
इन दिनों, कम-से-कम उत्तराखंड में तो, दीपक को 'हीरो' माफिक इज्जत दी जा रही है। दीपक देहरादून से लगभग 110 किलोमीटर दूर कोटद्वार में जिम चलाते हैं। वह हनुमान-भक्त हैं। दीपक का मानना है कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है और यह किसी से नफरत नहीं सिखाता। हिन्दू धर्मावलंबी मानते हैं कि हनुमान का जन्म ही राम काज के लिए हुआ है। लेकिन दीपक के साथ उलटबांसी चल रही है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुषांगिक संगठन- बजरंग दल हनुमान के नाम पर ही है। लेकिन इन दिनों बजरंग दल को हनुमान भक्त दीपक और उनके साथी न सिर्फ खटक रहे हैं बल्कि वह इनलोगों पर तरह-तरह से हमले भी कर रहा है।
कोटद्वार शहर में वकील अहमद की स्कूल यूनिफॉर्म की दुकान है। वकील की उम्र लगभग 70 साल है। उनकी दुकान के नाम में 'बाबा' भी है, हालांकि बोर्ड में इससे पहले वकील अहमद भी लिखा है। गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को कुछ लोग इस दुकान में घुस आए और उनलोगों ने 'बाबा' नाम के इस्तेमाल पर आपत्ति जताते हुए बोर्ड से 'बाबा' नाम तत्काल हटाने को कहा। जिस वक्त यह सब चल रहा था, तब ही वहां पहुंचे हट्टे-कट्ठे दीपक कश्यप और उनके साथी विजय रावत ने भीड़ से आपत्ति की वजह पूछी। उनलोगों ने जब उनका नाम पूछा, तो दीपक ने तपाक से जवाब दियाः 'मोहम्मद दीपक'। किसी ने इन सबकी एक मिनट से छोटी ही वीडियो बना ली और वह सोशल मीडिया पर 'मोहम्मद दीपक' नाम की वजह से ही वायरल हो गया। इन दोनों साथियों के साहस ने पूरे देश का ध्यान खींचा।
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वकील अहमद पार्किंसन रोग से पीड़ित हैं। वह करीब 40 साल से यह दुकान चला रहे हैं। उन्हें अब तक समझ में नहीं आया है कि 'बाबा' नाम से किसी धर्मविशेष का बोध कैसे हो जाता है? आखिर, बजरंग दल के लोगों ने यह नाम तुरंत हटाने को कहते हुए उनकी उम्र, अवस्था का खयाल न करते हुए अभद्र भाषा का उपयोग कैसे कर दिया? उधर, दीपक ने कहा कि 'मैं शुरू से यहीं रहा हूं और अधिकतर लोग मुझे मेरे नाम से जानते हैं। इसलिए, जब इनलोगों ने मुझसे मेरा नाम पूछा, तो मैं समझ गया कि ये कहीं दूसरे इलाके से आए हैं।' उन्होंने यह भी कहा कि यह भी साफ था कि उनलोगों का मकसद मुसलमान दुकानदार को परेशान करना था और इसी वजह से उन्होंने ऐसा नाम बताया जिससे उनकी पहचान मुस्लिम के तौर पर हो।
वैसे, यह भी जानने लायक है कि दीपक और वकील अहमद कोई पुराने परिचित वगैरह नहीं हैं। दीपक आसपास की दुकानों में अपने दोस्तों के साथ वैसे ही कभी-कभार आकर बैठते रहे हैं और इस बुजुर्गवार दुकनदार से वैसे ही उनकी दुआ-सलाम होती रही है। दीपक के पिता नहीं हैं और उनकी मां चाय बेचती रहती हैं जिन्होंने उन्हें सिखाया है कि अपने से बड़ों की इज्जत किया करो। 26 जनवरी के बाद 4 फरवरी को दीपक की मुलाकात वकील अहमद से हुई और उन्होंने कहा कि जिस तरह दीपक ने प्रतिरोध किया, उससे उन्हें साहस मिला है और उन्हें उम्मीद जगी है कि वह अपने शहर में अकेले नहीं हैं।
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लेकिन इस घटना की कीमत तो दोनों को ही चुकानी पड़ रही है। दुकान पर ग्राहकों की संख्या कम हो गई है जबकि दीपक को अपना जिम करीब एक हफ्ते तक बंद रखना पड़ा। कई एसयूवी पर सवार होकर देहरादून से आए लोगों ने 31 जनवरी को जिम और दीपक के घर के बाहर दीपक, उनकी पत्नी और उनकी मां को भद्दी-भद्दी बातें कहीं और यह सब उनलोगों को बेबसी में सुननी पड़ीं। यह सब बताते हुए वह रो पड़ते हैं और कहते हैं कि उनकी मां डरी हुई हैं, पत्नी भयभीत हैं। दुखद यह है कि पुलिस इस ओर कान नहीं धर रही जबकि शहर के हिन्दुओं का बड़ा वर्ग उन्हें ही दोषी ठहरा रहा है।
भले ही दूसरे शहरों से आकर लोग, खास तौर से विद्यार्थी आकर दीपक से मिलकर उन्हें समर्थन दे रहे हैं, उनके साथ सेल्फी ले रहे हैं, जगह-जगह के लोग उनकी प्रशंसा करते हुए फेसबुक पोस्ट कर रहे हैं, एक्स पर लिख रहे हैं, उनका भविष्य अनिश्चित है। उन्हें अपना परिवार अन्यत्र शिफ्ट कर देना पड़ा है। यह भी निश्चित नहीं है कि 'बाबा ड्रेसेस' में स्कूली बच्चों के कपड़े कब तक बेचे जा सकेंगे।
