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नौकरियों पर आफत: टेक कंपनियों में छंटनी का दौर किस ओर कर रहा इशारा?

तो क्या ऐसा मान लिया जाए कि बीते दशक या दशकों के दौरान कारोबार को बेतहाशा विस्तार कर लाखों लोगों को रोजगार देकर अरबों-खरबों डॉलर की पूंजी वाली बनी बड़ी टेक कंपनियों में छंटनी का दौर इशारा कर रहा है कि अच्छे दिन अब जाने वाले हैं।

फोटो: Getty Images
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दुनिया की बड़ी टेक्नालॉजी कंपनियां अपने खाते खंगाल रही हैं और हिसाब-किताब का गुणा-भाग कर मौजूदा हालात और आने वाले वक्त की आहट के लिए खुद को तैयार करने में लगी हुई है। अभी कुछ महीने पहले तक जिन कंपनियों में मोटी तंख्वाह, बेशुमार लाभ और वक्त-वक्त पर मिलने वाले मोटे कमीशन और बोनस के लिए जो कंपनियां दुनिया भर के टेक्नालॉजी प्रोफेशनल को लुभाती रही थीं, अब वही कंपनियां भारी संख्या में लोगों को बाहर का रास्ता दिखा रही हैं।

ताजा खबर आई है कि ऑनलाइन शॉपिंग और ओवर-द-टॉप (ओटीटी) कंटेंट मुहैया कराने वाली बड़ी कंपनी अमेज़न करीब 11,000 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाने वाली है। इससे पहले पिछले सप्ताह ही फेसबुक और व्हाट्सऐप की मिल्कियत वाली मार्क जकरबर्ग की कंपनी मेटा ने हजारों कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। आईफोन और आईपैड जैसे महंगे गैजेट्स बनाने वाली कंपनी एपल ने हालांकि अभी कोई छंटनी तो नहीं की है, लेकिन आमतौर पर लगातार जारी रहने वाली भर्ती की रफ्तार एपल में जरूर धीमी हो गई है।

मंगलवार को ही भारत में मेटा कंपनी से जुड़े व्हाट्सऐप के इंडिया हेड अभिजीत बोस और मेटा के इंडिया पब्लिक पॉलिसी डायरेक्टर राजीव अग्रवाल ने इस्तीफा दे दिया। माना जा रहा है कि इन दोनों बड़े अधिकारियों को इस्तीफा देने के लिए मजबूर किया गया।

अमेजन की बात करें तो आखिर आम तौर पर फायदे में चलने वाली इस कंपनी में इतने बड़े पैमाने पर छंटनी क्यों की जा रही है? अमेजन को तो टेक कंपनियों की फेहरिस्त में हमेशा उस मुकाम पर रखा जाता रहा है जहां कर्मचारियों को एक सुनहरा और स्थाई भविष्य नजर आता रहा है। ऐन हॉलिडे सीजन के ठीक पहले हजारों लोगों को बाहर का रास्ता दिखाने फैसला इसलिए भी चौंकाता है क्योंकि आमतौर पर हॉलिडे सीज़न (पश्चिम में क्रिसमस से लेकर नए साल के आगाज़ तक को आमतौर पर हॉलिडे सीजन माना जाता है) को ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए काफी लाभदायक माना जाता है।

ऐसी संभावना जताई जा रही है कि अमेजन अपने डिवाइस सेक्शन में सबसे ज्यादा छंटनी करेगी क्योंकि पूरी दुनिया में मशहूर इसकी सबसे ज्यादा बिकने वाली डिवाइस एलेक्सा की बिक्री में बड़े पैमाने पर कमी दर्ज की गई है।

अभी हाल ही में मेटा और ट्विटर ने बड़े पैमाने पर लोगों को नौकरी से निकाला है। इन दोनों कंपनियों में छंटनी का असर भारत में इनके कर्मचारियों पर भी पड़ा है। ट्विटर का लगभग पूरा इंडिया ऑफिस ही खाली सा हो गया है।

