई के खिलाफ न्याय की गुहार लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया।
मामले की सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने माना कि प्रशासन ने बिना उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए मनमाने ढंग से यह कदम उठाया है। कोर्ट ने साफ किया कि 'अतिक्रमण हटाने' के नाम पर किसी की संपत्ति को इस तरह तबाह नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस मामले में न सिर्फ नाराजगी जताई, बल्कि आरोपी अधिकारियों को ऐसा सबक सिखाया है जिसे वे जिंदगी भर नहीं भूलेंगे। कोर्ट ने अधिकारियों को याचिकाकर्ताओं की इमारत दोबारा बनाने का आदेश दिया है। साथ ही नई इमारत तैयार होने तक प्रभावित लोगों को मुफ्त वैकल्पिक आवास देने और 10 लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया है।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कहा है कि प्रशासन ने बिना किसी कानूनी अधिकार के याचिकाकर्ताओं के आशियाने को जमींदोज़ कर दिया। अदालत ने पीड़ितों को तुरंत राहत देते हुए अधिकारियों को उनके लिए नए घर का इंतजाम करने का आदेश जारी किया है। अदालत में पेश किए गए सबूतों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्रियों की जांच करने के बाद हाई कोर्ट इस नतीजे पर पहुंचा कि सरकारी अधिकारियों ने कानून की सीमा को पार किया। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि याचिकाकर्ताओं के निर्माण को तोड़ने की यह पूरी कार्रवाई पूरी तरह गैर-कानूनी थी। प्रशासन के पास इस संपत्ति को गिराने का कोई वैध अधिकार नहीं था।
अधिकारियों की इस मनमानी पर नाराजगी जताते हुए हाई कोर्ट ने पीड़ितों के पक्ष में 3 बड़े निर्देश दिए हैं।
जब तक पीड़ितों को उनका नया घर नहीं मिल जाता, तब तक संबंधित प्राधिकरण उन्हें रहने के लिए वैकल्पिक जगह देगा। इसके लिए पीड़ितों से कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा।
कोर्ट ने कहा है कि यह वैकल्पिक आवास संभव हो तो उसी क्षेत्र में उपलब्ध कराया जाए, जहां उनका पुराना घर था, ताकि उनका जीवन ज्यादा प्रभावित न हो।
यह पूरी व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक कि प्रशासन नई इमारत का निर्माण पूरा करके उसका मालिकाना हक और कब्जा आधिकारिक तौर पर याचिकाकर्ताओं को नहीं सौंप देता।
हाईकोर्ट ने आम जनता के हक में एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि अगर किसी नागरिक की संपत्ति को बिना किसी कानूनी या वैध अधिकार के गिराया जाता है, तो संबंधित प्रशासन या प्राधिकरण को उसकी पूरी भरपाई करनी होगी। इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कोर्ट ने आदेश दिया है कि पीड़ितों को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए और दो साल के भीतर उनके लिए नई इमारत बनाकर उसका कब्जा उन्हें सौंपा जाए।
अवैध रूप से घर गिराए जाने के कारण याचिकाकर्ताओं को हुए नुकसान की भरपाई के लिए कोर्ट ने 10 लाख रुपये की आर्थिक मदद (मुआवजा) देने का भी हुक्म दिया है। यह पूरी रकम दो बराबर किस्तों में दी जाएगी।
पहली किस्त: 5 लाख रुपये, जो अक्टूबर 2026 के आखिरी दिन (31 अक्टूबर 2026) तक चुकानी होगी।
दूसरी किस्त: 5 लाख रुपये, जो फरवरी 2027 के आखिरी दिन (28/29 फरवरी 2027) तक देनी होगी।
प्रिय पाठकों हमारे टेलीग्राम (Telegram) चैनल @navjivanindia से जुड़िए और पल-पल की ताज़ा खबरें पाइए