
मध्य प्रदेश की एकमात्र राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा खारिज किए जाने के बाद कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी ने अपनी याचिका पर शीघ्र सुनवाई की मांग भी की है। इससे पहले बुधवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग से मिला और करीब 35 मिनट तक इस मुद्दे पर चर्चा की।
प्रतिनिधिमंडल में केसी वेणुगोपाल, जयराम रमेश, मीनाक्षी नटराजन, भूपेश बघेल, अभिषेक मनु सिंघवी और विवेक तन्खा सहित कई वरिष्ठ नेता शामिल थे। हालांकि चुनाव आयोग ने अभी तक मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है और उसका कहना है कि मामले पर विचार-विमर्श जारी है। इसके बावजूद कांग्रेस ने न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
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कांग्रेस का आरोप है कि मीनाक्षी नटराजन का नामांकन बिना किसी ठोस आधार के रद्द किया गया। पार्टी का कहना है कि जिस मामले का हवाला देकर आपत्ति दर्ज की गई, उसमें अभी तक किसी सक्षम अदालत ने संज्ञान नहीं लिया है। ऐसे में उसे छिपाई गई जानकारी नहीं माना जा सकता। कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयोग के समक्ष भी यही पक्ष रखा और नामांकन रद्द करने के फैसले को वापस लेने की मांग की।
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कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि पार्टी ने पहले चुनाव आयोग के माध्यम से समाधान निकालने का प्रयास किया, ताकि कानूनी प्रक्रिया में लगने वाले समय से चुनाव प्रभावित न हो। उन्होंने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत अपने विशेषाधिकारों का उपयोग करते हुए रिटर्निंग ऑफिसर के फैसले को पलट सकता है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2017 के गुजरात राज्यसभा चुनाव में चुनाव आयोग ने अनुच्छेद 324 के तहत हस्तक्षेप करते हुए रिटर्निंग ऑफिसर के निर्णय को पलट दिया था। उस फैसले ने कांग्रेस उम्मीदवार अहमद पटेल की जीत का रास्ता साफ किया था।
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गौरतलब है कि मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट के लिए कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन ने अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। हालांकि, बीजेपी द्वारा दर्ज कराई गई आपत्ति के बाद नामांकन पत्रों की जांच के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन रद्द कर दिया। अधिकारी का कहना है कि चुनावी शपथपत्र में एक मामले से संबंधित आवश्यक जानकारी का उल्लेख नहीं किया गया था। वहीं, कांग्रेस ने इस फैसले को चुनौती देते हुए दावा किया है कि नामांकन निरस्त करने की कार्रवाई न तो कानूनी रूप से उचित है और न ही उपलब्ध तथ्यों के अनुरूप।
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