वहीं मेटा (फेसबुक और व्हाट्सऐप वाली कंपनी) ने पूरी दुनिया में काम करने वाले अपने 13 फीसदी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया। यह संख्या करीब 11,000 कर्मचारियों के बराबर है।

एलन मस्क के ट्विटर टेकओवर के बाद तो वहां एक तरह भगदड़ का सा माहौल है। ट्विटर से अब तक करीब 50 फीसदी लोगों को बाहर कर दिया गया है। भारत में कभी ट्विटर के दफ्तर में करीब 300 लोग काम करते थे। अब वहां बमुश्किल 18-20 लोग ही बचे हैं। और जो बचे हैं, उन्हें भी हर वक्त आशंका है कि न जाने कब विदाई का वक्त आ जाए। नेटफ्लिक्स, एल्फाबेट जैसी कंपनियों में भी छंटनी की आहट सुनाई दे रही है।

तो क्या ऐसा मान लिया जाए कि बीते दशक या दशकों के दौरान कारोबार को बेतहाशा विस्तार कर लाखों लोगों को रोजगार देकर अरबों-खरबों डॉलर की पूंजी वाली बनी इन बड़ी टेक कंपनियों में छंटनी का दौर इशारा कर रहा है कि अच्छे दिन अब जाने वाले हैं। या फिर सीधे-सीधे मान लिया जाए कि दुनिया के दरवाजे पर रुकी मंदी किसी भी वक्त अंदर दाखिल होकर विश्व अर्थव्यस्था को ठहराने को आतुर है।

एक और स्थिति है जो इन विशालकाय टेक कंपनियों में छंटनी का कारक बन रही है। दरअसल दुनिया भर में टेक आधारित आवश्यकताओं की मांग में तेज कमी दर्ज की जा रही है। कोविड महामारी के दौरान जब दुनिया के तमाम देशों में लॉकडाउन के कारण लोग घरों में कैद थे, तो उन्होंने अपना अधिकांश समय जरूरत से ज्यादा ऑनलाइन खरीदारी करने, सोशल मीडिया साइटों पर पहले के मुकाबले कहीं अधिक समय बिताने, ओटीटी पर पहले से ज्यादा स्ट्रीमिंग कंटेंट देखने और ऑनलाइन गेम खेलने में बिताया। चूंकि टेक कंपनियों के यूजर्स की संख्या में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई थी तो उसे संभाले रखने के लिए इन कंपनियों ने बड़े पैमाने पर लोगों की भर्तियां भी की थीं।

महामारी की विदाई के बाद लोग दफ्तरों में लौट गए हैं, बाहरी दुनिया में फिर से आना-जाना शुरु हो चुका है, लगभग हर प्लेटफॉर्म पर यूजर्स की मौजूदगी में जबरदस्त कमी आई है, जाहिर है इस सबका असर इन कंपनियों के कारोबार और रेवेन्यू पर पड़ा है। यूजर्स कम हुए हैं तो कंपनियों को इन्हें संभालने के लिए भी कम ही लोगों की जरूरत पड़ेगी। हालांकि पहले कंपनियों को लगा था कि महामारी के दौरान ऑनलाइन जिंदगी गुजारने की जो लत लोगों को लगी है वह बरकरार रहेगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और अब जब लोग इन कंपनियों से दूरी बना रहे हैं तो टेक कंपनियों के सामने छंटनी के अलावा दूसरा रास्ता भी नहीं है।

ऑनलाइन कंपनियों से लोगों की दूरी का एक कारण और भी है, और वह है वैश्विक मंदी की आहट या फिर इसे लेकर दुनिया भर में हो रही चर्चा, जिसमें आशंकाएं अधिक हैं। ऐसे में लोगों में गैर-जरूरी चीज़ों या उत्पादों को खरीदने की प्रवृति मे जबरदस्त कमी हुई है। तमाम बाजारों में लोग ऐसे उत्पाद या वस्तुएं खरीदने से बच रहे हैं जिनके बिना उनकी जिंदगी पर कोई खास असर नहीं पड़ने वाला है।

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