
रांची के 17 वर्षीय स्कूली छात्र सार्थक सिद्धांत द्वारा शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति के सामने अपना प्रेजेंटेशन देने के कुछ घंटों के भीतर ही सरकार ने सीबीएसई के चेयरमैन और सेक्रेटरी का तबादला कर दिया। ये दोनों आईएएस अधिकारी हैं। इसके साथ ही सरकार ने उस डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली को जल्दबाजी में लागू किए जाने की जांच के लिए विभागीय जांच समिति की भी घोषणा की जिसके कारण पूरी गड़बड़ी हुई।
13 मई को परीक्षाफल घोषित होने के बाद से ही लाखों छात्रों ने अंकों के योग में त्रुटियों, बिना जांचे छोड़ दिए गए प्रश्नों, उत्तर पुस्तिकाओं के मिलान न होने, धुंधली स्कैनिंग और पूरक उत्तर पुस्तिकाओं के गायब होने की शिकायतें की। लाखों परीक्षार्थियों ने आवश्यक शुल्क का भुगतान करके परीक्षाफल के सत्यापन के लिए आवेदन किया है। 26 मई को सीबीएसई ने एक्स पर जारी पोस्ट में माना कि उसे उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन्ड कॉपी के लिए 4.04 लाख आवेदन मिले हैं। इसी पोस्ट में 11.31 लाख उत्तर पुस्तिकाओं की मांग के लिए आवेदन मिलने की बात मानी गई। ये दोनों आंकड़े सामने रख सीबीएसई क्या कहना चाहता था, यह समझ से परे है।
पुनर्मूल्यांकन (कॉपियों की दोबारा जांच) की प्रतीक्षा कर रहे छात्रों के लिए यह अब केवल एक तकनीकी खराबी नहीं रही, बल्कि पूरा परीक्षाफल ही शक के घेरे में है और उनका कॉलेज दाखिला खतरे में हैं, जो अक्सर प्रोविजनल सर्टिफिकेट पर निर्भर होते हैं कि उम्मीदवार ने अपनी बोर्ड परीक्षा में आवश्यक कट-ऑफ अंक प्राप्त कर लिए हैं।
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कुछ प्रभावशाली अधिकारियों का तबादला होने और बड़े पैमाने पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग से न तो छात्रों की समस्याएं हल होती हैं और न उनका भविष्य सुरक्षित होता है। अब भी, जबकि जल्दबाजी में शुरू किए गए ओएसएम वेब डोमेन के हैक होने योग्य होने ठोस प्रमाण मिल चुके है, सीबीएसई की प्रतिक्रिया केवल पुनर्मूल्यांकन आवेदनों को स्वीकार करने की है- वह भी शुल्क लेकर! यहां तक कि उसने इस पुनर्मूल्यांकन के लिए एक ग्रेडेड शुल्क संरचना भी तैयार कर ली है।
रांची के सार्थक सिद्धांत और सिलीगुड़ी के 19 वर्षीय निसर्ग अधिकारी ने सीबीएसई द्वारा 18 लाख छात्रों की 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के मूल्यांकन के लिए इस्तेमाल किए गए ओएसएम प्लेटफॉर्म की खामियों को पूरी तरह उजागर कर दिया है। सार्थक ने यह भी खुलासा किया कि कैसे सीबीएसई ने हैदराबाद स्थित ‘कोएम्प्ट एडुटेक’ को फायदा पहुंचाने के लिए शर्तों को बदला और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) को हाशिये पर डाल दिया। एक संक्षिप्त तुलना: टीसीएस, जिसके पास 6,00,000 कर्मचारी, 29 अरब डॉलर (2.40 लाख करोड़ रुपये) का सालाना राजस्व और 57 वर्षों का अनुभव है, वह 51 कर्मचारियों और 50 करोड़ रुपये के औसत वार्षिक कारोबार वाली कंपनी से पिछड़ गई!