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यह सब उत्पात करने वाली भीड़ का नेता हरिद्वार का एक व्यक्ति है जिसका इसी किस्म का उपयोग सत्तारूढ़ भाजपा करती रही है। बजरंग दल ने धमकी भी दी है कि दीपक को अपने किए को भुगतना होगा। पुलिस ने दीपक के खिलाफ ही धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाने), 191(1) (दंगा करने), 351(2) (आपराधिक तौर पर धमकी देने), 352 (शांति भंग करने) के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कर ली है। यह एफआईआर कमल पाल की शिकायत पर दर्ज की गई है जिसमें कहा गया है कि दीपक, विजय और उनके दोस्तों ने लोगों के इस समूह के साथ दुर्व्यवहार किया और उन पर हमले किए जबकि जो वीडियो सार्वजनिक हैं, उनमें इसके उलट दिख रहा है।
संतुलन दिखाने के खयाल से 30-40 अज्ञात लोगों की ऐसी भीड़ के खिलाफ भी एक एफआईआर दर्ज कर ली गई है जिनलोगों ने 31 जनवरी को दीपक का घर घेर लिया था। हालांकि देहरादून के लोगों और वहां की पुलिस के जरिये इनलोगों की पहचान आसानी हो सकती है, लेकिन इनके खिलाफ शायद ही कोई कार्रवाई हो।
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वजह भी है। पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों, खास तौर से मुसलमानों को परेशान करने और उनके साथ मारपिटाई करने के लिए बजरंग दल और अन्य सांप्रदायिक संगठनों को खुली छूट दे रखी है। इस सरकार की अपनी तो कोई खास उपलब्धि है नहीं, इसलिए इसके पास अगले विधानसभा चुनाव में दिखाने के लिए कुछ है नहीं। पिछला चुनाव फरवरी 2022 में हुआ था। अगले साल जनवरी में हरिद्वार में कुंभ होना है, इस खयाल से एक चर्चा यह भी है कि चुनाव इसी साल हो सकते हैं। माना जाता है कि इसी वजह से सांप्रदायिक वैमनस्यता को हवा दी जा रही है।
वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट कहते हैं कि प्रधानतः पिछले दो महीने में सांप्रदायिक झड़पों की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है क्योंकि मुख्यमंत्री इनका उपयोग अकिता भंडारी बलात्कार-हत्या कांड से ध्यान हटाने के लिए कर रहे हैं। बरसों तक मांग को दबाए रखने के बाद जनआंदोलन और विरोध की वजह से सरकार को इसकी सीबीआई जांच का आदेश देना ही पड़ा। भट्ट कहते हैं कि लोगों को इस सरकार पर भरोसा नहीं है क्योंकि यह जांच एक ऐसे पर्यावरणविद अनिल जोशी द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर हुई है जिनका इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है।
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अंकिता भंडारी के मां-पिता ने इस मामले को दबाने में प्रमुख भाजपा नेताओं की भूमिका की जांच के लिए अतिरिक्त एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी, पर वह पूरी नहीं हुई। भट्ट कहते हैं कि इस मांग पर जोर देने के लिए 8 फरवरी को पंचायत भी बुलाई गई है। सीपीआई (माले) के राज्य सचिव इंद्रेश मैखुरी भी कहते हैं कि इस मामले की सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में जांच की मांग से ध्यान हटाने के लिए राज्य में सांप्रदायिक आग फैलाई जा रही है।
वैसे भी, 2025 में सबसे ज्यादा नफरती भाषण देने के मामले में मुख्यमंत्री धामी सबसे आगे रहे हैं। इंडिया हेट लैब द्वारा जारी सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट की रिपोर्ट के मुताबिक, धामी ने बीते साल कुल 71 नफरती भाषण दिए। मुख्यमंत्री अपने भाषणों में 'लैंड जिहाद', 'लव जिहाद', 'मस्जिद जिहाद', 'मजार जिहाद', 'थूक जिहाद' जैसे जुमलों का बार-बार इस्तेमाल करते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड में 2025 में नफरती भाषण की घटनाएं 138 प्रतिशत बढ़कर 155 हो गईं, जबकि 2024 में इनकी संख्या 65 थी। लेकिन अपने इस काम के लिए यह कहते मुख्यमंत्री अपनी पीठ थपथपाते हैं कि 'अगर संस्कृति, परंपरा और डेमोग्राफी की रक्षा करना हेट स्पीच है, तो मुझे नंबर वन होने पर गर्व है।'
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इन सबके मद्देनजर ही सामाजिक कार्यकर्ता चारु तिवारी का कहना है कि इस किस्म का सरकारी संरक्षण न होता, तो कोटद्वार वाली घटना नहीं होती। कोटद्वार में वकील अहमद की दुकान पर उत्पात की घटना तो 26 जनवरी को हुई, पर दीपक के घर और उनके जिम पर उग्र हिन्दूवादी भीड़ 31 जनवरी को पहुंची। इसे महज संयोग नहीं मानना चाहिए कि उस दिन मुख्यमंत्री धामी भी शहर में ही थे। वह बताते हैं कि इस भीड़ के आगे-आगे पुलिस जीप चल रही थी और जिम से पुलिस स्टेशन बिल्कुल पास में है। वह पूछते हैं, ’राजनीतिक संरक्षण न होता, तो यह भीड़ तीन-चार घंटे किस तरह उत्पात मचाए रखती?’
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