यह सही है कि किसी कंपनी का आकार विश्वसनीयता की गारंटी नहीं, लेकिन सीबीएसई ने केवल गलती से एक खराब सॉफ्टवेयर विक्रेता को नहीं चुना। सार्थक ने ब्लॉग पोस्ट में बताया कि सीबीएसई ने वित्तीय आधारभूत मानकों को भी घटा दिया, सॉफ्टवेयर सुरक्षा प्रमाणन को हटा दिया, भ्रष्टाचार निरोधक कूलिंग-ऑफ अवधि आधी कर दी, भौतिक सर्वर आइसोलेशन की आवश्यकता हटा दी, बोली लगाने से ठीक पहले दंड प्रावधानों से ‘ब्लैकलिस्टिंग’ शब्द को हटा दिया और उसने अपने स्वयं के अनिवार्य सीईआरटी-इन उत्पादन ऑडिट को दरकिनार कर दिया।
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सवाल उठता है, टीसीएस को अनुबंध क्यों नहीं मिला? सीबीएसई ने 2025 में फरवरी, मई और अगस्त में तीन बार टेंडर निकाला, और हर बार कुछ शर्तों को कमजोर किया, मानकों को कम किया और कोएम्प्ट एडुटेक के लिए बोली लगाना आसान बनाया। कागजों पर, टीसीएस अपने विशाल नेटवर्क, विशेषज्ञता और विदेशों में सहयोगियों के साथ भारत का पहला ऑनलाइन मूल्यांकन प्लेटफॉर्म शुरू करने के लिए योग्य थी, लेकिन सीबीएसई उसे बाहर रखने की हरसंभव कोशिश कर रही थी। यहां तक कि उसने यह भी तय कर लिया कि वेंडर के पास अपना ‘डेटा सेंटर और डिजास्टर रिकवरी सेंटर’ होना जरूरी नहीं, यदि वेंडर 'मेईटी-पैनल वाले डेटा और डिजास्टर रिकवरी सेंटर' पर निर्भर है तो भी काम चल जाएगा।
ओएसएम टेंडर में अन्य बदलाव भी थे जिन्हें सार्थक ने खोज निकाला। सार्थक अपने ब्लॉग में कहते हैं, ‘उन्होंने हमारी डेटा सुरक्षा, हमारे अंकों और हमारे मानसिक स्वास्थ्य के साथ जुआ खेला।’ निसर्ग अधिकारी, जिन्होंने 12वीं बोर्ड परीक्षा शुरू होने (17 मई) से तीन महीने पहले, फरवरी 2026 में ही पता लगा लिया था कि प्लेटफॉर्म कितना असुरक्षित है, ने कहा कि वह डेटा बेचकर बहुत सारा पैसा कमा सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह चुप भी रह सकते थे और किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए अंकों में हेरफेर करने के लिए खामियों का उपयोग कर सकते थे जो भुगतान करने को तैयार होता। उन्होंने ऐसा नहीं किया। यदि मूल्यांकनकर्ताओं के प्लेटफॉर्म तक पहुंच उतनी ही आसान थी जितनी निसर्ग ने दिखाई, तो क्या गारंटी है कि बुरे तत्वों ने ऐसा नहीं किया?
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एथिकल हैकर निसर्ग ने तुरंत भारत की कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी-इन) को बताया कि उन्होंने क्या पाया है और खामियों को दूर करने के लिए क्या करना जरूरी है। इसपर सीबीएसई और सीईआरटी-इन, दोनों का रुख लापरवाही और संवेदनहीन था। कोएम्प्ट एडुटेक जिसे संभवतः सीबीएसई और सीईआरटी-इन द्वारा सतर्क किया गया था, ने छात्र की चेतावनी को नजरअंदाज कर दिया। एक 12वीं कक्षा का छात्र और क्या कर सकता था? 19 वर्षीय निसर्ग ने बताया कि कंपनी ने ‘न केवल मूल्यांकनकर्ताओं के प्लेटफॉर्म का दरवाजा खुला रखा था, बल्कि चाबी भी ताले में ही लटकाकर छोड़ दी थी’। अधिकारी ने कहा कि प्लेटफॉर्म का पासवर्ड बिल्कुल सार्वजनिक था और वह आसानी से स्कूलों और परीक्षकों का डेटा और सारे विवरण प्राप्त कर सकते थे। कोई भी व्यक्ति किसी भी परीक्षक के खाते पर कब्जा कर सकता था, उत्तर पुस्तिकाएं देख सकता था और अंकों को बदल सकता था।
निसर्ग ने 25 फरवरी को सीईआरटी-इन को इसकी सूचना दी। उनसे स्क्रीन रिकॉर्डिंग मांगी गई और उन्होंने तुरंत साझा कर दिया, जिसमें उन कदमों को दोहराया गया जो उन्होंने एक्सेस पाने के लिए उठाए थे। उन्हें पावती और एक केस रेफरेंस नंबर: सीईआरटीइन-16590126 प्राप्त हुआ। उन्हें यकीन दिलाया गया कि वे संबंधित एजेंसियों के संपर्क में है। हालांकि, 13 मई को परिणाम घोषित होने तक खामियां बरकरार रहीं।
एक अन्य परीक्षार्थी, वेदांत श्रीवास्तव ने अपनी जांची गई फिजिक्स की उत्तर पुस्तिका देखने की मांग की, जिसे सीबीएसई ने उन्हें ईमेल किया था। श्रीवास्तव यह देख दंग रह गए कि उत्तर पुस्तिका का पहला पृष्ठ, जहां रोल नंबर, स्कूल कोड आदि भरे जाने थे, वह उनकी अपनी लिखावट में था, जबकि बाकी उत्तर पुस्तिका किसी और की लिखावट में। सीबीएसई द्वारा टालमटोल किए जाने के बाद, उन्होंने 22 मई को ‘एक्स’ का सहारा लिया। उन्हें सरकारी टेलीविजन के एंकर ने 'पाकिस्तानी' और 'राष्ट्र-विरोधी' कहकर ट्रोल किया।
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उसी दिन निसर्ग ने ब्लॉग पोस्ट सार्वजनिक कर दिया जिसमें बताया गया कि कैसे वह प्लेटफॉर्म अंकों में हेरफेर का खुला निमंत्रण था। सीबीएसई ने दावा किया कि यह 'टेस्ट पोर्टल' था, लेकिन निसर्ग के एक दोस्त द्वारा उस डोमेन को 99 रुपये में खरीद लेने के बाद सीबीएसई ने चुपचाप अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। 25 मई को, निसर्ग ने एक और खामी का पता लगाया और फिर से इसकी सूचना सीईआरटी-इन को दी। चार घंटे बाद, सीबीएसई ने पूरे पोर्टल को ही बंद कर दिया। 31 मई को, वह सीबीएसई के एक अन्य पोर्टल तक पहुंचने में सफल रहे, जिसमें पुनर्मूल्यांकन के लिए 45,074 विफल भुगतानों का विवरण था, जिसमें ईमेल, फोन नंबर, पेमेंट आईडी और ऑर्डर आईडी शामिल थे। सीबीएसई ने अपने रुख पर कायम रहते हुए कहा कि सब कुछ ठीक है और सिस्टम बिल्कुल सुरक्षित है।
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सीबीएसई के सामने ऐसे तमाम सवाल हैं जिनका जवाब देना जरूरी है। क्या वह हैदराबाद स्थित कंपनी को अनुबंध देने के लिए किसी दबाव में थी? उसने चेतावनियों पर ध्यान क्यों नहीं दिया? टेंडर की शर्तों में बदलाव क्यों किए? इन बदलावों की मांग किसने की और उन्हें किसने मंजूरी दी? संदिग्ध ट्रैक रिकॉर्ड के बावजूद 'कोएम्प्ट एडुटेक' को क्यों चुना गया? सबसे अहम बात यह है कि सीबीएसई सभी उत्तर पुस्तिकाओं के पूर्ण पुनर्मूल्यांकन के अलावा, इन परिणामों की शुद्धता में कैसे यकीन बहाल करेगी जिन्हें स्वतंत्र लेखा परीक्षकों द्वारा निष्पक्ष और पारदर्शी माना जाए?
इन एथिकल हैकर्स ने बार-बार साबित किया कि ओएमएस डोमेन में सेंध लग चुकी है और अंकों को बदला जा सकता है, तो इसकी क्या गारंटी है कि ऐसा हुआ नहीं है? क्या सीबीएसई यकीन के साथ कह सकती है कि परिणामों में हेरफेर करने के लिए बुरे तत्वों ने पैसे के बदले ‘खेल’ नहीं किया? आप दो साल दिन-रात पढ़ाई करते हैं। सिर्फ इसलिए कि 12वीं की बोर्ड परीक्षा में अच्छा स्कोर कर सकें। आप जेईई, नीट का सपना देखते हैं। फिर परिणाम आता है... और सब तबाह हो जाता है। यह कोई कहानी नहीं। यह वह स्थिति है जिसे लाखों सीबीएसई कक्षा 12वीं के छात्र अभी जी रहे हैं।
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